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सिविल कानून

वरिष्ठ नागरिक अधिनियम का भूतलक्षी प्रभाव नहीं है

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 24-Mar-2026

एम.एम. रमेश बनाम एम.एस. मणिकावासगम और अन्य 

"यह अधिनियम केवल अधिनियम के प्रारंभ होने के पश्चात् संपत्ति के अंतरण पर लागू होगा और इसका भूतलक्षी प्रभाव नहीं दिया जा सकता है।" 

मुख्य न्यायाधीश एस.. धर्माधिकारी और न्यायमूर्ति जी. अरुल मुरुगन 

स्रोत: मद्रास उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

मद्रास उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एस.ए. धर्माधिकारी और न्यायमूर्ति जी. अरुल मुरुगन की पीठ नेएम.एम. रमेश बनाम एम.एस. मणिकवासगम और अन्य (2026) के मामलेमें एकल न्यायाधीश के उस आदेश को अपास्त कर दियाजिसमें 2004 में निष्पादित निपटान विलेख को रद्द करने का निर्णय बरकरार रखा गया था। न्यायालय ने कहा कि माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम, 2007 को इसके प्रारंभ होने से पूर्व हुए संपत्ति अंतरणों पर भूतलक्षी रूप से लागू नहीं किया जा सकता हैजिससे पुत्र का संबंधित संपत्ति पर स्वामित्व बहाल हो गया और उसे निदेश दिया गया कि यदि उसके पिता उससे संपर्क करें तो वह उन्हें आवासीय आवास प्रदान करे। 

एम.एम. रमेश बनाम एम.एस. मणिकवासगम और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • पिता एम.एस. मणिकवासगम ने 23 जून, 2004 को एक समझौता विलेखनिष्पादित कियाजिसमें उन्होंने अपने पुत्र एम.एम. रमेश को प्रेम और स्नेह के साथ और भविष्य की सुरक्षा के रूप में संपत्ति अंतरित की। 
  • पिता के निर्देशों के अनुसारपुत्र ने संपत्ति में अपने भाई के अधिकारों को त्यागने के लिये उसे 1,50,000 रुपए का संदाय किया। 
  • 2016 मेंपिता ने समझौता विलेख को शून्य और अकृत घोषित करने और उसके प्रतिसंहरण को वैध ठहराने के लिये एक सिविल वाद दायर किया। वाद खारिज कर दिया गयाऔर अपील में भी खारिज करने के निर्णय को बरकरार रखा गया। 
  • 21 अक्टूबर 2019 कोपिता ने वरिष्ठ नागरिक अधिनियम, 2007 के अधीन राजस्व मंडल अधिकारी (RDO) के समक्ष परिवाद दर्ज कराया। राजस्व मंडल अधिकारी ने यह कहते हुए परिवाद खारिज कर दी कि पिता को मासिक पारिवारिक पेंशन मिलती है और सिविल न्यायालयों ने पहले ही उनके विरुद्ध निर्णय दिया है। राजस्व मंडल अधिकारी ने यह भी कहा कि पिता के चार अन्य बच्चे भी उनका भरण-पोषण करने के लिये बाध्य हैं। 
  • पिता की जिला कलेक्टर के समक्ष दायर अपील को भी इसी प्रकार खारिज कर दिया गया। 
  • ततपश्चात् पिता नेमद्रास उच्च न्यायालय में एकरिट याचिका दायर कीजिसमें एकएकल न्यायाधीश ने समझौता विलेख को रद्द करने के निर्णय को बरकरार रखाऔर पुत्र को संपत्ति का खाली कब्जा पिता को सौंपने का निदेश दिया। 
  • इससे व्यथित होकर पुत्र ने खंडपीठ के समक्ष यह अपील दायर की। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

अधिनियम के भूतलक्षी प्रभाव पर: 

  • न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरणपोषण तथा कल्याण अधिनियम, 2007 भावी प्रकृति काहै और यह केवल 29 सितंबर, 2008 कोइसके लागू होने के पश्चात्किये गए संपत्ति अंतरणों पर ही लागू होता है। चूँकि समझौता विलेख 2004 में निष्पादित किया गया थाइसलिये इसे शून्य करने के लिये अधिनियम का सहारा नहीं लिया जा सकता। 
  • न्यायालय ने अधिनियम की धारा 23 पर विश्वास कियाजिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है किअधिनियम के लागू होने के बाद किसी वरिष्ठ नागरिकद्वारा किया गया अंतरण तभी शून्य होगाबशर्ते अंतरिती बुनियादी सुविधाएँ और देखभाल प्रदान करने में विफल रहे। विधिक भाषा स्वयं ही भूतलक्षी प्रभाव को रोकती है।

रद्द करने के गुण-दोषों पर: 

  • न्यायालय ने कहा कि राजस्व मंडल अधिकारी (RDO) ने मूल परिवाद को ठोस आधार पर खारिज कर दिया था - पिता को मासिक पेंशन मिलती थी और सिविल न्यायालयों ने पहले ही संपत्ति विलेख को चुनौती देने के उनके निर्णय को खारिज कर दिया था। न्यायालय ने इस बात पर भी बल दिया किमाता-पिता का भरण-पोषण करने का दायित्त्व सांविधिक  है और संपत्ति के कब्जे पर निर्भर नहीं हैजिसका अर्थ है कि संपत्ति विवाद के परिणाम की परवाह कियये बिना पुत्र अपने पिता का भरण-पोषण करने के लिए बाध्य रहेगा। 

माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम, 2007 क्या है? 

बारे में: 

  • भारत में माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण और कल्याण के लिये अधिक प्रभावी प्रावधान प्रदान करने हेतु माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम, 2007 को अधिनियमित किया गया था। अधिनियम के अनुसार, "वरिष्ठ नागरिक" वह व्यक्ति है जो भारत का नागरिक है और जिसकी आयु 60 वर्ष या उससे अधिक हो चुकी है। 

मुख्य उपबंध: 

  • भरण-पोषण दायित्त्व (धारा 4-18): बालकों का अपने माता-पिता का भरण-पोषण करने का विधिक दायित्त्व हैऔर नातेदारों का निःसंतान वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण करने का दायित्त्व है। 
  • अधिकरणों की स्थापना (धारा 7): राज्य सरकारों को भरण-पोषण दावों का निपटारा करने के लिये भरण-पोषण अधिकरणों की स्थापना करनी होगी। 
  • वृद्धाश्रम (धारा 19): राज्य सरकारों को प्रत्येक जिले में वृद्धाश्रम स्थापित करने की आवश्यकता है। 
  • चिकित्सा सहायता (धारा 20): वरिष्ठ नागरिकों के लिये चिकित्सा देखरेख के उपबंध 
  • जीवन और संपत्ति की सुरक्षा (धारा 21-23): वरिष्ठ नागरिकों के जीवन और संपत्ति की सुरक्षा के उपाय।