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आपराधिक कानून

राजद्रोह कानून

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 29-Aug-2023

परिचय

  • राजद्रोह कानून सबसे विवादास्पद कानूनों में से एक है जो औपनिवेशिक अतीत से भारत की हालिया कानूनी प्रणाली में अभी भी मौजूद है।
  • यह उन कार्यों या भाषण को संदर्भित करता है जो स्थापित सत्ता के खिलाफ प्रतिरोध को उकसाते हैं या मौजूदा सरकार के खिलाफ विद्रोह को भड़काते हैं।
  • ब्रिटिश सरकार द्वारा तैयार किये गए कानून का उद्देश्य भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को दबाना था, इस कानून का इस्तेमाल औपनिवेशिक प्रशासन द्वारा भारतीय नेताओं को गैर-विशिष्ट लेकिन व्यापक आरोपों में कैद करने के लिये प्रभावी ढंग से किया गया था।

पृष्ठभूमि

  • एस.जी. वोम्बटकेरे बनाम भारत संघ (2022) मामले में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद राजद्रोह कानून की पुन: जाँच की प्रक्रिया शुरू हुई।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने प्रावधान पर रोक लगाते हुए फ़ैसला सुनाया कि यह कानून अब सामाजिक पृष्ठभूमि के अनुरूप नहीं है।
  • हालाँकि, 22वें विधि आयोग (Law Commission) ने 153 साल पुराने औपनिवेशिक कानून को बरकरार रखने की सिफारिश करते हुए कहा कि इस प्रावधान को निरस्त करने से देश की सुरक्षा और अखंडता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
  • भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code- IPC), 1860 को प्रतिस्थापित करने के लिये भारतीय न्याय संहिता (Bhartiya Nyay Sanhita), 2023 के नाम से एक विधेयक संसद में पेश किया गया है, जो राजद्रोह के अपराध के लिये 7 साल तक की सज़ा का प्रावधान करता है।

भारतीय न्याय संहिता, 2023 में प्रस्तावित परिवर्तन

  • यह विधेयक मौजूदा भारतीय दंड संहिता (IPC) 1860, आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) 1973 और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (IEA )1872 को प्रतिस्थापित करने का प्रस्ताव करता है।
  • इसने राजद्रोह कानून में प्रमुख बदलावों का प्रस्ताव रखा है जिसके तहत अब निम्नलिखित मामलों दंड दिया जाएगा:
    • अलगाव, सशस्त्र विद्रोह, या विध्वंसक गतिविधियों को उत्तेजित करना या उत्तेजित करने का प्रयास करना,
    • अलगाववादी गतिविधियों की भावनाओं को प्रोत्साहित करना, या
    • भारत की संप्रभुता या एकता और अखंडता को खतरे में डालना।
  • इन अपराधों में शब्दों या संकेतों का आदान-प्रदान, इलेक्ट्रॉनिक संचार या वित्तीय साधनों का उपयोग शामिल हो सकता है।
  • इनमें सात साल तक की कैद या आजीवन कारावास और जुर्माना होगा।

कानूनी स्थिति

  • IPC की धारा 124A जो राजद्रोह कानून से संबंधित है। इसका उल्लेख तब नहीं किया गया था जब अधिनियम पहली बार लागू किया गया था।
  • ‘राजद्रोह’ से संबंधित कानून वर्ष 1870 में जोड़ा गया था।
  • तारा सिंह गोपी चंद बनाम राज्य (1951) और राम नंदन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1958) के मामलों में, राजद्रोह के प्रावधान को असंवैधानिक माना गया तथा इसे वैमनस्य/असामंजस्य (Disharmony) को रोकने के लिये औपनिवेशिक शक्ति का एक साधन माना गया।
  • केदार नाथ सिंह बनाम बिहार राज्य (1962) के मामले में उच्चतम न्यायालय ने IPC के इस प्रावधान की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा।
  • इसके बाद बलवंत सिंह बनाम पंजाब राज्य (1995) के मामले में, उच्चतम न्ययालय ने इस स्थिति को दोहराया कि सरकार या राजनीतिक नेताओं की आलोचना, भले ही उग्र हो, राजद्रोह की श्रेणी में तब तक नहीं आती जब तक कि यह हिंसा या सार्वजनिक अव्यवस्था को जन्म न दे।
  • यूनाइटेड किंगडम, आयरलैंड, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, घाना, नाइजीरिया और युगांडा उन लोकतांत्रिक देशों में शामिल हैं जिन्होंने राजद्रोह कानूनों को अलोकतांत्रिक, अवांछित और अनावश्यक बताकर खारिज कर दिया है।

​राजद्रोह के लिये सज़ा

  • संहिता के तहत राजद्रोह का अपराध एक गैर-ज़मानती, संज्ञेय अपराध है जिसका मुकदमा सत्र न्यायालय द्वारा चलाया जा सकता है।
  • राजद्रोह के आरोप वाले व्यक्ति को निम्नलिखित में से एक या अधिक परिणामों का सामना करना पड़ सकता है:
    • सरकारी नौकरी से बाधित: राजद्रोह का आरोप लगने पर ज़रूरी नहीं है कि सरकारी नौकरी से स्वतः ही रोक लग जाए। हालाँकि, कुछ आपराधिक आरोप, उनकी प्रकृति और गंभीरता के आधार पर, कुछ सरकारी पदों के लिये किसी व्यक्ति की पात्रता को प्रभावित कर सकते हैं।
    • पासपोर्ट प्रतिबंध: राजद्रोह के आरोप वाले किसी व्यक्ति को अंतर्राष्ट्रीय यात्रा पर प्रतिबंध का सामना करना पड़ सकता है, ऐसे प्रतिबंध संभवतः न्यायालय या मामले में शामिल अधिकारियों द्वारा लगाए जाएंगे।
    • न्यायालय में उपस्थिति: यदि किसी पर राजद्रोह सहित किसी भी अन्य आपराधिक अपराध का आरोप लगाया गया है, तो उनके लिये न्यायालय की सुनवाई में उपस्थित होना आवश्यक हो सकता है।

विधि आयोग की सिफ़ारिशें - 279वीं रिपोर्ट

  • केदार नाथ फैसले को सम्मिलित करना:
    • केदार नाथ मामले में, उच्चतम न्यायालय ने राजद्रोह कानून की संवैधानिकता को बरकरार रखते हुए कहा कि यह संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत उल्लिखित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर 'उचित प्रतिबंध' के अंतर्गत आता है।
  • एक नई प्रक्रियात्मक 'सुरक्षा' स्थापित करना:
    • आयोग कानून के 'कथित दुरुपयोग' को रोकने के लिये आपराधिक प्रक्रिया संहिता(CrPC) में एक प्रमुख प्रक्रियात्मक संशोधन की सिफारिश करता है।
    • इसमें सुझाव दिया गया है कि इंस्पेक्टर/निरीक्षक या उससे उच्च पद पर कार्यरत पुलिस अधिकारी को प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने से पहले आरंभिक जाँच करनी चाहिये।
  • सज़ा की अवधि बढ़ाना:
    • आयोग ज़ुर्माने के साथ सज़ा को बढ़ाकर सात साल या आजीवन कारावास करने की सिफारिश करता है।
  • प्रावधान में नए शब्दों को सम्मिलित करना:
    • रिपोर्ट प्रावधान में 'हिंसा भड़काने या सार्वजनिक अव्यवस्था पैदा करने की प्रवृत्ति' (tendency to incite violence or cause public disorder) शब्दों को जोड़ने की सिफारिश करती है।
    • यह 'प्रवृत्ति' (tendency) को 'वास्तविक हिंसा या हिंसा के आसन्न खतरे के साक्ष्य के बजाय हिंसा या सार्वजनिक अव्यवस्था भड़काने की प्रवृत्ति' के रूप में परिभाषित करता है।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19

  • राजद्रोह कानून के संबंध में चर्चा का प्राथमिक कारण भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) - अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ इसकी असहमति से संबंधित है। संविधान के अनुच्छेद 19(1) को अनुच्छेद 19(2) के साथ पढ़ा जाता है जिसमें उन आधारों का उल्लेख है जिनके आधार पर राज्य भाषण/अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार को कम कर सकता है।
    • अनुच्छेद 19(1)(a) - वाक्-स्वातंत्र्य आदि विषयक कुछ अधिकारों का संरक्षण — (1) सभी नागरिकों को—
      • (a) वाक्-स्वातंत्र्य और अभिव्यक्ति-स्वातंत्र्य का
    • अनुच्छेद 19(2) - खंड (1) के उपखंड (a) की कोई बात उक्त उपखंड द्वारा दिये गए अधिकार के प्रयोग पर भारत की संप्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों, लोक व्यवस्था, शिष्टाचार या सदाचार के हितों में अथवा न्यायालय-अवमान, मानहानि या अपराध उद्दीपन के संबंध में युक्तियुक्त निर्बंधन जहाँ तक कोई विद्यमान विधि अधिरोपित करती है वहाँ तक उसके प्रवर्तन पर प्रभाव नहीं डालेगी या वैसे निर्बंधन अधिरोपित करने वाली कोई विधि बनाने से राज्य को निवारित नहीं करेगी।

निष्कर्ष

राजद्रोह एक जटिल और उभरता हुआ मुद्दा बना हुआ है, जो सामाजिक व्यवस्था की रक्षा करने तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बनाए रखने के बीच तनाव का प्रतीक है। उच्चतम न्यायालय विधि आयोग की सिफारिशों से बंधा नहीं है, लेकिन वर्तमान में की गई सिफारिशों तथा स्वतंत्रता एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये जा रहे ज़ोर के बीच हितों का संघर्ष देखा जा सकता है। राज्य को आंतरिक और बाह्य आक्रमण से अपनी रक्षा करने में सक्षम होना चाहिये, लेकिन ऐसी कार्रवाई कभी भी संवैधानिक अधिकारों की कीमत पर नहीं होनी चाहिये।