होम / करेंट अफेयर्स
पारिवारिक कानून
कर्त्ता द्वारा अर्जित संपत्तियों को संयुक्त कुटुंब की संपत्ति की उपधारणा की जाती हैं
« »06-Feb-2026
|
डोरायराज बनाम डोराइसामी (मृत) विधिक प्रतिनधि और अन्य “जहाँ संयुक्त हिंदू परिवार के अस्तित्व के दौरान संपत्तियों का अर्जन किया गया हो, तथा यह प्रदर्शित हो कि ऐसी पैतृक संपत्तियाँ विद्यमान हैं जो आय उत्पन्न करती हैं, वहाँ कर्त्ता के नाम से अर्जित की गई संपत्तियों को सामान्यतः संयुक्त हिंदू कुटुंब की संपत्ति माना जाएगा, जब तक कि इसके विपरीत साबित न कर दिया जाए।" न्यायमूर्ति संजय करोल और सतीश चंद्र शर्मा |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
न्यायमूर्ति संजय करोल और सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने डोरायराज बनाम डोराइसामी (मृत) विधिक प्रतिनिधि और अन्य (2026) के मामले में यह प्रतिपादित किया कि एक बार यह स्थापित हो जाए कि कोई ऐसी पैतृक संपत्ति विद्यमान है जो आय उत्पन्न करती है, तो संयुक्त हिंदू कुटुंब के अस्तित्व के दौरान कर्त्ता द्वारा किया गया कोई भी पश्चातवर्ती अर्जन संयुक्त हिंदू कुटुंब की संपत्ति होने की विधिक उपधारणा के अधीन होगा, जब तक कि स्व-अर्जन का दावा करने वाला व्यक्ति सशक्त एवं ठोस साक्ष्य के माध्यम से सबूत का भार साबित न कर दे।।
डोरायराज बनाम डोराइसामी (मृत) विधिक प्रतिनिधि और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- यह मुकदमा 1987 में डोराइसामी द्वारा अपने पिता सेंगन और भाई डोरायराज के विरुद्ध 79 अचल संपत्तियों से संबंधित विभाजन वाद से शुरू हुआ था।
- ये संपत्तियाँ मुख्यतः तिरुचिरापल्ली जिले के पेरम्बालूर तालुक में स्थित कृषि भूमि थीं।
- वादी ने दावा किया कि ये संपत्तियाँ संयुक्त हिंदू परिवार की संपत्तियाँ थीं, जिनका संबंध पैतृक भूमि और उससे उत्पन्न आय से था।
- उच्चतम न्यायालय के समक्ष अपीलकर्त्ता डोरायराज ने दावा किया कि कई संपत्तियाँ या तो उनके पिता सेंगन की स्व-अर्जित संपत्तियाँ थीं या ठेकेदार और कारबार के रूप में अर्जित उनकी अपनी स्वतंत्र आय से उनके द्वारा की गई खरीदारी थीं।
- अपीलकर्त्ता ने सेंगन द्वारा उसके पक्ष में निष्पादित कई विक्रय विलेखों और 24 नवंबर, 1989 की एक अरजिस्ट्रीकृत वसीयत पर विश्वास किया, जिसे कथित तौर पर सेंगन की मृत्यु से कुछ समय पहले निष्पादित किया गया था।
- अपीलकर्त्ता, जो संयुक्त हिंदू परिवार की संपत्ति में सह-भागीदार भाइयों में से एक है, ने संयुक्त संपत्ति में अपना अंश मांगने वाले दूसरे भाई-वादी के विभाजन के वाद का विरोध किया।
- वादपत्र में यह अभिवचन किया गया था कि परिवार निवास, खेती, उपभोग और प्रबंधन में संयुक्त रहा है और मौखिक या लिखित रूप से कभी कोई विभाजन नहीं हुआ था।
- वादपत्र के अनुसार, कर्त्ता के नाम पर या परिवार के अन्य सदस्यों के नाम पर खरीदी गई संपत्तियाँ, सार रूप में, परिवार के लिये और परिवार की ओर से की गई खरीद थीं, जिससे संयुक्त परिवार की संपत्ति का गठन होता है।
- अपीलकर्त्ता ने वादी के विभाजन के दावे का विरोध करते हुए तर्क दिया कि कई संपत्तियाँ उसकी स्वयं अर्जित संपत्ति थीं और उनके पिता ने उन्हें अपनी अपैतृक आय से अर्जित किया था।
- विचारण न्यायालय ने वादी का वाद खारिज कर दिया।
- प्रथम अपीलीय न्यायालय तथा उच्च न्यायालय ने वाद का डिक्री पारित करते हुए, कर्त्ता द्वारा संयुक्त संपत्ति में सम्मिलित की गई संपत्तियों में वादी को 5/16वाँ अंश प्रदान किया, जबकि केवल मद संख्या 66, 74 तथा मद संख्या 36 के एक भाग को इससे अपवर्जित किया।
- अपवर्जित मदों के संबंध में यह साबित किया गया कि वे अपीलकर्त्ता द्वारा पर-पक्षकारों से की गई स्व-अर्जित संपत्तियाँ हैं।
- इस निर्णय से व्यथित होकर अपीलकर्त्ता ने उच्चतम न्यायालय के समक्ष अपील प्रस्तुत की।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- पीठ ने उच्च न्यायालय और प्रथम अपीलीय न्यायालय के एकसमान निष्कर्षों को बरकरार रखा।
- न्यायालय ने यह टिप्पणी की कि एक बार आय उत्पन्न करने में सक्षम पैतृक संपत्तियों का अस्तित्व स्थापित हो जाने के पश्चात्, यह साबित करने का दायित्त्व अपीलकर्त्ता पर आ जाता है कि बाद में किये गए अर्जन स्वतंत्र स्रोतों से किये गए थे।
- न्यायालय ने कहा, "जहाँ संयुक्त परिवार के भरणपोषण के दौरान अर्जन किया जाता हैं, और जहाँ आय उत्पन्न करने वाली पैतृक संपत्तियों का अस्तित्व साबित होता है, वहाँ कर्त्ता के नाम पर अर्जित संपत्तियों को सामान्यतः संयुक्त परिवार की संपत्ति माना जाता है, जब तक कि इसके विपरीत साबित न हो जाए।"
- उच्च न्यायालय ने यह स्वीकार किया कि पृथक् अंशों का उपभोग करना, सिंचाई सुविधाओं की स्थापना करना, या यहाँ तक कि व्यक्तिगत रूप से ऋण प्राप्त करना, स्वयं में विधि की नजर में विभाजन स्थापित नहीं करता है।
- इसके लिये संयुक्त स्थिति को समाप्त करने का स्पष्ट और असंदिग्ध आशय आवश्यक है।
- उच्च न्यायालय ने यथोचित रूप से इस तथ्य पर बल दिया कि समस्त प्रासंगिक अंतरण विलेखों में अंतरण किये गए हितों को अविभाजित अंशों के रूप में वर्णित किया गया है, कि विभाजन को दर्शाने वाला कोई नामांतरण (Mutation) अभिलेख उपलब्ध नहीं है, तथा यह भी कि उधारियों के संबंध में किसी प्रकार का पृथक् संदाय प्रदर्शित नहीं किया गया।
- किसी भी प्रकार की घोषणा अथवा ऐसे आचरण के अभाव में, जो विभाजन के आशय को दर्शाता हो, संयुक्त हिंदू परिवार की निरंतर संयुक्त स्थिति का निष्कर्ष अपरिहार्य था।
- न्यायालय ने कहा कि उच्च न्यायालय ने पहले ही डोरायराज को सीमित अनुतोष प्रदान करते हुए उन विशिष्ट संपत्तियों को अपवर्जित कर दिया था जिन्हें स्पष्ट रूप से अ-सहदायिकी से खरीदा गया था।
- इन अपवर्जनों को छोड़कर, न्यायालय ने समवर्ती निष्कर्षों में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं पाया।
- परिणामस्वरूप, अपील निरस्त की गई।
संयुक्त कुटुंब संपत्ति क्या है?
बारे में:
- हिंदू विधि के अधीन पैतृक संपत्ति के रूप में भी जानी जाने वाली संयुक्त कुटुंब संपत्ति से तात्पर्य उस संपत्ति से है जो किसी हिंदू को अपने पिता, दादा या दादा से विरासत में मिली हो।
- संयुक्त परिवार की संपत्ति किसी एक व्यक्ति की नहीं अपितु हिंदू अविभक्त कुटुंब (HUF) के सभी सदस्यों की सामूहिक संपत्ति होती है।
- परंपरा के अनुसार, परिवार के पुरुष सदस्यों को जन्म से ही संयुक्त परिवार की संपत्ति में हिस्सेदारी प्राप्त हो जाती थी, जिससे उन्हें संपत्ति में जन्मसिद्ध अधिकार मिल जाता था।
- परंपरागत हिंदू विधि के अनुसार, मूल स्वामी से तीन पीढ़ियों तक के पुरुष वंशज संयुक्त हिंदू परिवार की संपत्ति में जन्मसिद्ध अधिकार प्राप्त करते हैं।
- हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम में 2005 में हुए संशोधन के पश्चात्, पुत्रियों को भी पुत्रों के समान संयुक्त परिवार की संपत्ति में जन्मसिद्ध सहदायिकी का अधिकार प्राप्त हो जाता है।
- जब तक संपत्ति का बंटवारा नहीं हो जाता, तब तक कोई भी सहदायिकी (जन्मसिद्ध अधिकार वाला सदस्य) संयुक्त परिवार की संपत्ति के किसी विशिष्ट अंश पर दावा नहीं कर सकता, क्योंकि प्रत्येक सदस्य का पूरी संपत्ति में अविभाजित अधिकार होता है।
- संयुक्त हिंदू परिवार की संपत्ति का प्रबंधन सामान्यतः परिवार के ज्येष्ठ पुरुष सदस्य, अर्थात् कर्त्ता, द्वारा किया जाता है।
प्रबंधन और अन्य संक्रामण:
- कर्त्ता समस्त सहदायिकी की ओर से संयुक्त हिंदू परिवार की संपत्ति का प्रबंधन करता है, परंतु उसके अंतरण की शक्तियां सीमित होती हैं।
- कर्त्ता विधिक आवश्यकता, संपत्ति के लाभ या सभी स सहदायिकी की सहमति के बिना संयुक्त परिवार की संपत्ति का अंतरण नहीं कर सकता है।
- यह प्रतिबंध उन समस्त परिवारजनों के हितों की रक्षा हेतु है, जिन्हें संपत्ति में जन्मसिद्ध अधिकार प्राप्त है।
अधिकारों की प्रकृति:
- प्रत्येक सहदायिकी का संपूर्ण संयुक्त पारिवारिक संपत्ति में अविभाजित हित होता है, न कि किसी विशिष्ट भाग में।
- संपत्ति का सहदायिकी के बीच विभाजन होने पर ही अधिकार निश्चित हो जाते हैं।
- जब तक संपत्ति का बंटवारा नहीं हो जाता, तब तक वह सभी सदस्यों के बीच संयुक्त और अविभाजित रहती है।
संयुक्त पारिवारिक संपत्ति और स्व-अर्जित संपत्ति के बीच अंतर:
अर्जन का स्रोत:
- संयुक्त हिंदू कुटुंब संपत्ति वह पैतृक संपत्ति होती है, जो तीन पीढ़ियों (पिता, पितामह एवं प्रपितामह) के माध्यम से उत्तराधिकार से प्राप्त होती है।
- स्व-अर्जित संपत्ति वह संपत्ति होती है, जिसे किसी व्यक्ति ने अपने व्यक्तिगत प्रयासों से, बिना संयुक्त परिवार की संपत्ति अथवा उसके मूल स्रोत का उपयोग किये अर्जित किया हो।
- स्वयं अर्जित संपत्ति व्यक्तिगत आय, व्यक्तिगत उद्यम या व्यक्तिगत कौशल के माध्यम से पैतृक संसाधनों का सहारा लिये बिना प्राप्त की जा सकती है।
स्वामित्व अधिकार:
- संयुक्त हिंदू परिवार संपत्ति समस्त सहदायिकी की सामूहिक संपत्ति होती है, जिसमें वे जन्म से अधिकार प्राप्त करते हैं।
- स्व-अर्जित संपत्ति का स्वामित्व विशिष्ट रूप से उसी व्यक्ति के पास होता है जिसने उसे अर्जित किया है।
- स्व-अर्जित संपत्ति का स्वामी उस पर पूर्ण एवं निरंकुश अधिकार रखता है, जिसमें उसे बिना किसी अन्य परिवारजन की सहमति के विक्रय, बंधक, दान अथवा वसीयत द्वारा अंतरण करने का अधिकार सम्मिलित है।
संचरण:
- संयुक्त कुटुंब की संपत्ति उत्तराधिकार के आधार पर सहदायिकी के बीच स्वतः ही अंतरित हो जाती है।
- मात्र इस आधार पर कि स्व-अर्जित संपत्ति के स्वामी के पुत्र अथवा पुत्रियाँ हैं, वह संपत्ति स्वतः संयुक्त हिंदू कुटुंब की संपत्ति में परिवर्तित नहीं हो जाती।
- जब संयुक्त हिंदू कुटुंब की संपत्ति का विभाजन किया जाता है, तो विभाजन के उपरांत प्रत्येक प्राप्तकर्त्ता को प्राप्त अंश उसकी स्व-अर्जित संपत्ति के रूप में परिवर्तित हो जाता है।
परिवर्तन:
- कोई व्यक्ति " विलय (Blending)" के सिद्धांत के माध्यम से स्वेच्छा से अपनी स्व-अर्जित संपत्ति को संयुक्त कुटुंब की संपत्ति में परिवर्तित कर सकता है।
- संपत्ति के विलय के लिये पृथक् अधिकारों को त्यागने और संपत्ति को संयुक्त कुटुंब की संपत्ति में विलीन करने का स्पष्ट आशय होना आवश्यक है।
- मात्र यह तथ्य कि अन्य परिवारजनों ने उस संपत्ति का उपयोग किया अथवा उससे लाभ प्राप्त किया, स्व-अर्जित संपत्ति को स्वतः संयुक्त हिंदू कुटुंब की संपत्ति में परिवर्तित नहीं करता।
आय का सृजन:
- संयुक्त हिंदू कुटुंब की संपत्ति से उत्पन्न आय संयुक्त हिंदू कुटुंब की संपत्ति का ही अभिन्न अंग मानी जाएगी।
- स्वयं द्वारा अर्जित संपत्ति से प्राप्त आय स्वयं द्वारा अर्जित ही रहती है, जब तक कि उसे विशेष रूप से संयुक्त कुटुंब की संपत्ति के साथ मिश्रित न कर दिया जाए।
सबूत का भार:
- यह साबित करने का भार कि कोई संपत्ति संयुक्त हिंदू कुटुंब की संपत्ति है, उस व्यक्ति पर होता है जो ऐसा दावा करता है।
- तथापि, यदि विद्यमान मूलधन (पैतृक संपत्ति) के साक्ष्य स्थापित हो जाते हैं, तो स्व-अर्जित होने का दावा करने वाले व्यक्ति पर सबूत का भार स्थानांतरित हो जाता है।
- एक बार पैतृक, आय-उत्पादक संपत्ति का अस्तित्व साबित हो जाने पर, कर्त्ता द्वारा बाद में किये गए अर्जन को संयुक्त कुटुंब की संपत्ति माना जाता है, जब तक कि अन्यथा साबित न हो जाए।
निपटान के अधिकार:
- संयुक्त परिवार की संपत्ति में, कोई भी सदस्य बिना सहमति या विधिक औचित्य के एकतरफा रूप से संपत्ति का निपटान नहीं कर सकता है।
- स्वयं द्वारा अर्जित संपत्ति में, स्वामी को अपनी इच्छानुसार संपत्ति का निपटान करने की पूर्ण स्वतंत्रता होती है।