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नवीनतम निर्णय
नवंबर 2024
« »26-Dec-2024
Sonu Chaudhary v. State NCT of Delhi (2024)
सोनू चौधरी बनाम राज्य राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली (2024)
|
निर्णय/आदेश की तिथि – 06.11.2024 पीठ की संख्या – 2 न्यायाधीश पीठ की संरचना – न्यायमूर्ति बेला एम. त्रिवेदी और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा |
मामला संक्षेप में:
- वर्तमान मामले में, दिल्ली के बैठक रेस्टोरेंट में एक आपराधिक घटना घटी।
- परिवादी रजत ध्यानी (PW-1) बैठक रेस्टोरेंट चला रहे थे, तभी अभियुक्य सोनू चौधरी वहाँ आया।
- अभियुक्य ने शराब पीने के आशय से एक जग पानी मांगा।
- जब रजत ध्यानी ने पानी देने से इनकार कर दिया तो मामला बिगड़ गया।
- अभियुक्य ने कथित तौर पर ब्लेड निकाला और रजत ध्यानी की जाँघ, कंधे और पीठ पर चोटें पहुँचाईं।
- जब रजत ने सहायता के लिये अपने मित्र इमरान खान (PW-3) को बुलाया, तो अभियुक्य ने कथित तौर पर इमरान पर भी हमला कर दिया, जिससे ब्लेड से उसके पेट पर चोट लग गई।
- घटना की सूचना मिलने पर जाँच अधिकारी घटनास्थल पर पहुँचे और दो लोगों को घायल अवस्था में पाया।
- अभियुक्य को मौके पर ही पकड़ लिया गया।
- मेडिकल जाँच कराई गई, जिसमें रजत की चोटों की पुष्टि हुई।
- मुकदमे के दौरान, रजत ध्यानी ने अभियोजन पक्ष के मामले का समर्थन किया, जबकि इमरान खान अपने बयान से मुकर गया और उन्होंने अभियोजन पक्ष के बयान का समर्थन नहीं किया।
- बाद में डॉक्टरों ने रजत को लगी चोटों को साधारण श्रेणी में रखा।
- प्रारंभ में, अभियुक्त पर भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) की दो धाराओं के तहत आरोप लगाए गए:
- धारा 324 (जानबूझकर चोट पहुँचाना)।
- धारा 452 (चोट पहुँचाने की तैयारी के बाद गृह-अतिचार)।
- ट्रायल कोर्ट ने अभियुक्त को आरोपित अपराध के लिये दोषी ठहराया तथा उच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय के आदेश को बरकरार रखा।
- अवर न्यायालयों के निर्णय से व्यथित होकर अपीलकर्त्ता ने उच्चतम न्यायालय के समक्ष वर्तमान अपील दायर की।
निर्णय
उच्चतम न्यायालय ने कहा कि:
- IPC की धारा 324 (स्वेच्छा से चोट पहुँचाना) के संबंध में:
- न्यायालय ने धारा 324 IPC के तहत दोषसिद्धि की पुष्टि की।
- अभियोजन पक्ष ने उचित संदेह से परे अभियुक्त के अपराध को सफलतापूर्वक साबित कर दिया।
- IPC की धारा 452 (गृह-अतिचार) के संबंध में:
- न्यायालय ने इस धारा के तहत दोषसिद्धि में महत्त्वपूर्ण खामियाँ पाईं।
- दोनों अवर न्यायालय धारा 452 के आवश्यक तत्त्वों पर उचित रूप से विचार करने में विफल रहे।
- उच्चतम न्यायालय ने कहा कि किसी रेस्तरां को इस प्रकार वर्गीकृत नहीं किया जा सकता:
- मानव निवास के लिये उपयोग किया जाने वाला स्थान।
- पूजा करने का स्थान।
- संपत्ति की अभिरक्षा के लिये स्थान।
- अभियोजन पक्ष आपराधिक अतिचार (धारा 441) और गृह-अतिचार (धारा 442) की बुनियादी आवश्यकताओं को स्थापित करने में विफल रहा। इसलिये, धारा 452 के तहत दोषसिद्धि कानूनी रूप से अस्थिर थी।
- उच्चतम न्यायालय ने भारतीय दंड संहिता की धारा 324 के तहत दो वर्ष के साधारण कारावास, 1,00,000 रुपए के जुर्माने तथा जुर्माना अदा न करने पर छह माह के अतिरिक्त कारावास की सज़ा सुनाई।
- उच्चतम न्यायालय ने भारतीय दंड संहिता की धारा 452 के तहत दोषसिद्धि को भी रद्द कर दिया।
- चूँकि अभियुक्त पहले ही दो वर्ष जेल में बिता चुका है, इसलिये न्यायालय ने अन्य किसी मामले में अपेक्षित न होने पर तत्काल रिहाई का आदेश दिया तथा यदि जुर्माना अदा न किया गया हो तो उसे अदा करने का निर्देश दिया।
उच्चतम न्यायालय ने ट्रायल कोर्ट के लिये प्रक्रिया निर्देश भी जारी किया:
- सज़ा पूरी होने की स्थिति की पुष्टि करें।
- जुर्माना भुगतान की स्थिति की जाँच करें।
- सज़ा के किसी भी लंबित पहलू के लिये उचित कानूनी कार्रवाई करें।
प्रासंगिक प्रावधान:
- भारतीय दंड संहिता, 1860 – धारा 452 – जो कोई किसी व्यक्ति को चोट पहुँचाने या किसी व्यक्ति पर हमला करने, या किसी व्यक्ति को गलत तरीके से रोकने, या किसी व्यक्ति को चोट पहुँचाने, या हमले, या गलत तरीके से रोकने के भय में डालने की तैयारी करके गृह-अतिचार करता है, उसे किसी एक अवधि के लिये कारावास से दंडित किया जाएगा जिसे सात वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है, और साथ ही वह जुर्माने के लिये भी उत्तरदायी होगा।
विधिक प्रतिनिधि के माध्यम से कल्लाकुरी पट्टाभिरामस्वामी (मृत) बनाम कल्लाकुरी कामराजू एवं अन्य
Kallakuri Pattabhiramaswamy (dead) through LR’s v. Kallakuri Kamaraju & Ors (2024)
|
निर्णय/आदेश की तिथि– 21.11.2024 पीठ के सदस्यों की संख्या– 2 न्यायाधीश पीठ की संरचना– न्यायमूर्ति सी.टी. रविकुमार एवं न्यायमूर्ति संजय करोल |
मामला संक्षेप में:
- विवाद के पक्षकार
- यह विवाद एक ही परिवार की दो शाखाओं, विशेष रूप से सौतेले भाइयों के मध्य है।
- अपीलकर्त्ता-प्रतिवादी (विधिक उत्तराधिकारियों द्वारा प्रतिनिधित्व) कल्लाकुरी स्वामी की दूसरी पत्नी श्रीमती वीरभद्रम्मा का पुत्र है।
- प्रतिवादी-वादी कल्लाकुरी स्वामी की पहली पत्नी के पुत्र हैं।
- विवादित संपत्ति:
- विचाराधीन संपत्ति में 3.55 एकड़ भूमि शामिल है, जो टेकी, पश्चिम खांड्रीका और अंगारा गांवों में स्थित विभिन्न सर्वेक्षण संख्याओं में वितरित है।
- 1933 का विभाजन विलेख:
- 25 अगस्त, 1933 को एक विभाजन विलेख के अनुसार यह संपत्ति श्रीमती वीरभद्रम्मा को उनके आजीवन सुखाचार के लिये आवंटित की गई थी।
- विलेख में यह निर्धारित किया गया था कि उनकी मृत्यु के बाद, संपत्ति परिवार की दो हिस्सों में उनके मध्य समान रूप से विभाजित की जाएगी।
- श्रीमती वीरभद्रम्मा का निधन:
- श्रीमती वीरभद्रम्मा का निधन 6 फरवरी, 1973 को हुआ।
- संपत्ति के विभाजन को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ, जिसके परिणामस्वरूप मूल वाद संख्या 50/1984 संस्थित हुआ।
- प्रतिवादी-वादी द्वारा किये गए दावे:
- उन्होंने 1933 के विभाजन विलेख के अनुसार संपत्ति में अपने आधे हिस्से का विभाजन और कब्ज़ा मांगा।
- उन्होंने तर्क दिया कि अपीलकर्त्ता-प्रतिवादी विभाजन से बच रहे थे।
- अपीलकर्त्ता एवं प्रतिवादियों द्वारा दिया गया तर्क:
- उन्होंने दावा किया कि श्रीमती वीरभद्रम्मा ने 30 दिसंबर, 1968 को एक पंजीकृत वसीयत निष्पादित की, जिसमें विवादित संपत्ति प्रतिवादियों में से एक (उनकी बहू) को दी गई।
- उन्होंने तर्क दिया कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 14 (1) के कारण 1933 के विभाजन विलेख के अनुसार उनके अधिकार पूर्ण हो गए थे, जिससे उन्हें वसीयत निष्पादित करने में सक्षम बनाया गया।
- ट्रायल कोर्ट द्वारा दिया गया निष्कर्ष (1990):
- ट्रायल कोर्ट ने माना कि 1933 के विभाजन विलेख के अनुसार वीरभद्रम्मा का संपत्ति में केवल आजीवन हित निहित था।
- अधीनस्थ न्यायालय ने निर्णय दिया कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 (HSA) की धारा 14 (1) के अनुसार उनके अधिकार पूर्ण स्वामित्व में परिवर्तित नहीं हुए, क्योंकि संपत्ति पहले से निहित अधिकार को मान्यता देते हुए नहीं दी गई थी।
- परिणामस्वरूप, ट्रायल कोर्ट ने वसीयत को अमान्य घोषित कर दिया तथा विभाजन विलेख की शर्तों को यथावत रखते हुए प्रतिवादी-वादी को समान भागीदारी प्रदान को सुनिश्चित किया।
- उच्च न्यायालय द्वारा दिया गया निष्कर्ष:
- उच्च न्यायालय ने HSA की धारा 14(1) के अंतर्गत पूर्ण अधिकारों एवं धारा 14(2) के अनुसार प्रतिबंधित आजीवन हित के बीच अंतर किया।
- इसने माना कि वीरभद्रम्मा को संपत्ति के 2.09 एकड़ पर पूर्ण अधिकार था, जबकि शेष 3.55 एकड़ जमीन उन्हें पूर्ण स्वामित्व के बिना आजीवन हित के रूप में दी गई थी।
- इसने निष्कर्ष निकाला कि विवादित संपत्ति (3.55 एकड़) उनकी मृत्यु के बाद बेटों (प्रतिवादी-वादी एवं अपीलकर्त्ता-प्रतिवादी) को वापस कर दी गई।
- उच्चतम न्यायालय में की गयी अपील:
- अपीलकर्त्ता-प्रतिवादियों ने उच्च न्यायालय के निर्णय को चुनौती दी तथा कहा कि विवादित संपत्ति पर वीरभद्रम्मा का अधिकार पूर्ण है, जिससे वह वसीयत निष्पादित करने में सक्षम हैं।
निर्णय:
- न्यायालय ने यहाँ यह टिप्पणी की कि वी. तुलसाम्मा बनाम वी. शेष रेड्डी (1977) के मामले में न्यायालय ने कहा था कि, "किसी हिंदू विधवा का भरण-पोषण का दावा एक खोखली औपचारिकता नहीं है, जिसे रियायत या अनुकंपा, अनुग्रह या मुफ्त या उदारता के रूप में प्रयोग किया जाता है, बल्कि यह एक मूल्यवान आध्यात्मिक एवं नैतिक अधिकार है, जो पति एवं पत्नी के आध्यात्मिक व लौकिक संबंध से उत्पन्न होता है।"
- इसके अतिरिक्त रघुबीर सिंह बनाम गुलाब सिंह (1998) के मामले में न्यायालय ने माना कि “सांविधिक अधिनियमों के लागू होने से बहुत पहले ही हिंदू विधवा के भरण-पोषण का अधिकार शास्त्रीय हिंदू विधियों के अंतर्गत प्रावधानित था।”
- इस प्रकार, यह माना गया कि भरण-पोषण का अधिकार HSA की धारा 14 (1) के आधार पर उसके बदले में दी गई संपत्ति को पूर्ण स्वामित्व में बदलने के लिये पर्याप्त है।
- न्यायालय ने माना कि वर्तमान तथ्यों के अनुसार, जैसा कि अधीनस्थ न्यायालयों द्वारा माना गया है, दूसरी पत्नी के पास केवल 2.09 सेंट भूमि के संबंध में पूर्ण हित था तथा 3.55 सेंट भूमि के संबंध में आजीवन हित निहित था।
- न्यायालय को कोई अन्य दृष्टिकोण अपनाने का कोई कारण नहीं मिला।
- इस प्रकार, इस मामले में अपील विफल हो गई।
प्रासंगिक प्रावधान:
- हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956- धारा 14
(1) किसी हिंदू महिला के कब्जे में कोई संपत्ति, चाहे वह इस अधिनियम के प्रारंभ से पहले या बाद में अर्जित की गई हो, उसके द्वारा पूर्ण स्वामी के रूप में रखी जाएगी, न कि सीमित स्वामी के रूप में। स्पष्टीकरण.- इस उपधारा में, “संपत्ति” में जंगम एवं स्थावर दोनों तरह की संपत्ति शामिल है, जो किसी हिंदू महिला ने उत्तराधिकार या वसीयत से, या विभाजन में, या भरण-पोषण या भरण-पोषण के बकाया के बदले में, या किसी व्यक्ति से, चाहे वह रिश्तेदार हो या नहीं, अपने विवाह से पहले, उसके समय या बाद में, या अपने कौशल या परिश्रम से, या खरीद या नुस्खे से, या किसी भी अन्य तरीके से उपहार के रूप में अर्जित की हो, तथा ऐसी कोई संपत्ति भी शामिल है, जो इस अधिनियम के प्रारंभ से ठीक पहले स्त्रीधन के रूप में उसके पास थी।
(2) उपधारा (1) में अंतर्विष्ट कोई तथ्य दान के माध्यम से या वसीयत या किसी अन्य लिखत के अधीन या सिविल न्यायालय की डिक्री या आदेश के अधीन या किसी पंचाट के अधीन अर्जित किसी संपत्ति पर लागू नहीं होगी, जहाँ दान, वसीयत या अन्य लिखत या डिक्री, आदेश या पंचाट की शर्तों में ऐसी संपत्ति में प्रतिबंधित संपदा निर्धारित की गई हो।
रजिस्ट्रार फैजान मुस्तफा के माध्यम से अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय बनाम नरेश अग्रवाल (2024)
Aligarh Muslim University Through Its Registrar Faizan Mustafa v. Naresh Agarwal (2024)
|
निर्णय/आदेश की तिथि– 08.11.2024 पीठ के सदस्यों की संख्या– 7 न्यायाधीश पीठ की संरचना–भारत के मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड, न्यायमूर्ति संजीव खन्ना, न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला, न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता, न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा एवं न्यायमूर्ति एस.सी. शर्मा |
मामला संक्षेप में:
- 1877 में अलीगढ़ में मोहम्मदन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज की स्थापना की गई थी, जो शुरुआत में कलकत्ता विश्वविद्यालय एवं बाद में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से संबद्ध था।
- 1920 में, शाही विधायिका द्वारा अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) अधिनियम पारित किया गया, जिसने औपचारिक रूप से विश्वविद्यालय की स्थापना तथा समावेश किया, जिसने मौजूदा कॉलेज को एक पूर्ण विश्वविद्यालय में परिणत कर दिया।
- AMU ने वर्ष 1951 एवं 1965 में दो प्रमुख संशोधनों के माध्यम द्वारा महत्त्वपूर्ण विधायी परिवर्तन किये, जिसने विश्वविद्यालय के प्रशासनिक ढाँचे, धार्मिक शिक्षा प्रावधानों एवं शासन तंत्र को संशोधित किया।
- इन संशोधनों ने विश्वविद्यालय के मूल प्रशासनिक ढाँचे को मौलिक रूप से परिणत कर दिया, जिसमें न्यायालय के सदस्यों के लिये विशेष रूप से मुस्लिम होने की आवश्यकता को हटाना तथा न्यायालय से कार्यकारी परिषद को पर्याप्त शक्तियाँ अंतरित करना शामिल था।
- संविधान में अनुच्छेद 32 के अंतर्गत चुनौतियाँ आनी हुईं, जिसमें मुख्य रूप से तर्क दिया गया कि संशोधन के अनुच्छेद 30(1) का उल्लंघन होता है, जो धार्मिक अल्पसंख्यकों को शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना एवं प्रशासन का अधिकार देता है।
- याचिकाकर्त्ताओं ने तर्क दिया कि AMU की स्थापना मूल रूप से मुसलमानों द्वारा की गई थी, जो एक धार्मिक अल्पसंख्यक हैं, तथा इसलिये उन्हें अनुच्छेद 30(1) के अंतर्गत संस्थान का प्रशासन करने का अधिकार यथावत रखना चाहिये।
- भारत संघ ने इस तर्क का विरोध करते हुए कहा कि मुस्लिम अल्पसंख्यकों ने विश्वविद्यालय की स्थापना नहीं की है - संसद ने 1920 के अधिनियम के द्वारा इसकी स्थापना की थी - तथा इस प्रकार, वे प्रशासनिक अधिकारों का दावा नहीं कर सकते।
- मुख्य विधिक विवाद अनुच्छेद 30(1) में "स्थापना एवं प्रशासन" वाक्यांश का निर्वचन करने पर केंद्रित है, विशेष रूप से यह कि क्या AMU स्व-प्रशासन के संवैधानिक अधिकार के साथ अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान के रूप में योग्य है।
- यह मामला अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान की परिभाषा, संवैधानिक संदर्भ में "संस्था" के अर्थ तथा शैक्षणिक संस्थानों में अल्पसंख्यक अधिकारों की सीमा के विषय में मौलिक प्रश्न करता है।
निर्णय:
- उच्चतम न्यायालय की 7 न्यायाधीशों की पीठ ने 4:3 के बहुमत से एस. अज़ीज़ बाशा बनाम भारत संघ में अवधारित 1967 के पूर्वनिर्णय को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि विधायी समावेशन के माध्यम से बनाई गई संस्था अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा नहीं ले सकती।
- न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 30(1) के दोहरे उद्देश्य की पूर्ति करता है: एक तो यह भेदभाव-विरोधी उपबंध है तथा दूसरा यह विशेष अधिकार का उपबंध है, जो अल्पसंख्यकों को अधिक प्रशासनिक स्वायत्तता के साथ शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने और उनका प्रशासन करने का अधिकार देता है।
- "राष्ट्रीय महत्त्व की संस्था" होने का दर्जा किसी संस्था के अल्पसंख्यक चरित्र को नकारता या कम नहीं करता। "राष्ट्रीय" एवं "अल्पसंख्यक" परस्पर अनन्य नहीं हैं, बल्कि एक ही संस्था के अंदर सह-अस्तित्व में रह सकते हैं।
- संविधान के अंगीकरण से पहले स्थापित शैक्षणिक संस्थान अनुच्छेद 30 के अंदर समान रूप से संरक्षण के अधिकारी हैं। ऐसे संस्थानों के अल्पसंख्यक चरित्र को सांविधिक निगमन के माध्यम से स्वचालित रूप से आत्मसमर्पण नहीं किया जा सकता है।
- अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान के रूप में अर्हता प्राप्त करने के लिये, अल्पसंख्यक समुदाय को यह प्रदर्शित करना होगा:
- मूल विचार अल्पसंख्यक समुदाय की तरफ से प्रस्तुत किया था।
- संस्था मुख्य रूप से अल्पसंख्यक समुदाय के हित के लिये स्थापित की गई थी।
- कार्यान्वयन कदम मुख्य रूप से अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्यों द्वारा किये गए थे।
- प्रशासनिक व्यवस्था को अल्पसंख्यक संस्थान की स्पष्ट रूप से पुष्टि करनी चाहिये तथा यह प्रदर्शित करना चाहिये कि संस्था की स्थापना अल्पसंख्यक समुदाय के हितों की रक्षा एवं संवर्धन के लिये की गई थी।
- शैक्षिक पहलुओं का राज्य विनियमन या संस्थानों को राष्ट्रीय स्तर पर महत्त्वपूर्ण घोषित करने की संसदीय शक्तियाँ अनुच्छेद 30(1) के अंतर्गत संवैधानिक सुरक्षा को स्वचालित रूप से ओवरराइड या समाप्त नहीं करती हैं।
- न्यायालय ने पिछले दृष्टिकोण को खारिज कर दिया कि यदि कोई संस्था किसी विधि के माध्यम से अपना विधिक चरित्र प्राप्त करती है तो उसे अल्पसंख्यक-स्थापित नहीं माना जा सकता। सांविधिक मान्यता स्वाभाविक रूप से अल्पसंख्यक स्थिति को नकारती नहीं है।
- न्यायालय ने अल्पसंख्यक संस्था की स्थिति निर्धारित करने में एक समग्र दृष्टिकोण अपनाया, जिसमें प्रक्रियात्मक तकनीकीताओं के बजाय संस्था के मूल उद्देश्य, कार्यान्वयन एवं चल रहे प्रशासनिक चरित्र पर ध्यान केंद्रित किया गया।
- न्यायालय ने इस धारणा को खारिज कर दिया कि अल्पसंख्यक संस्थाएँ मुख्यधारा से अलग "सुरक्षित आश्रय" हैं, तथा बल देकर कहा कि अल्पसंख्यक राष्ट्रीय संस्थाओं एवं शिक्षण केंद्रों का अभिन्न अंग हैं।
प्रासंगिक प्रावधान:
भारत का संविधान,1950 –
- अनुच्छेद 30: अल्पसंख्यकों को शैक्षणिक संस्थाएं स्थापित करने एवं उनका प्रशासन करने का अधिकार।
(1) सभी अल्पसंख्यकों को, चाहे वे धर्म या भाषा पर आधारित हों, अपनी पसंद की शैक्षणिक संस्थाएँ स्थापित करने और उनका प्रशासन करने का अधिकार होगा।
(1A) खंड (1) में निर्दिष्ट अल्पसंख्यक द्वारा स्थापित एवं प्रशासित किसी शैक्षणिक संस्था की किसी संपत्ति के अनिवार्य अर्जन के लिये उपबंध करने वाली कोई विधि बनाते समय राज्य यह सुनिश्चित करेगा कि ऐसी संपत्ति के अर्जन के लिये ऐसी विधि द्वारा नियत या उसके अधीन अवधारित राशि ऐसी हो जो उस खंड के अधीन गारंटीकृत अधिकार को प्रतिबंधित या निरस्त न करे।
(2) राज्य, शैक्षणिक संस्थाओं को सहायता प्रदान करते समय, किसी शैक्षणिक संस्था के विरुद्ध इस आधार पर भेदभाव नहीं करेगा कि वह किसी अल्पसंख्यक के प्रबंधन के अधीन है, चाहे वह अल्पसंख्यक धर्म या भाषा पर आधारित हो।
हरियाणा राज्य बनाम विधिक प्रतिनिधियों के माध्यम से अमीन लाल (मृत)
State of Haryana v. Amin Lal (Since deceased) through Legal Representatives
|
निर्णय/आदेश की तिथि – 19.11.2024 पीठ के सदस्यों की संख्या – 2 न्यायाधीश पीठ की संरचना –न्यायमूर्ति विक्रम नाथ एवं प्रसन्ना बी. वराले |
मामला संक्षेप में:
- अमीन लाल एवं अशोक कुमार ने 1981 में बहादुरगढ़, हरियाणा में राष्ट्रीय राजमार्ग 10 के पास 18 बिस्वा पुख्ता भूमि के स्वामित्व का दावा करते हुए एक सिविल वाद संस्थित किया, जिसमें हरियाणा राज्य एवं लोक निर्माण विभाग (PWD) द्वारा अनाधिकृत कब्जे का आरोप लगाया गया।
- राज्य ने 1879-80 से भूमि पर निरंतर कब्जे का दावा करते हुए तथा प्रतिकूल कब्जे का दावा करते हुए अपनी स्थिति का बचाव किया, यह तर्क देते हुए कि वे एक सदी से अधिक समय से भूमि का उपयोग भंडारण के रूप में कर रहे हैं।
- ट्रायल कोर्ट ने प्रारंभ में वादी के पक्ष में वाद संस्थित किया, जिसमें पाया गया कि प्रतिवादी प्रतिकूल कब्ज़ा सिद्ध करने में विफल रहे, जिसमें बिटुमेन ड्रम लगाने और स्वामित्व स्थापित करने के लिये अपर्याप्त चारदीवारी बनाने जैसे कार्य शामिल थे।
- प्रथम अपीलीय न्यायालय ने ट्रायल कोर्ट के निर्णय को पलट दिया, वादी के वाद को खारिज कर दिया तथा सुझाव दिया कि वादी भूमि हड़पने के लिये राजस्व अभिलेखों में हेरफेर करने का प्रयास कर रहे थे।
- इसके बाद उच्च न्यायालय ने ट्रायल कोर्ट के निर्णय को बहाल कर दिया तथा कहा कि राज्य अपने नागरिकों के विरुद्ध प्रतिकूल कब्जे का दावा नहीं कर सकता तथा प्रतिवादियों का कब्जा अनुमेय था, शत्रुतापूर्ण नहीं।
- उच्चतम न्यायालय ने एक ऐतिहासिक निर्णय में राज्य की अपील को खारिज कर दिया तथा इस बात पर जोर दिया कि राज्य को प्रतिकूल कब्जे के माध्यम से निजी संपत्ति को हड़पने की अनुमति देने से नागरिकों के संवैधानिक अधिकार कमजोर होंगे तथा सरकार में जनता का विश्वास खत्म होगा।
- न्यायालय ने विशेष रूप से उल्लेख किया कि राज्य का कब्ज़ा सशर्त था तथा 1879-80 के न्यायिक पूर्वनिर्णय वास्तविकता पर आधारित था, जिसमें कब्जे को "बिखर बहाली कज़ा" (एक बाग के अस्तित्व तक) के रूप में वर्णित किया गया था, तथा इस प्रकार यह प्रतिकूल कब्ज़ा नहीं माना जा सकता।
- निर्णय ने पुष्टि की कि राजस्व अभिलेख, जब बिक्री विलेखों एवं उत्परिवर्तन प्रविष्टियों द्वारा पुष्टि की जाती है, तो स्वामित्व के दावों का समर्थन कर सकते हैं, तथा राज्य को विधिक प्रक्रियाओं के माध्यम से निजी संपत्ति के अधिकारों का सम्मान करना चाहिये।
निर्णय:
- उच्चतम न्यायालय ने कहा कि प्रतिकूल कब्जे का दावा करके, राज्य ने वादी के स्वामित्व को स्पष्ट रूप से स्वीकार कर लिया है, तथा सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश VIII नियम 5 के अंतर्गत, जिन आरोपों का विशेष रूप से खंडन नहीं किया गया है, उन्हें स्वीकार किया गया माना जाता है।
- न्यायालय ने कहा कि राजस्व रिकॉर्ड सार्वजनिक दस्तावेज हैं, जो भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 35 के अंतर्गत सही होने की धारणा रखते हैं, और हालाँकि वे स्वचालित रूप से स्वामित्व प्रदान नहीं करते हैं, लेकिन वे अन्य साक्ष्यों द्वारा पुष्टि किये जाने पर स्वामित्व के दावों का समर्थन कर सकते हैं।
- एक मौलिक सिद्धांत की पुष्टि की गई कि राज्य अपने नागरिकों से संबंधित संपत्ति पर प्रतिकूल कब्जे का दावा नहीं कर सकता, क्योंकि यह कल्याणकारी राज्य के सिद्धांतों को कमजोर करेगा तथा नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों को नष्ट कर देगा।
- न्यायालय ने राज्य द्वारा भरोसा किये गए कृत्यों (बिटुमेन ड्रम लगाना, अस्थायी संरचनाएँ खड़ी करना, एक सीमा दीवार का निर्माण करना) की आलोचनात्मक जाँच की तथा पाया कि वे प्रतिकूल कब्जे का गठन नहीं करते हैं, जिसके लिये सांविधिक अवधि के लिये निरंतर, खुला, शांतिपूर्ण एवं शत्रुतापूर्ण कब्जे की आवश्यकता होती है।
- हकीकत से प्रमाणित होता है, अनुमेय एवं सशर्त था, जिसे "बिखर बहाली कजा" (एक बाग के अस्तित्व तक) के रूप में वर्णित किया गया था, तथा इसलिये यह प्रतिकूल कब्जे के दावे का आधार नहीं बन सकता था।
- उच्चतम न्यायालय ने कहा कि प्रथम अपीलीय न्यायालय के निष्कर्ष त्रुटिपूर्ण थे, क्योंकि इसने दोषपूर्ण तरीके से वादी पर स्वामित्व सिद्ध करने का भार डाल दिया तथा वैध औचित्य के बिना जमाबंदी प्रविष्टियों एवं राजस्व अभिलेखों की अवहेलना की।
- अंततः, न्यायालय ने पुनः पुष्टि की कि विधि के शासन द्वारा शासित लोकतांत्रिक राजनीति में, राज्य उचित विधिक प्रक्रियाओं का पालन किये बिना नागरिकों को उनकी संपत्ति से वंचित नहीं कर सकता है तथा उसे व्यक्तिगत संपत्ति अधिकारों का सम्मान करना चाहिये।
प्रासंगिक प्रावधान:
सिविल प्रक्रिया संहिता,1908
आदेश VIII नियम 5: विशिष्ट अस्वीकृति
(1) वादपत्र में तथ्य का प्रत्येक अभिकथन, यदि उसका विशिष्ट रूप से या आवश्यक निहितार्थ द्वारा खंडन नहीं किया गया है, या प्रतिवादी की दलील में स्वीकार नहीं किया गया बताया गया है, तो उसे स्वीकार किया गया समझा जाएगा, सिवाय किसी विकलांग व्यक्ति के विरुद्ध के:
- हालाँकि न्यायालय अपने विवेकानुसार इस प्रकार स्वीकार किये गए किसी तथ्य को ऐसी स्वीकृति के अतिरिक्त किसी अन्य तरीके से सिद्ध करने की अपेक्षा कर सकता है:
- आगे यह भी प्रावधान है कि यदि वादपत्र में तथ्य के प्रत्येक अभिकथन का इस आदेश के नियम 3A के अंतर्गत दिये गए तरीके से खंडन नहीं किया जाता है, तो उसे स्वीकार किया हुआ माना जाएगा, सिवाय किसी विकलांग व्यक्ति के विरुद्ध।
(2) जहाँ प्रतिवादी ने कोई दलील दायर नहीं की है, वहाँ न्यायालय के लिये वादपत्र में अंतर्विष्ट तथ्यों के आधार पर निर्णय सुनाना विधिपूर्ण होगा, सिवाय किसी विकलांगताग्रस्त व्यक्ति के विरुद्ध, किन्तु न्यायालय अपने विवेकानुसार ऐसे किसी तथ्य को सिद्ध करने की अपेक्षा कर सकता है।
(3) उपनियम (1) के परन्तुक के अधीन या उपनियम (2) के अधीन अपने विवेक का प्रयोग करते समय न्यायालय इस तथ्य पर सम्यक् ध्यान रखेगा कि प्रतिवादी किसी दलीलकर्ता को नियुक्त कर सकता था या कर चुका है।
(4) जब कभी इस नियम के अधीन कोई निर्णय सुनाया जाता है, तो ऐसे निर्णय के अनुसार डिक्री तैयार की जाएगी तथा ऐसी डिक्री पर वह तिथि अंकित होगी जिस तिथि को निर्णय दिया गया था।