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सांविधानिक विधि

दिव्यांगजनों की सार्वजनिक भवनों तक सुगम्यता

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 11-Mar-2024

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

परिचय:

केंद्रीय लोक निर्माण विभाग (CPWD) ने अपने क्षेत्रीय कार्यालयों को यह सुनिश्चित करने के लिये निर्देश जारी किये हैं कि सभी दिव्यांगजनों (PwD) की सार्वजनिक भवन तक पहुँच सुलभ हो। यह कदम दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 और सरकार द्वारा निर्धारित दिशानिर्देशों के अनुपालन में अत्यधिक विलंब के बाद आया है।

दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 क्या है?

  • अधिनियमन और प्रवर्तन तिथियाँ:
    • इसे 27 दिसंबर, 2016 को निः शक्त व्यक्ति (समान अवसर, अधिकार संरक्षण और पूर्ण भागीदारी) अधिनियम, 1995 के स्थान पर अधिनियमित किया गया था।
    • यह अधिनियम 19 अप्रैल, 2017 को लागू हुआ, जिससे भारत में दिव्यांगजनों (PWD) के अधिकारों और मान्यता के एक नए युग की शुरुआत हुई।
  • अधिनियम से संबंधित अभिसमय:
    • दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016, विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (UNCRPD) के साथ निकटता से जुड़ा हुआ है, जिसे भारत ने वर्ष 2007 में अंगीकार किया था।
    • UNCRPD दुनिया भर में दिव्यांगजनों की गरिमा, स्वायत्तता और अधिकारों को बनाए रखना चाहता है।
  • प्रमुख विशेषताएँ:
    • अधिनियम शारीरिक, बौद्धिक, मानसिक और संवेदी दुर्बलताओं सहित 21 स्थितियों को शामिल करने के लिये विकलांगता के दायरे को बढ़ाता है।
    • यह अनिवार्य करता है कि शैक्षणिक संस्थान और सरकारी संगठन विकलांग व्यक्तियों के लिये सीटें एवं पद आरक्षित करें, जिससे उनकी शिक्षा व रोज़गार के अवसरों तक पहुँच सुनिश्चित हो सके।
    • यह अधिनियम सार्वजनिक स्थानों, परिवहन और सूचना तथा संचार प्रौद्योगिकियों में बाधा मुक्त वातावरण के निर्माण पर ज़ोर देता है, जिससे विकलांग व्यक्तियों के लिये अधिक पहुँच संभव हो सके।
    • यह सरकार को विकलांग व्यक्तियों की सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य देखभाल और पुनर्वास के लिये योजनाएँ एवं कार्यक्रम तैयार करने का आदेश देता है।
    • यह अधिनियम सार्वभौमिक पहुँच सुनिश्चित करने के लिये सार्वजनिक भवनों के लिये दिशानिर्देश और मानक तैयार करने का भी आदेश देता है।

दिव्यांगजन नियम, 2017 में सार्वजनिक भवनों के लिये क्या अधिदेश हैं?  

  • दिव्यांगजन अधिकार नियम, 2017 का नियम 15, भौतिक वातावरण, परिवहन और सूचना तथा संचार प्रौद्योगिकी के लिये पहुँच मानकों का वर्णन करता है।
  • हालिया संशोधन सभी प्रतिष्ठानों के लिये वर्ष 2021 के सामंजस्यपूर्ण दिशानिर्देशों के अनुपालन को अनिवार्य बनाते हैं।
  • इन व्यापक दिशानिर्देशों में विभिन्न पहलुओं को शामिल किया गया है, जिसमें वास्तुशिल्प योजना से लेकर रैंप और ऑडियो-विज़ुअल सहायता जैसी पहुँच सुविधाओं की स्थापना करना शामिल है।

कार्यान्वयन में प्रगति और चुनौतियाँ क्या हैं?

  • दिशानिर्देश जारी होने के बावजूद, राज्यों द्वारा भवन उपनियमों में पहुँच मानकों को शामिल करना एक महत्त्वपूर्ण चुनौती बनी हुई है।
  • शहरी मामलों के राष्ट्रीय संस्थान (NIUA) इस एकीकरण की सक्रिय रूप से वकालत कर रहा है लेकिन उसे प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा है।
  • हालाँकि हितधारकों को प्रशिक्षित करने और जागरूकता बढ़ाने के प्रयास किये गए हैं, परंतु कार्यान्वयन की गति धीमी बनी हुई है।

सार्वजनिक भवनों में पहुँच की क्या स्थिति है?

  • सुगम्य भारत अभियान, 2015:
    • दिव्यांगजनों को सशक्त बनाने के लिये वर्ष 2015 में सुगम्य भारत अभियान शुरू किया गया था।
    • यह अभियान भौतिक वातावरण, परिवहन, सहायक प्रौद्योगिकियों और डिजिटल प्लेटफॉर्म सहित विभिन्न पहलुओं को संबोधित करता है।
    • संयुक्त राष्ट्र के प्रति भारत की प्रतिबद्धताओं के बावजूद, वर्ष 2015 से पहले सुगम्यता पर अपर्याप्त ध्यान दिया गया था।
    • अभियान के स्तंभों में निर्मित पर्यावरण, परिवहन और सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्र शामिल थे।
    • पहल में हवाई अड्डों, रेलवे स्टेशनों और सार्वजनिक परिवहन केंद्रों में संशोधन भी शामिल थे।
    • सुलभ वेबसाइटों, दस्तावेज़ों और प्रशिक्षित सांकेतिक भाषा दुभाषियों पर ध्यान केंद्रित किया गया।
  • वर्तमान स्थिति:
    • वर्ष 2015 में शुरू किये गए सुगम्य भारत अभियान का उद्देश्य सार्वजनिक बुनियादी ढाँचे तक दिव्यांगजनों की पहुँच को बढ़ाना था।
    • हालाँकि, मौजूदा भवनों की सीमित पुनःसंयोजन के साथ प्रगति असमान रही है।
    • कार्यान्वयन एजेंसियों के बीच जागरूकता एवं जवाबदेही की कमी ने इस मुद्दे को जटिल बना दिया है, जिसके परिणामस्वरूप असंगत परिणाम और आवंटित निधि का कम उपयोग हो रहा है।

निष्कर्ष:

सार्वजनिक भवनों में सार्वभौमिक पहुँच सुनिश्चित करना न केवल एक कानूनी दायित्व है बल्कि एक नैतिक अनिवार्यता भी है। CPWD का हालिया निर्देश सही दिशा में एक कदम का संकेत देता है, लेकिन दिशानिर्देशों को ठोस परिणामों में बदलने के लिये और अधिक ठोस प्रयास करने की आवश्यकता है।