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आपराधिक कानून

धारा 65-ख प्रमाणपत्र के बिना कॉल डिटेल रिकॉर्ड ग्राह्य नहीं हैं

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 12-Mar-2026

पूरणमल बनाम राजस्थान राज्य एवं अन्य 

"अभियोजन पक्ष साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-ख के अधीन जारी प्रमाण पत्र को साबित नहीं कर सका। साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-ख के अधीन अनिवार्य रूप से आवश्यक इस प्रमाण पत्र के अभाव मेंकॉल डिटेल रिकॉर्ड साक्ष्य के रूप में अग्राह्य हो जाते हैं और अभियोजन पक्ष के मामले के समर्थन में उन पर विश्वास नहीं किया जा सकता है।" 

न्यायमूर्ति विक्रम नाथसंदीप मेहता और एनवी अंजारिया 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति विक्रम नाथसंदीप मेहता और एन.वी. अंजारिया की पीठ नेपूरनमल बनाम राजस्थान राज्य एवं अन्य (2026)के मामले में हत्या के मामले में दोषसिद्ध ठहराए गए एक अभियुक्त को दोषमुक्त कर दियायह मानते हुए कि कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) साक्ष्य में तब तक ग्राह्य नहीं हैं जब तक किभारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) की धारा 63) के अधीन अनिवार्य प्रमाण पत्र साथ न हो।  

  • न्यायालय ने विचारण न्यायालय और राजस्थान उच्च न्यायालय के एकसमान निर्णयों को अपास्त कर दियाऔर इस बात की पुष्टि की कि दूरसंचार अधिकारियों का मौखिक परिसाक्ष्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के लिये सांविधिक प्रमाणीकरण आवश्यकता का विकल्प नहीं हो सकती है। 

पूरणमल बनाम राजस्थान राज्य एवं अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • यह मामला 2010 में एक महिला की हत्या से जुड़ा हैजिसमें अभियोजन पक्ष का आरोप है कि मृतक के पति ने अपीलकर्त्ता के साथ मिलकर अपराध करने का षड्यंत्र रचा था 
  • कथित षड्यंत्र को साबित करने के लियेअभियोजन पक्ष नेकॉल डिटेल रिकॉर्ड पर विश्वास किया, जिसमें घटना के समय के आसपास दोनों अभियुक्तों के बीच निरंतर संपर्क दिखाया गया था। 
  • अभियोजन पक्ष ने मृतक के रक्त समूह से कथित तौर पर मेल खाने वाली खून से सनी कमीज की बरामदगी और हत्या करने के लिये कथित तौर पर अपीलकर्त्ता को भुगतान किये गए ₹46,000 की बरामदगी पर भी विश्वास किया। 
  • अपीलकर्त्ता ने CDRs की ग्राह्यता को इस आधार पर चुनौती दी कि अभियोजन पक्ष भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-ख (4) के अधीन अनिवार्य प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने में विफल रहा था। 
  • राजस्थानउच्च न्यायालय ने दोषसिद्धि को बरकरार रखाजिसके बाद मामले को अपील के माध्यम से उच्चतम न्यायालय में ले जाया गया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • न्यायालय ने माना किधारा 65-ख का प्रमाण पत्र इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के लिये एक अनिवार्य शर्त है, और इसके अभाव में CDR पूरी तरह से अग्राह्य हो जाते हैं। न्यायालय ने राज्य के इस तर्क को खारिज कर दिया कि दूरसंचार नोडल अधिकारियों को साक्षी के रूप में पेश करने से प्रमाण पत्र का विकल्प मिल सकता हैऔर कहा किमौखिक साक्ष्य किसी सांविधिक आवश्यकता का स्थान नहीं ले सकता । 
  • ₹46,000 की बरामदगी के मामले मेंन्यायालय ने अभियोजन पक्ष के मामले को अविश्वसनीय पाया और कहा कि न्यायालय में दर्ज की गई राशि ₹46,145 थीजिससे बरामदगी की घटना पर ही संदेह उत्पन्न हो गया। न्यायालय ने माना कि अपराध से संबंध न होने पर मात्र करेंसी नोटों की बरामदगी को दोष सिद्ध करने वाला कारक नहीं माना जा सकता। 
  • FSL की रिपोर्ट परन्यायालय ने पाया किअभिरक्षा की श्रृंखला टूट गई थीमलखाना रजिस्टर में अस्पष्ट विसंगतियां थींजिससे फोरेंसिक रिपोर्ट "अनावश्यक और बेकार कागज का टुकड़ा" बन गई थी। 
  • न्यायालय ने माना कि अभियोजन पक्ष अभियुक्त के अपराध की ओर पूरी तरह से इंगित करने वाली परिस्थितियों की एक पूरी श्रृंखला स्थापित करने में असफल रहाऔर तदनुसारअपीलकर्त्ता को बरी कर दियाऔर उसकी तत्काल रिहाई का निदेश दिया। 

भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) की धारा 63 क्या है? 

भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 63 – इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों की ग्राह्यता 

  • धारा 63(1) –इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख (मुद्रितप्रकाशकीय/चुंबकीय/अर्धचालक भंडारितया कोई कंप्यूटर/उपकरण निर्गम) मूल की आवश्यकता के बिनादस्तावेज़ के रूप में ग्राह्य हैंबशर्ते कुछ शर्तें पूरी हों। 
  • धारा 63(2) – ग्राह्यता के लिये चार शर्तें- 
    • संबंधित अवधि के दौरान संबंधित क्रियाकलाप के लिये कंप्यूटर/उपकरण का नियमित रूप से उपयोग किया गया था। 
    • इन क्रियाकलापों के सामान्य क्रम में नियमित रूप से सिस्टम में जानकारी डाली जाती थी। 
    • संबंधित अवधि के दौरान कंप्यूटर ठीक से काम कर रहा था (या किसी भी खराबी ने अभिलेख की शुद्धता को प्रभावित नहीं किया)। 
    • इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख सामान्य क्रियाकलापों के दौरान दर्ज की गई जानकारी को पुन: प्रस्तुत करता है या उससे व्युत्पन्न होता है। 
  • धारा 63(3) –यदि एकाधिक कंप्यूटर या उपकरण का उपयोग किया गया (एकल ढंग मेंनेटवर्कमध्यवर्ती के माध्यम सेआदि)तो इस धारा के प्रयोजनों के लिये उन सभी को एक ही कंप्यूटर माना जाएगा। 
  • धारा 63(4) –स्वीकृति के प्रत्येक अवसर पर प्रत्येक इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख के साथ एक प्रमाण पत्र प्रस्तुत किया जाना चाहियेजिसमें निम्नलिखित बातें होनी चाहिये: 
    • अभिलेख की पहचान करें और बताएं कि इसे कैसे तैयार किया गया था। 
    • इसमें शामिल उपकरणों का विवरण दें। 
    • धारा 63(2) में उल्लिखित शर्तों को संबोधित करें। 

प्रमाण पत्र पर उपकरण या संबंधित क्रियाकलापों के भारसाधक व्यक्ति के साथ-साथ एक विशेषज्ञ द्वारा भी हस्ताक्षर किये जाने चाहियेऔर इसे सर्वोत्तम जानकारी के आधार पर साक्ष्य के रूप में स्वीकार किया जाता है।