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पारिवारिक कानून
'अपरिवर्तनीय विघटन' के आधार पर दिया गया विदेशी तलाक भारत में प्रवर्तनीय नहीं है
« »19-Mar-2026
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के. बनाम के. "चूँकि विवाह भारत में हिंदू रीति-रिवाजों एवं संस्कारों के अनुसार संपन्न हुआ था, अतः पक्षकारों पर हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के प्रावधान लागू होंगे, भले ही वे तत्पश्चात विदेश में जाकर बस गए हों।" न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और संदीप मेहता |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने के. बनाम के. (2026) के मामले में बॉम्बे उच्च न्यायालय के निर्णय को अपास्त कर दिया और निर्णय दिया कि विवाह के अपरिवर्तनीय विघटन के आधार पर अमेरिकी न्यायालय द्वारा पारित तलाक की डिक्री भारत में प्रवर्तनीय नहीं है ।
- न्यायालय ने इस बात की पुष्टि की कि भारत में हिंदू रीति-रिवाजों के अधीन विवाह करने वाले पक्षकार अपने बाद के निवास स्थान के होते हुए भी हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (HMA) द्वारा शासित रहते हैं, भले ही वे विदेश में कहीं भी निवास करें, और किसी गैर-मान्यता प्राप्त आधार पर तलाक देने वाली विदेशी डिक्री भारतीय न्यायालय की अधिकारिता को समाप्त नहीं कर सकती है।
के. बनाम के. (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- दोनों पक्षकारों ने दिसंबर 2005 में मुंबई में हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह किया था, तथापि वे संयुक्त राज्य अमेरिका में रहते थे।
- वे 2007 में भारत यात्रा के दौरान पुणे (औंघ) में कुछ समय के लिये साथ रहे और सितंबर 2008 तक अमेरिका में सहवास जारी रखा।
- पत्नी ने अमेरिका के मिशिगन स्थित सर्किट कोर्ट में तलाक की कार्यवाही प्रारंभ की। पति ने अधिकारिता पर आक्षेप किया लेकिन आगे कार्यवाही में भाग नहीं लिया।
- फरवरी 2009 में, अमेरिकी न्यायालय ने विवाह के अपरिवर्तनीय विघटन के आधार पर तलाक मंजूर कर दिया, साथ ही वित्तीय निदेश भी जारी किये।
- इसी दौरान पति ने हिंदू विवाह अधिनियम के अधीन पुणे कुटुंब न्यायालय में तलाक की याचिका दायर की।
- पुणे कुटुंब न्यायालय ने अपनी अधिकारिता को बरकरार रखा; यद्यपि, बॉम्बे उच्च न्यायालय ने इसे पलट दिया, यह मानते हुए कि पक्षकार अमेरिका में अधिवासित थे।
- पति ने उच्चतम न्यायालय में अपील की।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- हिंदू विवाह अधिनियम की प्रयोज्यता पर: न्यायालय ने माना कि चूँकि विवाह भारत में हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार संपन्न हुआ था, इसलिये हिंदू विवाह अधिनियम पक्षकारों पर लागू होता रहेगा, चाहे उनका निवास स्थान विदेश में कहीं भी हो।
- आधार की गैर-मान्यता पर: चूँकि अपरिवर्तनीय विघटन हिंदू विवाह अधिनियम के अधीन एक मान्यता प्राप्त आधार नहीं है, इसलिये इस पर आधारित अमेरिकी डिक्री को भारत में लागू नहीं किया जा सकता है।
- अधिकारिता के संबंध में: चूँकि पति ने कभी भी मिशिगन न्यायालय की अधिकारिता को स्वीकार नहीं किया है, इसलिये वह उसकी डिक्री से बाध्य नहीं हो सकता है।
- अनुच्छेद 142 के अधीन अनुतोष: विदेशी डिक्री को अप्रवर्तनीय मानते हुए भी, न्यायालय ने अनुच्छेद 142 के अधीन अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए अपरिवर्तनीय विघटन के आधार पर तलाक प्रदान किया, यह देखते हुए कि पक्षकार 2008 से पृथक् रह रहे थे और व्यवहार में कोई वैवाहिक बंधन विद्यमान नहीं था।
विवाह का अपरिवर्तनीय विघटन क्या है?
बारे में:
- विवाह का अपरिवर्तनीय विघटन उस स्थिति को कहते हैं जहाँ पति-पत्नी काफी समय से पृथक् रह रहे हों और उनके बीच सुलह की कोई संभावना न हो। ऐसे विवाह को जबरदस्ती जारी रखना अपने आप में क्रूरता का कार्य माना जाता है।
उत्पत्ति और विकास:
- इस अवधारणा की उत्पत्ति 1921 में न्यूजीलैंड में हुई थी (लॉडर बनाम लॉडर)।
- भारत में सर्वप्रथम सरोज रानी बनाम सुदर्शन कुमार चड्ढा (1984) के मामले में इसे स्वीकार किया गया, जहाँ उच्चतम न्यायालय ने सुझाव दिया कि तलाक तब दिया जा सकता है जब विवाह इस हद तक टूट गया हो कि उसे ठीक करना असंभव हो।
- यद्यपि, न्यायालयों ने निरंतर यह माना है कि केवल इसी आधार पर तलाक नहीं दिया जा सकता है - जिसकी पुष्टि भगत बनाम डी. भगत (1993) और अमरेंद्र एन. चटर्जी बनाम श्रीमती कल्पना चटर्जी (2022) में की गई है।
वर्तमान विधिक स्थिति:
- हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 अपरिवर्तनीय विघटन को तलाक के लिये एक सांविधिक आधार के रूप में मान्यता नहीं देता है।
- विधि आयोग ने अपनी 71वीं रिपोर्ट (1978) में और फिर 2009 में इसे शामिल करने की सिफारिश की थी, लेकिन विधायिका ने इस पर कोई कार्रवाई नहीं की है।
- विवाह विधि (संशोधन) विधेयक, 2010 ने औपचारिक रूप से इस आधार को पेश करने का प्रयास किया, लेकिन यह अभी तक पारित नहीं हो पाया है।
- न्यायालय सांविधिक आधारों की जांच करते समय इसे एक कारक के रूप में विचार कर सकते हैं, लेकिन केवल इसी आधार पर तलाक नहीं दे सकते।
अपरिवर्तनीय विघटन सिद्धांत क्या है?
- यह सिद्धांत वैवाहिक संबंध में ऐसी विफलता को अपरिवर्तनीय मानता है, जिसमें पति-पत्नी के एक साथ रहने की कोई संभावना नहीं रह जाती। इसके अनुसार, जब वैवाहिक संबंध सुलह की सीमा से परे बिगड़ जाता है, तो विवाह को विधिक रूप से समाप्त कर देना चाहिये, क्योंकि व्यावहारिक रूप से विवाह के कायम न रह पाने की स्थिति में साझा अधिकारों और उत्तरदायित्त्वों को बनाए रखना अनुचित हो जाता है।
- न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्णा अय्यर ने इस अवधारणा को इस प्रकार समझाया कि विवाह का वास्तविक विघटन तब होता है जब पति-पत्नी के बीच असंगति असहनीय हो जाती है - यह रिश्ते की विधिक निरंतरता के बजाय उसकी जमीनी हकीकत को स्वीकार करता है।
उच्चतम न्यायालय द्वारा विचार किये गए कारक:
- दोनों पक्षकारों के बीच सहवास की अवधि।
- अंतिम सहवास के बाद बीता हुआ समय।
- पक्षकारों द्वारा एक दूसरे के विरुद्ध लगाए गए आरोपों की प्रकृति।
- पक्षकारों के बीच विधिक कार्यवाही में पारित आदेश।
- विवाद के निपटारे के लिए परिवार के सदस्यों द्वारा किये गए प्रयास।
- अलगाव की अवधि 6 वर्ष से अधिक होना।
अपरिवर्तनीय विघटन के संबंध में विधिक उपबंध क्या है?
- संविधान का अनुच्छेद 142 उच्चतम न्यायालय को किसी भी मामले में 'पूर्ण न्याय' करने के लिये आवश्यक डिक्री या आदेश पारित करने का अधिकार देता है - जो इस आधार पर तलाक देने का प्राथमिक सांविधानिक आधार है।
- अनुच्छेद 142 के अधीन शक्ति का प्रयोग मौलिक सामान्य और विशिष्ट लोक नीति संबंधी विचारों द्वारा निर्देशित होना चाहिये और मौलिक अधिकारों तथा संविधान की अन्य बुनियादी विशेषताओं के अनुरूप होना चाहिये।
- इस अवधारणा को केवल वहीं लागू किया जा सकता है जहाँ किसी भी मूल विधि में इसके विरुद्ध कोई स्पष्ट निषेध न हो।
- हिंदू विवाह अधिनियम के अधीन, पारस्परिक सम्मति से विवाह-विच्छेद के लिये एक संयुक्त याचिका, एक वर्ष की पृथक्करण अवधि और दो आवेदनों के बीच अनिवार्य छह महीने की प्रतीक्षा अवधि की आवश्यकता होती है - जिससे अनुच्छेद 142 एकतरफा अपरिवर्तनीय विघटन के मामलों में एकमात्र उपलब्ध मार्ग बन जाता है।
- तथापि न्यायिक निर्णयों के माध्यम से इस सिद्धांत को अनौपचारिक वैधता प्राप्त हो गई है, लेकिन इसे अभी तक विधायी कार्रवाई के माध्यम से हिंदू विवाह अधिनियम में शामिल नहीं किया गया है।
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