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सिविल कानून
अंतरण याचिकाओं में पत्नी की सुविधा अब सर्वोपरि नहीं रही
«21-Feb-2026
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एकता वैश्य बनाम दीपक कुचबंदिया "अंतरण आवेदनों पर निर्णय लेते समय पत्नी/महिला की सुविधा सर्वोपरि विचारणीय विषय नहीं है और अंतरण कार्यवाही के लिये वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग जैसे विकल्प प्रदान किये गए हैं।" न्यायमूर्ति दीपक खोट |
स्रोत: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति दीपक खोट ने एकता वैश्य बनाम दीपक कुचबंदिया (2026) के मामले में यह निर्णय दिया कि वैवाहिक विवादों में अंतरण याचिकाओं पर निर्णय लेते समय पत्नी की सुविधा सर्वोपरि विचारणीय विषय नहीं रह गई है। न्यायालय ने कहा कि वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग सुविधाओं और यात्रा व्यय के प्रतिकर सहित व्यवहार्य आधुनिक विकल्प, कार्यवाही के अंतरण की आवश्यकता के बिना असुविधा संबंधी चिंताओं का पर्याप्त रूप से समाधान करते हैं।
एकता वैश्य बनाम दीपक कुचबंदिया (2026) की पृष्ठभूमि क्या थी?
- पत्नी ने सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 की धारा 24 के अधीन एक याचिका दायर कर नरसिंहपुर के कुटुंब न्यायालय में अपने पति द्वारा दायर दांपत्य अधिकारों का प्रत्यास्थापना के मामले को अंतरित करने की मांग की।
- पत्नी के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि हरदा और नरसिंहपुर के बीच की दूरी 300 किलोमीटर से अधिक है, जिससे उसके लिये यात्रा करना मुश्किल और असुरक्षित हो जाता है।
- न्यायालय ने उच्चतम न्यायालय के कई निर्णयों पर विश्वास करते हुए यह निष्कर्ष निकाला कि केवल पत्नी को होने वाली असुविधा के आधार पर अंतरण याचिकाओं को नियमित रूप से स्वीकार नहीं किया जाना चाहिये।
- विशेषकर पत्नी ने स्वयं नरसिंहपुर में पति के विरुद्ध दो प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज कराई थीं और उन कार्यवाही के सिलसिले में पहले भी वहाँ जा चुकी थी, जिसे न्यायालय ने अपने आकलन के लिये सुसंगत माना।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- पीठ ने टिप्पणी की कि पक्षकारों को हर सुनवाई में उपस्थित होना अनिवार्य नहीं है, और कार्यवाही के अधिकांश चरणों में अधिवक्ता उनका प्रतिनिधित्व कर सकते हैं।
- न्यायालय ने कहा कि पक्षकारों की व्यक्तिगत उपस्थिति सामान्यत: केवल सुलह और साक्ष्य के चरण में ही आवश्यक होती है, और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग जैसी आधुनिक सुविधाएँ कार्यवाही के भौतिक अंतरण का एक प्रभावी विकल्प प्रदान करती हैं।
- न्यायालय ने निदेश दिया कि आवेदक वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से जिला नरसिंहपुर स्थित कुटुंब न्यायालय के समक्ष उपस्थित हो सकती है और उसकी परीक्षा के लिये यात्रा, आवास और भोजन का खर्च प्रत्यर्थी द्वारा वहन किया जाएगा।
- नरसिंहपुर स्थित कुटुंब न्यायालय को आवेदक की परीक्षा के लिये एक तिथि निर्धारित करने और तदनुसार प्रत्यर्थी को ऐसे खर्चों का संदाय करने का निर्देश देने का निदेश दिया गया।
- पीठ ने इस बात पर बल दिया कि प्रौद्योगिकी की उपलब्धता और लागत-प्रतिकर तंत्र वैवाहिक विवादों में नियमित तबादलों को अनावश्यक और अनुचित बना देते हैं।
सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 24 क्या है?
- यह धारा अंतरण और प्रत्याहरण की साधारण शक्ति से संबंधित है।
- अंतरण कौन कर सकता है: उच्च न्यायालय या जिला न्यायालय, या तो किसी पक्षकार द्वारा आवेदन करने पर या स्वप्रेरणा से (स्वयं से)।
- कब अंतरण किया जा सकता है: किसी भी प्रक्रम में कोई भी वाद, अपील या अन्य कार्यवाही (जिसमें निष्पादन कार्यवाही भी सम्मिलित है)।
- उपलब्ध शक्तियां:
- किसी लंबित वाद को किसी सक्षम अधीनस्थ न्यायालय को अंतरण करना।
- किसी अधीनस्थ न्यायालय से मामले का प्रत्याहरण करना और या तो स्वयं उसका विचारण करना, उसे किसी अन्य अधीनस्थ न्यायालय में अंतरित करना, या उसे मूल न्यायालय में प्रत्यन्तरण करना।
- अंतरण के पश्चात्: जिस न्यायालय को वाद अंतरण किया गया है, वह या तो वाद का विचारण पुनः प्रारंभ से कर सकता है अथवा जिस अवस्था में वाद अंतरण/प्रत्याहृत किया गया था, उसी अवस्था से आगे कार्यवाही जारी रख सकता है।
- अधीनस्थता संबंधी स्पष्टीकरण: इस उद्देश्य के लिये अपर और सहायक न्यायाधीशों के न्यायालय जिला न्यायालय के अधीनस्थ माने जाते हैं।
- लघु वाद न्यायालय के मामले: यदि किसी लघु वाद को अंतरण किया जाता है, तो जिस न्यायालय द्वारा उसका विचारण किया जा रहा है, वह उस वाद के प्रयोजनार्थ लघु वाद न्यायालय माना जाएगा।
- अधिकारिता संबंधी अपवाद: किसी वाद का अंतरण उस न्यायालय से भी किया जा सकता है, जिसे उसके विचारण की अधिकारिता प्राप्त न हो।
- सूचना की अनिवार्यता: अंतरण से पूर्व पक्षकारों को सूचना दी जाएगी तथा यदि वे चाहें तो उन्हें सुनवाई का अवसर प्रदान किया जाएगा; तथापि, जब न्यायालय स्वयं संज्ञान लेकर कार्यवाही करता है, तब यह अनिवार्यता लागू नहीं होगी।