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सिविल कानून

माध्यस्थम् विधि के अंतर्गत महत्त्वपूर्ण परिभाषाएँ

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 21-Apr-2026

परिचय 

माध्यस्थम्और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा में परिभाषात्मक ढाँचा दिया गया हैजिस पर संपूर्ण अधिनियम आधारित है। अधिनियम केभाग 1 (माध्यस्थम्), अध्याय 1 (साधारण उपबंध) के अंतर्गत स्थित ये परिभाषाएँ सभी देशी माध्यस्थम्पर और कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्यिक माध्यस्थम्पर भी लागू होती हैं। इन परिभाषाओं की स्पष्ट समझ न केवल अधिनियम के उपबंधों की व्याख्या के लिये अपितु माध्यस्थम्अधिकारितापंचाट की प्रवर्तनीयता और प्रक्रियात्मक अनुपालन से संबंधित प्रश्नों के समाधान के लिये भी अत्यंत आवश्यक है। 

परिभाषाओं का संक्षिप्त विवरण 

(नीचे दी गई सभी परिभाषाएँ माध्यस्थम्और सुलह अधिनियम, 1996 के भाग 1, अध्याय 1 - धारा 2(1) के अंतर्गत हैं) 

धारा 

शब्द 

परिभाषा 

2(1)() 

माध्यस्थम् 

कोई भी माध्यस्थम्चाहे वह किसी स्थायी माध्यस्थम्संस्था द्वारा संचालित हो या न हो। 

2(1)() 

माध्यस्थम् करार 

अधिनियम की धारा में उल्लिखित करार 

2(1)() 

माध्यस्थम् पंचाट 

इसमें एक अंतरिम पंचाट शामिल है। 

2(1)() 

माध्यस्थम् अधिकरण 

एक मात्र मध्यस्थ या मध्यस्थों का एक पैनल। 

2(1)()(i) 

न्यायालय (घरेलू माध्यस्थम्) 

किसी जिले में मूल अधिकार क्षेत्र वाला प्रमुख सिविल न्यायालयऔर इसमें विषय-वस्तु पर अधिकार क्षेत्र रखने वाला उच्च न्यायालय भी शामिल हैजो अपने सामान्य मूल सिविल अधिकारिता का प्रयोग करता हैइसमें अवर श्रेणी का कोई सिविल न्यायालय और लघुवाद न्यायालय सम्मिलित नहीं हैं। 

2(1)()(ii) 

न्यायालय (अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्यिक माध्यस्थम् 

उच्च न्यायालय अपने सामान्य मूल सिविल अधिकारिता का प्रयोग करते हुए संबंधित विषय पर अधिकारिता रखता हैअन्य मामलों मेंउच्च न्यायालय अपने अधीनस्थ न्यायालयों की डिक्रियों से अपील की सुनवाई की अधिकारिता रखता है।  

2(1)() 

अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्यिक माध्यस्थम्   

भारतीय विधि के अंतर्गत वाणिज्यिक माने जाने वाले विधिक संबंधों (संविदात्मक हो या नहीं) से उत्पन्न विवादों से संबंधित माध्यस्थम्जहाँ कम से कम एक पक्षकार निम्न में से कोई एक हो: (i) एक व्यक्ति जो विदेशी नागरिक हो या भारत के बाहर स्थायी रूप से निवासी होया (ii) भारत के बाहर निगमित एक निगमित निकायया (iii) व्यक्तियों का एक संघ या निकाय जिसका केंद्रीय प्रबंधन और नियंत्रण भारत के बाहर किया जाता होया (iv) किसी विदेशी देश की सरकार। 

2(1)() 

विधिक प्रतिनिधि 

वह व्यक्ति जो विधि के अनुसार किसी मृत व्यक्ति की संपदा का प्रतिनिधित्व करता हैइसमें कोई भी ऐसा व्यक्ति सम्मिलित है जो मृत व्यक्ति की संपत्ति में दखलंदाजी करता है औरजहाँ कोई पक्षकार प्रतिनिधि के रूप में कार्य करता हैवह व्यक्ति जिस पर संपत्ति का अधिकार हस्तांतरित होता है। 

2(1)() 

पक्षकार  

माध्यस्थम् करार का कोई पक्षकार 

भाग की प्रयोज्यता — धारा 2(2) से 2(9) 

(नीचे दी गई सभी धारा माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम, 1996 के भाग1, अध्याय 1 - धारा के अंतर्गत आते हैं) 

धारा 

विषय 

नियम/उपबंध 

2(2) 

क्षेत्रीय प्रयोज्यता 

भाग भारत में माध्यस्थम् स्थान होने पर लागू होता है। परंतुक (अधिनियम 3, 2016 द्वारा सम्मिलित): धारा 9, 27 और धारा 37(1)(क) एवं 37(3) अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक माध्यस्थम् पर भी लागू होती हैंभले ही माध्यस्थम् स्थान भारत से बाहर होबशर्ते कि इसके विपरीत कोई करार न होऔर पंचाट अधिनियम के भाग 2के अंतर्गत प्रवर्तनीय एवं मान्यता प्राप्त हो।   

2(3) 

गैर-अवरोधक उपबंध (Non-obstante) — अन्य विधियाँ  

अधिनियम का भाग-1, वर्तमान में प्रवर्तित किसी अन्य विधि को प्रभावित नहीं करेगाजिसके अधीन कुछ विवादों को माध्यस्थम् हेतु संदर्भित नहीं किया जा सकता है।  

2(4) 

सांविधिक माध्यस्थम् के लिये आवेदन  

अधिनियम का भाग-1 (धारा 40(1), धारा 41 एवं धारा 43 को छोड़कर) किसी अन्य अधिनियम के अधीन होने वाली प्रत्येक माध्यस्थम् पर इस प्रकार लागू होगा मानो वह किसी माध्यस्थम् करार के अनुसरण में हो तथा मानो वह अधिनियम स्वयं एक माध्यस्थम् करार हो — परंतु जहाँ भाग-1के उपबंध उस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए नियमों से असंगत होंवहाँ वे लागू नहीं होंगे।  

2(5) 

साधारण प्रयोज्यता 

धारा 2(4) के अधीनऔर जब तक कि किसी प्रचलित विधि या भारत और किसी अन्य देश के बीच किसी द्विपक्षीय करार द्वारा अन्यथा प्रदान न किया गया होभाग सभी माध्यस्थम् और उससे संबंधित सभी कार्यवाही पर लागू होता है।    

2(6) 

पक्षकार स्वायत्तता  

जहाँ अधिनियम का भाग-1 (धारा 28 को छोड़कर) पक्षकारों को किसी विषय का अवधारण करने के लिये स्वतंत्र छोड़ता हैवहाँ ऐसी स्वतंत्रता में यह अधिकार भी सम्मिलित है कि वे किसी व्यक्ति या संस्था को उस विषय के निर्धारण हेतु अधिकृत कर सकें। 

2(7) 

देशी पंचाट 

भाग-के अधीन किया गया कोई माध्यस्थम् पंचाटदेशी पंचाट माना जाएगा। 

2(8) 

करार में माध्यस्थम् नियमों का समावेश 

जहाँ भाग-में पक्षकारों के किसी करार (चाहे वह अभिव्यक्त हो या विवक्षित) का उल्लेख किया गया हैवहाँ ऐसे करार में उस करार में उल्लिखित किसी भी माध्यस्थम् नियम का समावेश माना जाएगा।  

2(9) 

दावा में प्रतिदावा का समावेश 

धारा 25(क) तथा धारा 32(2)(क) के अधीन को छोड़करकिसी भी “दावा” के संदर्भ में प्रतिदावा भी सम्मिलित होगातथा किसी “प्रतिरक्षा” के संदर्भ में उस प्रतिदावे के विरुद्ध प्रतिरक्षा भी सम्मिलित होगी। 

निष्कर्ष 

माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम, 1996 के भाग की धारा के अंतर्गत दी गई परिभाषाएँ मात्र तकनीकी औपचारिकताएँ नहीं हैं — वे भारत में माध्यस्थम् विधि की संपूर्ण व्याख्यात्मक नींव निर्धारित करती हैं। अधिनियम के भाग तक ही सीमित ये परिभाषाएँ देशी माध्यस्थम् पर लागू होती हैं और अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्यिक माध्यस्थम् पर चुनिंदा रूप से विस्तारित होती हैं।