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आपराधिक कानून
केवल प्रेम/व्यक्तिगत संबंध का विच्छेद आत्महत्या के लिये दुष्प्रेरण के अंतर्गत ‘उकसावा’ नहीं माना जा सकता
« »25-Feb-2026
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नूर मोहम्मद बनाम दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र राज्य "यद्यपि वर्तमान समय में संबंध-विच्छेद एवं हृदय-विदारक परिस्थितियाँ सामान्य होती जा रही हैं, तथापि मात्र संबंध का टूट जाना अपने-आप में ऐसा उकसावा नहीं माना जा सकता जिससे इसे भारतीय न्याय संहिता की धारा 108 के अधीन दुष्प्रेरण का मामला बनाया जा सके।" न्यायमूर्ति मनोज जैन |
स्रोत: दिल्ली उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति मनोज जैन ने नूर मोहम्मद बनाम राष्ट्रिय राजधानी क्षेत्र दिल्ली राज्य (2026) के मामले में यह निर्णय दिया कि मात्र संबंध तोड़ना स्वतः ही आत्महत्या के लिये उकसाने का अपराध नहीं बनता, जिसके अधीन भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 108 (जो भारतीय दण्ड संहिता की धारा 306 के समकक्ष है) के अंतर्गत आत्महत्या के दुष्प्रेरण का अपराध सिद्ध किया जा सके। न्यायालय ने 27 वर्षीय महिला की आत्महत्या के लिये दुष्प्रेरण के अभियुक्त एक विश्वविद्यालय प्रोफेसर को नियमित जमानत दे दी।
नूर मोहम्मद बनाम राष्ट्रिय राजधानी क्षेत्र दिल्ली राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- यह मामला 27 वर्षीय स्कूल शिक्षिका की आत्महत्या से जुड़ा है, जिसने कथित तौर पर 24 अक्टूबर, 2025 को अपने घर में फाँसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी।
- अगले दिन, मृतक के पिता ने एक प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज कराई जिसमें अभिकथित किया गया कि अभियुक्त - एक विश्वविद्यालय के प्रोफेसर - ने विवाह की पूर्वशर्त के रूप में धर्म परिवर्तन हेतु प्रपीड़न द्वारा मृतका को आत्महत्या के लिये दुष्प्रेरित किया।
- परिवादकर्त्ता के अनुसार, मृतका अपनी पढ़ाई के दौरान अभियुक्त के संपर्क में आई थी, तत्पश्चात् उसने उसके साथ संबंध स्थापित किये और बाद में उस पर धर्म परिवर्तन करने के लिये दबाव डालना शुरू कर दिया, जिससे उसे गंभीर मानसिक तनाव हुआ।
- अभियुक्त को 14 नवंबर, 2025 को गिरफ्तार किया गया था।
- अभियुक्त ने दिल्ली उच्च न्यायालय में नियमित जमानत की मांग करते हुए यह तर्क दिया कि उसके विरुद्ध आत्महत्या के लिये उकसाने के आरोप साबित नहीं होते हैं।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- न्यायमूर्ति मनोज जैन ने कहा कि अभिलेख में ऐसा कोई मृत्युकालिक कथन नहीं है जिससे मृतक की उस समय की मानसिक स्थिति पर प्रकाश डाला जा सके जब उसने अपने जीवन को समाप्त करने जैसा चरम कदम उठाया।
- न्यायालय ने पाया कि दोनों पक्षकार लगभग आठ वर्षों से संबंध में थे, इस दौरान मृतक द्वारा कोई परिवाद दर्ज नहीं किया गया था।
- न्यायालय ने कहा कि मृतक के घर से बरामद डायरियों से ऐसा प्रतीत होता है कि वे उसके व्यक्तिगत विचारों को दर्शाती हैं - एक ऐसे व्यक्ति के रूप में जो प्रेम संबंध में थी और केवल अपनी इच्छा को वास्तविकता में बदलना चाहती थी।
- न्यायमूर्ति जैन ने इसे एक टूटे हुए रिश्ते का मामला पाया, जिसमें मृतक को जब पता चला कि अभियुक्त ने किसी और से विवाह कर लिया है, तो उसने अपनी जान लेने का विकल्प चुना।
- न्यायालय ने माना कि उकसाने का अर्थ है किसी व्यक्ति को कोई कार्य करने के लिये प्रेरित करना, उकसाना या प्रोत्साहित करना, और उकसाने या सहायता करने का आरोप साबित करने के लिये, अभियुक्त की ओर से स्पष्ट आपराधिक मनःस्थिति का होना आवश्यक है।
- न्यायालय ने आगे स्पष्ट किया कि उकसावा इस प्रकार का होना चाहिए कि मृतक के पास आत्महत्या करने के अलावा कोई विकल्प न बचे।
- न्यायालय ने टिप्पणी की कि "यद्यपि आजकल रिश्ते टूटना और दिल टूटना आम बात हो गई है, लेकिन मात्र रिश्ते का टूटना अपने आप में उकसाने का कारण नहीं बनता जिससे इसे धारा 108 भारतीय न्याय संहिता (धारा 306 भारतीय दण्ड संहिता के अनुरूप) के अधीन दुष्प्रेरण का मामला माना जा सके।"
- अन्वेषण पूरा होने, आरोप पत्र दाखिल होने और अभियुक्त की सामाजिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए, न्यायालय ने उसे 25,000 रुपए के निजी बंधपत्र और प्रत्याभूति बंधपत्र जमा करने की शर्त पर नियमित जमानत दे दी।
आत्महत्या का दुष्प्रेरण क्या है?
विधिक परिभाषा और ढाँचा:
- आत्महत्या का दुष्प्रेरण भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 107 (अब भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 45) के अधीन परिभाषित है।
- इस अपराध में जानबूझकर किये गए ऐसे कृत्य सम्मिलित हैं जो किसी अन्य व्यक्ति को आत्महत्या करने में सहायता या प्रोत्साहन प्रदान करते हैं।
दुष्प्रेरण के तीन आवश्यक घटक:
- प्रत्यक्ष उकसावा : इसमें शब्दों, हावभाव या आचरण के माध्यम से किसी व्यक्ति को आत्महत्या करने के लिये सक्रिय रूप से प्रोत्साहित करना, उकसाना या प्रेरित करना सम्मिलित है, जिससे पीड़ित व्यक्ति अपनी जान लेने के लिये प्रेरित हो जाए।
- षड्यंत्र : यह तब होता है जब दो या दो से अधिक व्यक्ति आत्महत्या को सुविधाजनक बनाने के लिये एक षड्यंत्र में सम्मिलित होते हैं, और उस षड्यंत्र के अनुसरण में कोई कार्य या अवैध लोप होता है।
- जानबूझकर सहायता प्रदान करना : इसमें किसी भी ऐसे कार्य या अवैध लोप के माध्यम से सहायता प्रदान करना सम्मिलित है जो व्यक्ति को आत्महत्या करने में सहायता करता है, जिसमें जानबूझकर दुर्व्यपदेशन या महत्त्वपूर्ण तथ्यों को छिपाना सम्मिलित है।
विधिक उपबंध और दण्ड:
धारा 108 भारतीय न्याय संहिता (धारा 306 भारतीय दण्ड संहिता) के अधीन आत्महत्या के दुष्प्रेरण हेतु निम्न दण्ड का उपबंध है:
- किसी भी प्रकार के कारावास से, जिसकी अवधि अधिकतम 10 वर्ष तक हो सकती है।
- आर्थिक दण्ड के रूप में अतिरिक्त जुर्माना।
- यह अपराध संज्ञेय, अजमानती और अशमनीय होता है।
- मामलों का विचारण सेशन न्यायालयों में होता है।
संवेदनशील/असुरक्षित व्यक्तियों के लिये विशेष प्रावधान:
भारतीय न्याय संहिता की धारा 107 के अधीन यदि पीड़ित बालक, विकृत चित्त व्यक्ति, मत्तता की अवस्था में हो, तो दण्ड को बढ़ा दिया जाता है। ऐसे मामलों में दण्ड मृत्युदण्ड या आजीवन कारावास या अधिकतम दस वर्ष तक का कारावास तथा साथ में जुर्माना हो सकता है।
सबूत का भार संबंधी आवश्यकताएँ:
- प्रत्यक्ष कारण : अभियुक्त के कार्यों और पीड़ित द्वारा आत्महत्या करने के निर्णय के बीच स्पष्ट संबंध स्थापित करने वाले सबूत होने चाहिये।
- विनिर्दिष्ट आशय : अभियुक्त का आशय व्यक्ति को आत्महत्या के लिये प्रेरित करना होना चाहिये, न कि केवल सामान्य कष्ट पहुँचाना।
- निकटवर्ती संबंध : न्यायालयों को आत्महत्या के समय के निकट घटित ऐसे कृत्यों के साक्ष्य की आवश्यकता होती है जिन्होंने पीड़ित को यह चरम कदम उठाने के लिये सीधे तौर पर विवश किया हो।
- सक्रिय भागीदारी : केवल निष्क्रिय उपस्थिति या सामान्य उत्पीड़न पर्याप्त नहीं है; उकसाने या सहायता करने के सकारात्मक कार्य होने चाहिये।
प्रमुख विधिक अंतर:
- दुष्प्रेरण (Abetment) की परिधि में क्या सम्मिलित है: आत्महत्या कराने के आशय से सक्रिय रूप से प्रेरित करना, आत्महत्या को सुविधाजनक बनाने के लिये षड्यंत्र करना, या आत्महत्या करने में जानबूझकर सहायता करना।
- दुष्प्रेरण की परिधि में क्या सम्मिलित नहीं है: सामान्य उत्पीड़न, आत्महत्या के विनिर्दिष्ट आशय के बिना पेशेवर दबाव, कार्यस्थल पर तनाव, प्रत्यक्ष उकसावे के बिना वैवाहिक कलह, या सामान्य जीवन के संघर्षों से उत्पन्न भावनात्मक पीड़ा।
विधिक निर्णय:
मदन मोहन सिंह बनाम गुजरात राज्य (2010):
- इस मामले में अभियुक्त पर मृतक को निरंतर परेशान करने और अपमानित करने का आरोप लगाया गया था। मृतक एक ड्राइवर था जिसने आत्महत्या पत्र छोड़ा था, जिसमें उसने अपने नियोजक पर निरंतर उत्पीड़न और अपमानजनक व्यवहार के माध्यम से उसे आत्महत्या के लिये मजबूर करने का आरोप लगाया था।
- उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि यद्यपि आत्महत्या पत्र में सीधे तौर पर अभियुक्त नियोजक को दोषी ठहराया गया था, फिर भी आत्महत्या पत्र या प्रथम सूचना रिपोर्ट में ऐसा कुछ भी नहीं था जिसे भारतीय दण्ड संहिता की धारा 306 के अधीन अपराध का गठन करने वाला माना जा सके।
- न्यायालय ने यह स्थापित किया कि निरंतर उत्पीड़न और अपमान के मात्र आरोप, भले ही वे आत्महत्या नोट में दर्ज हों, आत्महत्या के लिये उकसाने के अपराध का गठन करने के लिये अपर्याप्त हैं, जब तक कि उकसाने वाले विशिष्ट कृत्य न हों जो प्रत्यक्षत: इसे चरम कदम की ओर ले गए हों।
अमलेंदु पाल बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (2010):
- इस मामले में उच्चतम न्यायालय ने आत्महत्या के दुष्प्रेरण के मामलों में निकटवर्ती कारण की आवश्यकता के संबंध में एक महत्त्वपूर्ण सिद्धांत प्रतिपादित किया।
- न्यायालय ने कहा कि "केवल उत्पीड़न के आरोप के आधार पर, घटना के समय के निकट अभियुक्त की ओर से कोई ऐसी सकारात्मक कार्रवाई न होने पर, जिसके कारण व्यक्ति ने आत्महत्या की हो, भारतीय दण्ड संहिता की धारा 306 के अधीन दोषसिद्धि मजबूत नहीं है।"
- इस निर्णय ने यह स्थापित किया कि अभियुक्त के कृत्यों और आत्महत्या के बीच एक स्पष्ट समयिक संबंध होना आवश्यक है। न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि उत्पीड़न के आरोप मात्र, आत्महत्या के समय के आसपास घटित ऐसे प्रत्यक्ष कृत्यों के बिना, जो पीड़ित को यह चरम कदम उठाने के लिये सीधे तौर पर विवश करते हों, उकसाने के आरोप में दोषसिद्धि का आधार नहीं बन सकते।
- दोनों मामलों ने इस सिद्धांत को पुष्ट किया कि अभियोजन पक्ष को न केवल उत्पीड़न स्थापित करना होगा, अपितु भारतीय दण्ड संहिता की धारा 306 के अधीन आत्महत्या के दुष्प्रेरण को साबित करने के लिये निकटवर्ती कारण के साथ उकसाने के विशिष्ट कृत्यों को भी स्थापित करना होगा।
