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आपराधिक कानून
अध्याय 4: औषधि और प्रसाधन सामग्री विधि के अंतर्गत सेशन न्यायालय द्वारा विचारणीय अपराध
« »23-Feb-2026
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मेसर्स एस.बी.एस. बायोटेक और अन्य बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य "सेशन न्यायालय से नीचे का कोई भी न्यायालय औषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 के अध्याय 4 के अंतर्गत दण्डनीय अपराध का विचारण नहीं करेगा।" न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने मेसर्स एस.बी.एस. बायोटेक और अन्य बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य (2026) के मामले में यह निर्णय दिया कि औषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 के अध्याय 4 के अंतर्गत दण्डनीय अपराधों का विचारण मजिस्ट्रेट द्वारा नहीं किया जा सकता है तथा इनका विचारण सेशन न्यायालय से निम्न स्तर के न्यायालय द्वारा नहीं किया जाना चाहिये।
मेसर्स एस.बी.एस. बायोटेक और अन्य बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- एक औषधि निरीक्षक ने 22 जुलाई, 2014 को हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले के काला अंब स्थित मेसर्स एस.बी.एस. बायोटेक के विनिर्माण परिसर का निरीक्षण किया।
- अभिकथित किया गया था कि फर्म ने औषधि और प्रसाधन सामग्री नियम, 1945 की अनुसूची M (उत्तम विनिर्माण पद्धतियाँ एवं प्रलेखन) और अनुसूची U (विनिर्माण अभिलेखों में दर्शाए जाने वाले विवरण) के अधीन आवश्यक तरीके से अभिलेखों का रखरखाव नहीं किया था, विशेष रूप से स्यूडोएफेड्रिन (Pseudoephedrine) नामक दवा के संबंध में।
- 5 अगस्त, 2014 को एक पुनः निरीक्षण किया गया, जिसमें विनिर्माण, परीक्षण और वितरण अभिलेखों में विसंगतियां पाई गईं।
- अभियोग के लिये स्वीकृति 15 सितंबर, 2016 को दी गई थी और 27 फरवरी, 2017 को धारा 18(क)(vi) के साथ नियम 74, धारा 22(1)( cca), और धारा 18-ख के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए परिवाद दर्ज किया गया था, जो अधिनियम की धारा 27(घ) और धारा 28-क के अधीन दण्डनीय है।
- प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट (JMFC)) ने 6 अप्रैल, 2017 को संज्ञान लिया और बाद में 5 अक्टूबर, 2017 को मामले को विशेष न्यायाधीश को सौंप दिया, यह मानते हुए कि अपराध केवल सेशन न्यायालय द्वारा ही विचारणीय है।
- उच्च न्यायालय के समक्ष अपीलकर्त्ता की याचिका खारिज कर दी गई, जिसके परिणामस्वरूप उच्चतम न्यायालय के समक्ष यह अपील दायर की गई है।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- न्यायालय ने टिप्पणी की कि औषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम की धारा 32(2) में विशेष रूप से यह अनिवार्य किया गया है कि सेशन न्यायालय से नीचे का कोई भी न्यायालय अध्याय 4 के अंतर्गत दण्डनीय अपराधों का विचारण नहीं करेगा, जिससे सेशन न्यायालय ऐसे विचारणों के लिये न्यूनतम मंच बन जाएगा।
- न्यायालय ने माना कि जब परिवाद में धारा 18(क)(vi) के अधीन अपराध का प्रकटन होता है - अध्याय 4 के उल्लंघन में दवाओं के निर्माण और विक्रय पर प्रतिबंध से संबंधित - तो धारा 27(घ) के अधीन दण्ड लागू होगा, जो कम से कम एक वर्ष और अधिकतम दो वर्ष के कारावास का उपबंध करती है।
- परिसीमा के प्रश्न पर न्यायालय ने यह माना कि चूँकि धारा 27(घ) में न्यूनतम एक वर्ष के कारावास का उपबंध है, इसलिये दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 468 के अंतर्गत लागू परिसीमा काल तीन वर्ष है। चूँकि परिवाद निरीक्षण के दो वर्ष और छह माह के भीतर दर्ज किया गया था, इसलिये यह परिसीमा काल द्वारा वर्जित नहीं था।
- न्यायालय ने इस तर्क को नामंजूर कर दिया कि धारा 36-क—जो तीन वर्ष से अधिक कारावास की दण्ड वाले अपराधों के लिये न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा संक्षिप्त विचारण का उपबंध करती है—किसी मजिस्ट्रेट को अधिकारिता प्रदान कर सकती है। न्यायालय ने कहा कि धारा 36-क स्वयं ही धारा 36-क के अधीन विशेष न्यायालय या सेशन न्यायालय द्वारा विचारणीय अपराधों को अपवर्जित करती है, और धारा 32(2) विशेष रूप से सेशन न्यायालय से नीचे के किसी भी न्यायालय को अध्याय 4 के अपराधों का विचारण करने से रोकती है।
- न्यायालय ने मामले को सेशन न्यायालय में भेजने के मजिस्ट्रेट के निर्णय में कोई त्रुटि नहीं पाई और अपील खारिज कर दी।
औषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 क्या है?
पृष्ठभूमि एवं उद्देश्य:
- भारत में दवाओं और प्रसाधन सामग्रियों के आयात, निर्माण, वितरण और विक्रय को विनियमित करने के लिये अधिनियमित किया गया।
- इसने पूर्ववर्ती खतरनाक औषधि अधिनियम का स्थान लिया और इसका उद्देश्य जनता के लिये उपलब्ध दवाओं की सुरक्षा, प्रभावकारिता और गुणवत्ता सुनिश्चित करना था।
- इसका प्रशासन केंद्र सरकार और राज्य सरकारों द्वारा संयुक्त रूप से किया जाता है।
संरचना:
- इसे कई अध्यायों में विभाजित किया गया है, जिनमें औषधियों, प्रसाधनों सामग्रियों और आयुर्वेदिक, सिद्ध और यूनानी चिकित्सा पद्धतियों से पृथक्-पृथक् रूप से संबंधित जानकारी दी गई है।
- यह 1945 के औषधि और प्रसाधन सामग्री नियम द्वारा समर्थित है, जो विस्तृत प्रक्रियात्मक और तकनीकी आवश्यकताओं का प्रावधान करते हैं।
प्रमुख परिभाषाएँ:
- " औषधि" में आंतरिक या बाह्य उपयोग के लिये औषधियाँ, निदान के लिये प्रयुक्त पदार्थ और शरीर की संरचना या कार्य को प्रभावित करने के उद्देश्य से बनाई गई वस्तुएँ सम्मिलित हैं।
- "प्रसाधन सामग्री" से तात्पर्य किसी भी ऐसी वस्तु से है जिसका उपयोग मानव शरीर पर सफाई, सौंदर्यीकरण या रूप-रंग में परिवर्तन के लिये किया जाता है।
- "विनिर्माण में किसी औषधि के निर्माण, परिवर्तन, अलंकरण, परिष्करण अथवा अन्य किसी प्रकार से उपचार से संबंधित प्रत्येक प्रक्रिया सम्मिलित है।
विनियामक प्राधिकरण:
- केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) भारत के औषधि नियंत्रक जनरल (DCGI) के नेतृत्व में राष्ट्रीय विनियामक निकाय है।
- राज्य स्तर पर लाइसेंसिंग और प्रवर्तन का कार्य राज्य औषधि प्राधिकरणों द्वारा किया जाता है।
- ड्रग इंस्पेक्टरों को ड्रग्स का निरीक्षण करने, नमूने लेने और जब्त करने का अधिकार है।
अध्याय 4 – विनिर्माण, विक्रय और वितरण:
- ऐसे औषधियों के विनिर्माण, विक्रय या वितरण पर प्रतिबंध अधिरोपित करता है जो मिथ्या-चिह्नित, मिलावटी अथवा नकली हों।
- धारा 18(क)(vi) के अंतर्गत, अध्याय 4 या उसके अधीन निर्मित नियमों के उल्लंघन में किसी औषधि का विनिर्माण या विक्रय निषिद्ध है।
- निर्माताओं को अनुसूची M (उत्तम विनिर्माण पद्धतियाँ) और अनुसूची U (विनिर्माण अभिलेख संबंधी आवश्यकताएँ) का अनुपालन करना होगा।
- औषधियों के विनिर्माण एवं विक्रय हेतु विधिवत् अनुज्ञप्ति (License) प्राप्त करना अनिवार्य है।
अनुसूचित पदार्थ एवं अभिलेख:
- अनुसूची M में औषधि निर्माण के लिये परिसर, उपकरण और दस्तावेज़ीकरण के मानक निर्धारित किये गए हैं।
- अनुसूची U में विनिर्माण, परीक्षण और वितरण अभिलेखों में दर्शाई जाने वाली जानकारियों का उल्लेख है।
- स्यूडोएफेड्रिन जैसे नशीले पदार्थों के लिये कठोर रिकॉर्ड रखने और निगरानी की व्यवस्था की जाती है।
अपराध एवं दण्ड:
- धारा 27 में विभिन्न अपराधों के लिये दण्ड का उपबंध है, जिसमें नकली या मिलावटी औषधियों का विनिर्माण भी सम्मिलित है, और अपराध की प्रकृति के आधार पर इसमें एक वर्ष से लेकर आजीवन कारावास तक के दण्ड का उपबंध है।
- धारा 27(घ) अध्याय 4 या नियमों के उल्लंघन के लिये कम से कम एक वर्ष और अधिकतम दो वर्ष के कारावास के दण्ड का उपबंध करती है।
- धारा 28-क के अधीन धारा 18-ख के अंतर्गत अभिलेख न रखने या सूचना न देने पर एक वर्ष तक के कारावास का उपबंध है।
- धारा 32(2) में यह अनिवार्य है कि सेशन न्यायालय से नीचे का कोई न्यायालय अध्याय 4 के अंतर्गत अपराधों का विचारण नहीं करेगा।
संज्ञान एवं विचारण:
- अध्याय 4 के अंतर्गत आने वाले अपराधों का विचारण विशेष रूप से सेशन न्यायालय द्वारा किया जा सज्कता है और मजिस्ट्रेट द्वारा इनका विचारण नहीं किया जा सकता है।
- धारा 36-क, जो कम अपराधों के लिये प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा संक्षिप्त विचारण की अनुमति देता है, धारा 32(2) के सर्वोपरि जनादेश के कारण अध्याय 4 के अपराधों पर लागू नहीं होता है।
- मादक पदार्थों से संबंधित अपराधों के त्वरित विचारण के लिये धारा 36-कख के अधीन विशेष न्यायालयों का गठन भी किया जा सकता है।
निरीक्षण एवं प्रवर्तन शक्तियां
- ड्रग इंस्पेक्टरों के पास परिसर में प्रवेश करने और निरीक्षण करने, नमूने लेने, स्टॉक जब्त करने और अभिलेख की जांच करने के व्यापक अधिकार होते हैं।
- धारा 22(1)(cca) निरीक्षकों को अभिलेख-संरक्षण संबंधी आवश्यकताओं के अनुपालन की जांच करने का अधिकार देती है।
- अभिलेख प्रस्तुत करने से इंकार करना या मिथ्या जानकारी देना स्वयं इस अधिनियम के अंतर्गत एक अपराध है।
महत्त्व
- यह अधिनियम भारत में औषधि विनियमन की रीढ़ की हड्डी के रूप में कार्य करता है, यह सुनिश्चित करते हुए कि केवल सुरक्षित और प्रभावी औषधियाँ ही उपभोक्ताओं तक पहुँचे।
- नकली औषधिओं, ऑनलाइन फार्मेसियों और नई औषधि श्रेणियों जैसी उभरती चुनौतियों से निपटने के लिये इसमें समय-समय पर संशोधन किया गया है।
- भारत में कार्यरत सभी औषधि निर्माताओं, आयातकों और वितरकों के लिये इस अधिनियम का अनुपालन अनिवार्य है।