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पारिवारिक कानून

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 25

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 11-May-2026

"हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 25 के अधीन निहित निषेध निर्वसीयत उत्तराधिकार तथा वसीयती उत्तराधिकार — दोनों पर समान रूप से लागू होता है। जिस व्यक्ति पर उस व्यक्ति की हत्या का आरोप होजिससे उत्तराधिकार का दावा किया जा रहा हैवह न केवल धारा 25 के अधीनअपितु न्यायनिष्पक्षता एवं समता के सिद्धांतों के आधार पर भी अपने अधिकारों का दावा करने से वंचित हो जाता है।" 

न्यायमूर्ति जे.बी. परदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

भारत के उच्चतम न्यायालय की एक खंडपीठजिसमें न्यायमूर्ति जे.बी. परदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन शामिल थेनेमंजुला और अन्य बनाम डी.ए. श्रीनिवास (2026) के मामलेमें उच्च न्यायालय के आदेश को अपास्त कर दिया और प्रारंभिक प्रक्रम में ही वादी की याचिका को खारिज करने के विचारण न्यायालय के निर्णय को बहाल कर दियायह मानते हुए कि वादी - जिसे मृतक की हत्या में अभियुक्त बनाया गया था - हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 (HSA) की धारा 25 के अधीन मृतक की संपत्ति पर उत्तराधिकार का दावा करने के लिये निरर्हत था। 

  • न्यायालय ने आगे स्पष्ट किया कि हत्या के लिये वास्तविक दोषसिद्धिधारा 25 हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के अधीन निरर्हित लागू होने के लिये एक पूर्व शर्त नहीं हैऔर सिविल कार्यवाही मेंइस विवाद्यक की जांच संभावनाओं की प्रबलता के मानक पर की जा सकती है। 

मंजुला और अन्य बनाम डी.ए. श्रीनिवास (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • वादी ने दावा किया कि वह मृतक के. रघुनाथ के नाम पर खरीदी गई संपत्ति का वास्तविक स्वामी है। के. रघुनाथ द्वारा अपने पक्ष में निष्पादित कथित वसीयत पर विश्वास करते हुएवादी ने वसीयती उत्तराधिकार के माध्यम से स्वामित्व और स्वामित्व की घोषणा की मांग करते हुए वाद दायर किया। 
  • प्रतिवादी ने सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश नियम 11(घ) के अधीन एक आवेदन दाखिल करके वाद का विरोध कियाजिसमें वाद को इस आधार पर खारिज करने की मांग की गई कि यह विधि द्वाराविशेष रूप से हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 25 द्वारा वर्जित हैक्योंकि वादी को के. रघुनाथ की हत्या के मामले में अभियुक्त के रूप में नामित किया गया था - वही व्यक्ति जिसकी संपत्ति से वह उत्तराधिकार प्राप्त करना चाहता था।  
  • विचारण न्यायालय ने प्रतिवादी की अर्जी मंजूर कर ली और वादपत्र नामंजूर कर दिया। तथापिउच्च न्यायालय ने विचारण न्यायालय के इस आदेश को पलट दियाजिसके बाद प्रतिवादियों ने अपील में उच्चतम न्यायालय का रुख किया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं 

  • हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 25 के दायरे पर:न्यायालय ने माना कि धारा 25 के अंतर्गत वर्जन निर्वसयती और वसीयत के साथ दोनों प्रकार के उत्तराधिकार पर लागू होता है। मृतक की हत्या के अभियुक्त व्यक्ति कोजिससे उत्तराधिकार का दावा किया जा रहा हैऐसे किसी भी अधिकार का दावा करने से निरर्हित घोषित कर दिया जाता है - न केवल सांविधिक प्रावधान के अधीन अपितु न्यायनिष्पक्षता और समानता के व्यापक सिद्धांतों के आधार पर भी। 
  • Ex Turpi Causa की सूक्ति पर :न्यायालय ने तर्क दिया कि किसी व्यक्ति को अपने ही सदोष कार्य से लाभ उठाने या उसका फायदा उठाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिये। यह सिद्धांत 'ex turpi causa non oritur actio' (गलत काम से कोई अधिकार उत्पन्न नहीं होता) और इस नियम में निहित है कि कोई भी व्यक्ति अपने ही सदोष कार्य से लाभ नहीं उठा सकता। 
  • दोषसिद्धि की आवश्यकता के संबंध में:न्यायालय ने स्पष्ट किया कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 25 के अधीन निरर्हित होने के लिये वास्तविक दोषसिद्धि को पूर्व शर्त नहीं बनाया गया है। चूँकि यह उपबंध सिविल परिणाम लागू करता हैइसलिये इस विवाद्यक की परीक्षा आपराधिक अभियोग में लागू होने वाले कठोर सबूत मानक से स्वतंत्र रूप सेसंभावनाओं की प्रबलता के मानक के आधार पर की जा सकती है। 
  • महत्त्वपूर्ण तथ्यों को छिपाने के संबंध में:न्यायालय ने पाया कि वादी ने अपने अभियोग में के. रघुनाथ की हत्या के आरोप से संबंधित महत्त्वपूर्ण तथ्य को छिपाया थाऔर CBI अन्वेषण लंबित होने का उल्लेख किया था। न्यायालय ने माना कि महत्त्वपूर्ण तथ्यों को छिपाने का दोषी व्यक्ति सुनवाई का हकदार नहीं हैऔर इस आधार पर भी वादपत्र नामंजूर  किया जा सकता है। 

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 25 क्या है? 

के बारे में: 

  • हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 (HSA) में उत्तराधिकार शब्द को कहीं भी परिभाषित नहीं किया गया है । 
  • सामान्य तौर परउत्तराधिकार को किसी मृत व्यक्ति की संपत्ति में अधिकारों और दायित्त्वों के उसके उत्तराधिकारी या उत्तराधिकारियों को हस्तांतरण के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। 
  • यह अधिनियम हिंदुओंबौद्धोंजैनियों और सिखों पर लागू होता हैलेकिन मुसलमानोंईसाइयोंपारसियों या यहूदियों पर लागू नहीं होता है। 

धारा 25 — हत्यारा करने वाला निरर्हित होना: 

  • हत्या करने वालायाहत्या में सहायता करने वालाव्यक्तिदो स्थितियों में संपत्ति विरासत में पाने के लिये निरर्हित हो जाता है: 
  • मृतक व्यक्तिकी संपत्ति , और 
  • कोईअन्य संपत्तिजिसके उत्तराधिकार को आगे बढ़ाने के लिये हत्या या हत्या में सहायता की गई हो। 
  • इस प्रकारनिरर्हित न केवल पीड़ित से प्राप्त प्रत्यक्ष विरासत को अपितु हत्या के पीछे के हेतु के रूप में प्राप्त किसी भी अप्रत्यक्ष संपत्ति लाभ की भी बात करती करती है।