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आपराधिक कानून
यदि अभियुक्त को आरोप पढ़कर सुनाए जाएं तो बिना हस्ताक्षर वाली आरोपपत्र घातक नहीं होती
«27-Mar-2026
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संदीप यादव बनाम सतीश और अन्य "आरोपपत्र पर हस्ताक्षर न होने से संबंधित दोष किसी प्रकार अवैध नहीं है। यह अधिक से अधिक, दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 215 और 464 के अंतर्गत एक सुधरने योग्य प्रक्रियात्मक अनियमितता है। न्याय में किसी प्रकार की विफलता सिद्ध न होने की स्थिति में, ऐसा दोष कार्यवाही को अमान्य नहीं कर सकता।" न्यायमूर्ति आर. महादेवन और अहसानुद्दीन अमानुल्लाह |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
भारत के उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और आर. महादेवन की पीठ ने संदीप यादव बनाम सतीश और अन्य (2026) के मामले में यह निर्णय दिया कि आरोप विरचित करने के आदेश पत्र पर हस्ताक्षर न करने से विचारण अमान्य नहीं होता है, जहाँ अभियुक्तों को आरोप विधिवत पढ़कर सुनाए गए थे, उन्होंने आरोपों की प्रकृति को समझा था और विचारण की कार्यवाही में सक्रिय रूप से भाग लिया था।
- न्यायालय ने आगे कहा कि निर्णायक कसौटी प्रक्रियात्मक दोष का अस्तित्व नहीं है, अपितु यह है कि क्या अभियुक्त को अपनी प्रतिरक्षा के संचालन में गुमराह किया गया था और क्या वास्तव में न्याय की विफलता हुई है।
संदीप यादव बनाम सतीश और अन्य (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- अभियुक्तों के विरुद्ध भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 147, 148, 149, 307, 302 और 120ख के अधीन प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज की गई।
- आरोप पत्र दाखिल होने के बाद, मामले को विचारण के लिये सेशन न्यायालय को सौंप दिया गया।
- विचारण न्यायालय ने एक को छोड़कर बाकी सभी अभियुक्तों के विरुद्ध आरोप पत्र विरचित करने की कार्यवाही शुरू की, उस एक अभियुक्त ने स्वयं को निर्दोष बताया।
- अभियुक्तों को आरोप पढ़कर सुनाए गए और समझाए गए। तथापि, आरोप पत्र विरचित करने वाली आदेश पुस्तिका पर विचारण न्यायालय के हस्ताक्षर नहीं थे।
- अभियुक्तों ने आरोप विरचित होने के बाद विचारण की कार्यवाही में सक्रिय रूप से भाग लिया, जिसमें अभियोजन पक्ष के साक्षियों से व्यापक प्रतिपरीक्षा भी शामिल थी, और उन्होंने कोई आपत्ति नहीं उठाई।
- दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 313 के अधीन परीक्षा के प्रक्रम में ही अभियुक्त को यह अहसास हुआ कि आरोप पत्र विरचित करने वाले आदेश पर हस्ताक्षर नहीं थे।
- इस आधार पर नए सिरे से विचारण की मांग करते हुए, अभियुक्त ने धारा 482 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन इलाहाबाद उच्च न्यायालय में एक आवेदन दायर किया।
- उच्च न्यायालय ने आवेदन मंजूर कर लिया और नए सिरे से विचारण करने का निदेश दिया। इस आदेश से असंतुष्ट होकर परिवादकर्त्ता ने उच्चतम न्यायालय में अपील की।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- उच्चतम न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश को अपास्त करते हुए कहा कि आरोप-विरचित करने के आदेश पत्र पर हस्ताक्षर का न होना धारा 215 और 464 दण्ड प्रक्रिया संहिता के दायरे में आने वाली एक उपचार योग्य प्रक्रियात्मक अनियमितता है और यह विचारण को अमान्य करने वाली अवैधता नहीं है।
- न्यायालय ने पाया कि जहाँ अभियुक्त आरोपों की प्रकृति को स्पष्ट रूप से समझता था और उसे प्रतिरक्षा करने का पूरा अवसर मिला था, वहाँ आरोप में खामियों को निर्णायक नहीं माना जा सकता। न्यायालय ने तर्क दिया कि औपचारिक रूप से आरोप विरचित न होना भी कार्यवाही को अमान्य नहीं करता - निर्णायक कसौटी यह है कि क्या अभियुक्त को अपनी प्रतिरक्षा के संचालन में गुमराह किया गया था और क्या इससे न्याय में विफलता हुई है।
- न्यायालय ने कहा कि प्रतिरक्षा पक्ष ने कार्यवाही में सक्रिय रूप से भाग लिया और अभियोजन पक्ष के साक्षियों से विस्तृत प्रतिपरीक्षा की। प्रतिपरीक्षा की प्रकृति से स्पष्ट होता है कि अभियुक्त अभियोजन पक्ष के मामले से पूरी तरह अवगत थे, जिसमें उनकी कथित भूमिकाएँ, अपराध करने का तरीका और प्रतिरक्षा पक्ष द्वारा प्रस्तुत किये जाने वाले तर्क, जिनमें ‘plea of alibi’ (घटनास्थल पर मौजूद न होने का दावा) भी शामिल था, सभी शामिल थे।
- न्यायालय ने माना कि विचारण की पूरी कार्यवाही के दौरान अभियुक्तों की निरंतर सहभागिता और कथित त्रुटि पर कोई आपत्ति न उठाने से यह और पुष्ट होता है कि उन्हें न तो गुमराह किया गया और न ही किसी भी प्रकार से उनके साथ विभेद किया गया। यद्यपि आरोप पत्र पर हस्ताक्षर न होना एक प्रक्रियात्मक लोप है, लेकिन इससे कार्यवाही अमान्य नहीं हो जाती, क्योंकि आरोप पत्र वास्तव में न्यायालय और संबंधित पक्षकारों द्वारा तैयार किया गया, दर्ज किया गया, पढ़ा गया और उस पर कार्रवाई की गई थी।
- तदनुसार, न्यायालय ने माना कि उच्च न्यायालय द्वारा पर्याप्त प्रगति होने और साक्ष्य अभिलिखित किये जाने के बाद नए सिरे से विचारण का निदेश देना उचित नहीं था। अपील मंजूर करते हुए विचारण न्यायालय को आदेश दिया गया कि वह मामले को विवादित आदेश से पूर्व की स्थिति से आगे बढ़ाए और विधि के अनुसार कार्यवाही को शीघ्रता से समाप्त करे।
आदेश-पत्र (Order Sheet) क्या है?
- आदेश-पत्र (Order Sheet) एक आधिकारिक अभिलेख है जिसे न्यायालय द्वारा प्रत्येक मामले में रखा जाता है, जिसमें पीठासीन न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट सुनवाई की प्रत्येक तिथि पर पारित सभी आदेशों, निर्देशों और कार्यवाही को अभिलिखित करते हैं।
- साधारण शब्दों में कहें तो, यह मामले की दैनिक डायरी की तरह है - जब भी मामला न्यायालय के सामने आता है, न्यायाधीश उस दिन हुई घटना और अगले कदम को लिख लेते हैं, और फिर प्रविष्टि को प्रमाणित करने के लिये उस पर हस्ताक्षर कर देते हैं।
इसमें सामान्यत: क्या शामिल होता है:
- सुनवाई की तिथि
- उपस्थित पक्षकारों या उनके अधिवक्ताओं के नाम
- उस दिन न्यायालय में जो कुछ घटित हुआ उसका संक्षिप्त सारांश
- न्यायालय द्वारा पारित आदेश या निदेश
- अगली सुनवाई की तारीख
- न्यायाधीश के हस्ताक्षर - जो सबसे महत्त्वपूर्ण भाग है, क्योंकि यह आदेश को प्रमाणित करता है।