होम / करेंट अफेयर्स
आपराधिक कानून
वैवाहिक कलह के कारण विवाहित महिला द्वारा गर्भपात कराना अपराध नहीं है
« »07-Jan-2026
|
एक्स बनाम राज्य और अन्य "यद्यपि गर्भ का चिकित्सीय समापन अधिनियम द्वारा प्रजनन संबंधी विकल्पों के प्रयोग का अधिकार प्रतिबंधित है, फिर भी यह गर्भावस्था को अस्वीकार करने के उसके अधिकार को मान्यता देता है और उसकी रक्षा करता है, यदि उसका मानसिक या शारीरिक स्वास्थ्य खतरे में हो।" न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा |
स्रोत: दिल्ली उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
दिल्ली उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने एक्स बनाम राज्य और अन्य (2026) के मामले में यह निर्णय दिया कि वैवाहिक कलह के कारण मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले गर्भपात से गुजरने वाली विवाहित महिला भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 312 के अधीन अपराध नहीं करती है, यदि यह प्रक्रिया गर्भ का चिकित्सीय समापन अधिनियम, 1971 (MTP Act) के अनुसार की जाती है।
एक्स बनाम स्टेट और अन्य (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- एक महिला ने वैवाहिक कलह के कारण, जो उसके मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा था, गर्भावस्था के 14वें सप्ताह में गर्भपात करवा लिया।
- बाद में गर्भपात कराने के लिये उसे भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 312 के अधीन तलब किया गया।
- महिला ने इस समन आदेश को दिल्ली उच्च न्यायालय में चुनौती दी।
- उपस्थित चिकित्सक ने OPD कार्ड में यह नोट किया था कि विद्यमान निर्णयों को देखते हुए, गर्भपात से इंकार नहीं किया जा सकता है और इसलिये उन्होंने प्रक्रिया को आगे बढ़ाया।
- महिला पहले से ही अपने वैवाहिक जीवन में तनाव का सामना कर रही थी और गर्भपात के समय उसने अपने पति से पृथक् होने का निर्णय कर लिया था।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- न्यायालय ने माना कि जब किसी महिला का मानसिक या शारीरिक स्वास्थ्य खतरे में हो, तो प्रजनन संबंधी विकल्प चुनने का अधिकार गर्भ का चिकित्सीय समापन अधिनियम के अधीन मान्यता प्राप्त और संरक्षित है, और गर्भपात एक ऐसा निर्णय है जो केवल महिला को ही लेना चाहिये।
- न्यायमूर्ति कृष्णा ने इस बात पर बल दिया कि प्रजनन पर नियंत्रण सभी महिलाओं का एक बुनियादी अधिकार है, जिसमें विधिक और सुरक्षित गर्भपात, जन्म नियंत्रण, गुणवत्तापूर्ण प्रजनन स्वास्थ्य देखभाल और सूचित प्रजनन विकल्प का अधिकार सम्मिलित है।
- न्यायालय ने यह स्वीकार किया कि वैवाहिक कलह से उत्पन्न मानसिक आघात गंभीर मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकता है और यह माना कि "मानसिक स्वास्थ्य" का निर्वचन केवल शारीरिक या तंत्रिका संबंधी स्थिति के रूप में संकीर्ण रूप से नहीं की जानी चाहिये।
- न्यायालय कहा कि वैवाहिक कलह का अर्थ यह नहीं है कि पक्षकार पृथक् हो गए हों या विधिक कार्यवाही शुरू कर दी हो - तनाव और कलह की भावना ही ऐसी स्थिति उत्पन्न करती है जिससे मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित होने की संभावना होती है, जिससे एक महिला गर्भपात कराने के लिये सक्षम हो जाती है।
- न्यायालय ने यह टिप्पणी की कि एक स्त्री-विरोधी समाज में गर्भावस्था के दौरान वैवाहिक कलह का सामना कर रही महिला को बहुस्तरीय आघात सहना पड़ता है, क्योंकि उसे प्रायः समस्त दायित्त्व अकेले ही वहन करने के लिये विवश कर दिया जाता है, जिससे उसके समक्ष अपार कठिनाइयाँ उत्पन्न होती हैं तथा उसे गंभीर मानसिक पीड़ा और आघात का सामना करना पड़ता है।
- न्यायालय ने कहा कि गर्भ में पल रहे भ्रूण को जीवित महिला के अधिकारों से ऊपर नहीं रखा जा सकता है, और किसी महिला को अनचाही गर्भावस्था जारी रखने के लिये विवश करना उसकी शारीरिक अखंडता का उल्लंघन करता है और मानसिक आघात को बढ़ाता है।
- न्यायालय ने कहा कि गर्भ का चिकित्सीय समापन नियम 2021 का नियम 3ख उन सभी महिलाओं पर लागू होता है जिनकी भौतिक परिस्थितियों में परिवर्तन होता है, न कि केवल सीमित सूचीबद्ध स्थितियों में, और यह कि सुरक्षित गर्भपात तक पूर्ण पहुँच को रोकने वाली बाधाएं अभी भी विद्यमान हैं।
- न्यायालय ने भारतीय दण्ड संहिता की धारा 312 के अधीन जारी किये गए समन को रद्द कर दिया, यह मानते हुए कि जब उच्चतम न्यायालय ने वैवाहिक कलह की स्थिति में, जो मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती है, गर्भपात कराने के लिये महिला की स्वायत्तता को मान्यता दी है, और गर्भ का चिकित्सीय समापन अधिनियम के प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए, कोई अपराध नहीं किया गया है।
गर्भ का चिकित्सीय समापन अधिनियम, 1971 क्या है?
- गर्भ का चिकित्सीय समापन अधिनियम 1 अप्रैल 1972 से प्रवर्तन में आया।
- गर्भ का चिकित्सीय समापन अधिनियम के अधीन एक चिकित्सक द्वारा दो चरणों में गर्भसमापन की अनुमति दी गई है:
- गर्भधारण के 12 सप्ताह तक गर्भसमापन के लिये एक चिकित्सक की राय आवश्यक थी।
- 12 सप्ताह से 20 सप्ताह की अवधि के गर्भ के मामलों में दो चिकित्सकों की राय आवश्यक थी, जिससे यह निर्धारित किया जा सके कि गर्भावस्था को जारी रखना गर्भवती महिला के जीवन के लिये जोखिमपूर्ण होगा अथवा उसके शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर क्षति पहुँचा सकता है, अथवा यदि शिशु का जन्म होता है तो उसमें ऐसे शारीरिक या मानसिक असामान्यताएँ होने की प्रबल संभावना है, जिनके कारण वह गंभीर रूप से “अपंग” होगा।
- इस अधिनियम में वर्ष 2020 में व्यापक संशोधन किया गया तथा संशोधित विधि सितंबर 2021 से प्रभावी हुई, जिसके अंतर्गत निम्नलिखित प्रमुख परिवर्तन किये गए।
- गर्भसमापन की अधिकतम अनुमत गर्भकाल सीमा को वर्ष 1971 के अधिनियम के अंतर्गत 20 सप्ताह से बढ़ाकर 24 सप्ताह किया गया।
- गर्भावस्था के 20 सप्ताह तक गर्भ का चिकित्सीय समापन का आकलन करने के लिये एक योग्य चिकित्सा पेशेवर की राय का उपयोग किया जा सकता है और 20 सप्ताह से लेकर 24 सप्ताह तक, दो रजिस्ट्रीकृत चिकित्सा चिकित्सकों की राय की आवश्यकता होगी।
- दो रजिस्ट्रीकृत चिकित्सकों की राय लेने के बाद, गर्भावस्था को 24 सप्ताह की गर्भकालीन आयु तक निम्नलिखित शर्तों के अधीन समाप्त किया जा सकता है:
- यदि महिला लैंगिक उत्पीड़न, बलात्कार या अनाचार की पीड़िता हो;
- यदि वह अवयस्क है;
- यदि गर्भावस्था के दौरान उसकी वैवाहिक स्थिति में कोई परिवर्तन होता है (विधवा होने या तलाक के कारण);
- यदि वह गंभीर शारीरिक अक्षमताओं से पीड़ित है या मानसिक रूप से बीमार है;
- यदि महिला गंभीर शारीरिक दिव्यांगता से ग्रस्त हो अथवा मानसिक रूप से अस्वस्थ हो;
- यदि भ्रूण में ऐसी विकृतियाँ पाई जाएँ जो जीवन के अनुकूल न हों अथवा ऐसे गंभीर रूप से दिव्यांग शिशु के जन्म की संभावना हो;
- यदि महिला किसी मानवीय संकट, आपदा-स्थिति अथवा सरकार द्वारा घोषित आपातकालीन परिस्थितियों में फँसी हुई हो।
- गर्भपात उन मामलों में किया जाता है जहाँ भ्रूण में असामान्यताएँ पाई जाती हैं और गर्भावस्था 24 सप्ताह से अधिक समय तक बढ़ चुकी होती है।
- गर्भ का चिकित्सीय समापन अधिनियम के अधीन प्रत्येक राज्य में स्थापित चार सदस्यीय चिकित्सा बोर्ड को इस प्रकार के गर्भसमापन की अनुमति देनी होगी।
.jpg)