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पारिवारिक कानून

स्वराज गर्ग बनाम के.एम. गर्ग, AIR 1978 Del. 296

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 23-Apr-2024

परिचय:

यह मामला हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (HMA) के अधीन वैवाहिक अधिकारों की पुनर्स्थापना की अवधारणा से संबंधित है।

तथ्य:

  • पत्नी, स्वराज, 1956 से सुनाम के एक सरकारी स्कूल में शिक्षिका एवं प्रधानाध्यापिका के रूप में कार्यरत थीं।
  • दोनों का विवाह 12 जुलाई 1964 को सुनाम में संपन्न हुई।
  • पति कुछ वर्षों के लिये विदेश में थे तथा शुरुआत में उनके पास भारत में कोई संतोषजनक नौकरी नहीं थी।
  • विवाह के बाद पत्नी सुनाम में रहती रही, जबकि पति दिल्ली में रहते थे।
  • पति ने पत्नी के विरुद्ध बिना किसी उचित कारण के उनके समाज से अलग होने का आरोप लगाते हुए दांपत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना के लिये याचिका दायर की।
  • पत्नी ने इसके विरुद्ध अपील करते हुए कहा कि पति ने उसके साथ दुर्व्यवहार किया एवं उससे एवं उसके माता-पिता से दहेज़ एवं पैसे की मांग की।

शामिल मुद्दे:

  • जब विवाह से पहले दोनों पति-पत्नी अलग-अलग स्थानों पर कार्यरत हों तो वैवाहिक निवास स्थल कहाँ स्थित होना चाहिये?
  • क्या पत्नी का यह दायित्व है कि वह विवाह के बाद अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दे तथा पति के साथ उसके कार्यस्थल/निवास पर चली जाए?
  • क्या पत्नी के पास पति के साथ दिल्ली में न रहने का कोई युक्तियुक्त कारण था?

टिप्पणी:

  • विवाह-पूर्व करार के अभाव में, वैवाहिक निवास स्थल का चुनाव दोनों पक्षों की सामान्य सुविधा एवं हित, उनके संबंधित रोज़गार और वित्तीय परिस्थितियों पर विचार करते हुए आधारित होना चाहिये।
  • ऐसा कोई पूर्ण नियम या रिवाज़ नहीं है जिसके लिये पत्नी को अपनी नौकरी से इस्तीफा दे देना चाहिये|
  • और पति के साथ उसके स्थान पर रहने की आवश्यकता हो, विशेषकर ऐसी परिस्थिति में जब पत्नी के पास पति की तुलना में बेहतर नौकरी एवं वित्तीय स्थिति हो।
  • पति की वित्तीय कठिनाइयों, पत्नी की आरामदायक स्थिति एवं पत्नी के प्रति पति के हतोत्साहित करने वाले आचरण के कारण पत्नी के पास अपनी नौकरी से इस्तीफा न देने एवं दिल्ली में पति के साथ जीवन बीताने का एक उचित कारण था।
  • पति वैवाहिक अधिकारों की पुनर्स्थापना का पंचाट देने के आधार को सिद्ध करने में विफल रहा।

निष्कर्ष:

  • अपील की अनुमति दी गई तथा पति की याचिका को खारिज करने वाले विचारण न्यायालय के निर्णय को पुनर्स्थापित कर दिया गया।

नोट:

HMA की धारा 9: दांपत्य अधिकार की पुनर्स्थापना-

  • जब पति या पत्नी में से कोई भी, बिना किसी उचित कारण के, दूसरे के समाज से अलग हो जाता है, तो पीड़ित पक्ष दांपत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना के लिये ज़िला न्यायालय में याचिका द्वारा आवेदन कर सकता है तथा न्यायालय ऐसी याचिका में दिये गए बयान की सत्यता से संतुष्ट होने पर आवेदन स्वीकार कर सकती है। ऐसा कोई विधिक आधार नहीं है कि आवेदन क्यों स्वीकार नहीं किया जाना चाहिये, तद्नुसार वैवाहिक अधिकारों की पुनर्स्थापना का आदेश दिया जा सकता है।
  • व्याख्या— जहाँ यह प्रश्न उठता है कि क्या समाज से अलग होने के लिये कोई युक्तियुक्त कारण है, तो ऐसे युक्तियुक्त कारण को सिद्ध करने का भार उस व्यक्ति पर होगा जिसने समाज से स्वयं को अलग कर लिया है।