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आपराधिक कानून

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 35(6) के अधीन गिरफ्तारी

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 07-Feb-2026

सतेंद्र कुमार अंतिल बनाम केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो 

"भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 35(6) के अधीन गिरफ्तारी की शक्ति का प्रयोग बहुत कम ही किया जाना चाहिये और यह कोई नियमित मामला नहीं हैअपितु एक अपवाद है।" 

न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और एन. कोटिस्वर सिंह 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

उच्चतम न्यायालय नेसतेंद्र कुमार अंतिल बनाम केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (2026)के मामले में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 35(6) के अधीन गिरफ्तारी शक्तियों के संबंध में महत्त्वपूर्ण सुरक्षा उपायों को स्पष्ट कियाजिसमें कहा गया है कि ऐसी गिरफ्तारियाँ नए सबूतों पर आधारित होनी चाहिये औरधारा 35(3) भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन नोटिस जारी करने के समय विद्यमान आधारों पर निर्भर नहीं हो सकती हैं। 

सतेंद्र कुमार अंतिल बनाम केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • यह मामला नवगठित भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 के अधीन गिरफ्तारी के उपबंधों के निर्वचन के संदर्भ में सामने आयाजिसने दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 का स्थान लिया है। 
  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 35(3) के अधीन सात वर्ष तक के कारावास से दण्डनीय अपराधों के लिये नोटिस जारी करना अनिवार्य हैजिसमें अभियुक्त को पुलिस अधिकारी के सामने पेश होने की आवश्यकता होती है। 
  • धारा 35(6) भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता पुलिस को ऐसे व्यक्ति को गिरफ्तार करने का अधिकार देता है जो धारा 35(3) नोटिस का पालन करने में असफल रहता है या पुलिस को अपनी पहचान बताने में असफल रहता है।  
  • सतेंद्र कुमार एंटिल बनाम केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (II), (2025)के पूर्ववर्ती मामले मेंन्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने निर्णय दिया कि धारा 35(3) नोटिस का अनुपालन न करना स्वतः गिरफ्तारी को न्यायसंगत नहीं ठहराता है। 
  • इससे पहले वाली पीठ ने इस बात पर बल दिया था कि गिरफ्तारी अंतिम उपाय हैजिसे अन्वेषण अभिकरण द्वारा गिरफ्तारी की आवश्यकता पर विचार करने के पश्चात् ही प्रयोग किया जाना चाहिये 
  • तथापिपूर्ववर्ती पीठ ने इस बात की परीक्षा नहीं की कि क्या धारा 35(6) के अधीन गिरफ्तारी करते समय पुलिस अधिकारियों को धारा 35(3) का नोटिस जारी करने के प्रक्रम में विचार किये गए तथ्यों या कारकों से भिन्न नए तथ्यों या कारकों पर निर्भर रहना आवश्यक है। निर्वचन में इस कमी के कारण न्यायालय द्वारा आगे स्पष्टीकरण की आवश्यकता पड़ी। 
  • वर्तमान मामले में विशेष रूप से यह विचार किया गया कि क्या धारा 35(3) नोटिस जारी करने के समय विद्यमान समान परिस्थितियों और कारकों का उपयोग धारा 35(6) के अधीन गिरफ्तारी को न्यायसंगत ठहराने के लिये किया जा सकता है। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 35(6) के अधीन गिरफ्तारी करते समयधारा 35(3) के अधीन उपस्थिति की मांग करने वाला नोटिस जारी करने के प्रक्रम के पश्चात्उक्त नोटिस जारी करने के समय विद्यमान परिस्थितियों और कारकों को पुलिस अधिकारी द्वारा पश्चात्वर्ती गिरफ्तारी करते समय ध्यान में नहीं रखा जाएगा।  
  • न्यायालय ने माना कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 35(6) के अधीन गिरफ्तारी करने के लियेयह उन सामग्रियों और कारकों पर आधारित होना चाहिये जोभारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 35(3) के अधीन नोटिस जारी करने के समय पुलिस अधिकारी के पास उपलब्ध नहीं थे।  
  • न्यायालय ने चेतावनी दी कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 35(6) के अधीन गिरफ्तारी की शक्ति का प्रयोग बहुत ही संयम से किया जाना चाहिये 
  • न्यायालय ने पुलिस अधिकारियों को निदेश जारी किया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 35(6) के साथ धारा 35(1)(ख) के अधीन उनकी गिरफ्तारी की शक्तिभारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 35(3) के अधीन जारी नोटिस के अनुसारनियमित मामला नहीं हैअपितु एक अपवाद है। 
  • न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि पुलिस अधिकारियों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे गिरफ्तारी की उक्त शक्ति का प्रयोग करते समय सतर्क और संयमित रहें। 
  • न्यायालय ने पुष्टि की कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 35(3) के अधीन नोटिस जारी करना सात वर्ष तक के कारावास से दण्डनीय अपराधों के लिये अनिवार्य है। 
  • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि धारा 35(6) के अधीन गिरफ्तारी ऐसे नोटिस के पश्चात् भी केवल नई सामग्री के आधार पर की जा सकती है जोधारा 35(3) नोटिस जारी होने के समय पुलिस अधिकारी के पास उपलब्ध नहीं थी। 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन गिरफ्तारी से संबंधित प्रमुख उपबंध क्या हैं? 

बारे में: 

  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 35 एक ऐसा उपबंध है जो पुलिस अधिकारियों को संज्ञेय अपराधों से संबंधित विनिर्दिष्ट परिस्थितियों में मजिस्ट्रेट से वारण्ट प्राप्त किये बिना किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार करने का अधिकार देता है। 

बिना वारण्ट के गिरफ्तारी के आधार: 

तत्काल गिरफ्तारी की परिस्थितियाँ: 

  • जब कोई व्यक्ति पुलिस अधिकारी की उपस्थिति में संज्ञेय अपराध करता है। 
  • जब विश्वसनीय सूचना प्राप्त होती है कि किसी व्यक्ति ने संज्ञेय अपराध किया है जो सात वर्ष से अधिक अवधि के कारावासजुर्माने सहित या बिना जुर्माने केअथवा मृत्युदण्ड से दण्डनीय है।  
  • जब किसी व्यक्ति को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता या राज्य सरकार द्वारा अपराधी उद्घोषित किया गया हो 
  • जब किसी व्यक्ति के कब्जे से चोरी की संपत्ति बरामद हो और उस पर उस संपत्ति से संबंधित अपराध करने का युक्तियुक्त संदेह हो 
  • जब कोई व्यक्ति किसी पुलिस अधिकारी को उसके विधिपूर्ण कर्त्तव्य के निर्वहन में बाधा पहुँचाता हैअथवा विधिपूर्ण अभिरक्षा से भाग गया हो या भागने का प्रयत्न कर रहा हो 
  • जब किसी व्यक्ति पर संघ के सशस्त्र बलों में से किसी से अभित्याजक होने का उचित संदेह हो 
  • जब कोई व्यक्ति भारत के बाहर किये गए ऐसे किसी कृत्य में संलिप्त होजो यदि भारत में किया गया होता तो दण्डनीय अपराध होता 
  • जो छोड़ा गया सिद्धदोष होते हुए धारा 394(5) के अधीन बनाए गए किसी को भंग करता हैं। 
  • जब किसी अन्य पुलिस अधिकारी से गिरफ्तारी हेतु अध्यपेक्षा प्राप्त हो 

सात वर्ष तक के दण्डनीय अपराधों में सशर्त गिरफ्तारी 

  • ऐसे संज्ञेय अपराधों जो सात वर्ष से कम अवधि के कारावास या सात वर्ष तक के कारावास से दण्डनीय होंउनमें गिरफ्तारी तभी की जाएगी जब विशिष्ट शर्तें पूरी हों: 
    • पुलिस अधिकारी के पास युक्तियुक्त परिवादविश्वसनीय सूचना या युक्तियुक्त संदेह के आधार पर यह विश्वास करने का कारण हो कि संबंधित व्यक्ति ने अपराध किया है।               
    • पुलिस अधिकारी इस बात से संतुष्ट होना चाहिये कि आगे के अपराधों को रोकनेउचित अन्वेषण करनेसाक्ष्यों से छेड़छाड़ को रोकनेसाक्षियों को प्रलोभन या धमकी देने से रोकने या न्यायालय में पेशी सुनिश्चित करने के लिये गिरफ्तारी आवश्यक है। 
    • गिरफ्तारी करते समय पुलिस अधिकारी को कारणों को लिखित रूप में अभिलिखित करना होगा। 
  • नोटिस प्रक्रिया (गिरफ्तारी का विकल्प): 
    • जब उपरोक्त उपबंधों के अधीन गिरफ्तारी आवश्यक न होतो पुलिस अधिकारी को एक नोटिस जारी करना होगा जिसमें व्यक्ति को उसके समक्ष या किसी निर्दिष्ट स्थान पर उपस्थित होने का निदेश दिया गया हो। 
    • संबंधित व्यक्ति का यह कर्त्तव्य है कि वह नोटिस की शर्तों का पालन करेऔर जब तक वह इनका पालन करता हैतब तक उसे गिरफ्तार नहीं किया जा सकताजब तक कि पुलिस अधिकारी गिरफ्तारी की आवश्यकता के विनिर्दिष्ट कारणों को अभिलिखित न करे 
  • परिणाम और सुरक्षा उपाय: 
    • यदि कोई व्यक्ति नोटिस का पालन करने में असफल रहता है या अपनी पहचान बताने से इंकार करता हैतो पुलिस अधिकारी सक्षम न्यायालय द्वारा पारित किसी भी आदेश के अधीननोटिस में उल्लिखित अपराध के लिये उसे गिरफ्तार कर सकता है। 
    • कोई भी गिरफ्तारीऐसे अपराध के मामले में जो तीन वर्ष से कम के कारावास से दण्डनीय है और ऐसा व्यक्ति जो गंभीर बीमारी से पीड़ित है या साठ वर्ष से अधिक की आयु का हैऐसे अधिकारीजो पुलिस उपनिरीक्षक से नीचे की पंक्ति का न होकी पूर्व अनुमति के बिना नहीं की जाएगी 
    • इस उपबंध में एक अनिवार्य सुरक्षा उपाय सम्मिलित है जिसके अधीन पुलिस अधिकारियों को गिरफ्तारी न किये जाने पर लिखित रूप में कारण अभिलिखित करना आवश्यक हैजिससे जवाबदेही सुनिश्चित होती है और मनमानी गिरफ्तारियों को रोका जा सकता हैसाथ ही विधि प्रवर्तन की आवश्यकताओं और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा के बीच संतुलन बना रहता है।