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सिविल कानून

नि:शुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम के अधीन 14 वर्ष की आयु के पश्चात् कक्षा 8 पूर्ण करना अवैध नहीं है

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 16-Mar-2026

पंकज चौहान और अन्य बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य और अन्य 

"चौदह वर्ष की आयु प्राप्त करने के बाद कक्षा पूरी करना नि: शुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के अधीन निषिद्ध नहीं है।" 

न्यायमूर्ति अजय मोहन गोयल 

चर्चा में क्यों? 

हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति अजय मोहन गोयल नेपंकज चौहान और अन्य बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य और अन्य (2026) के मामलेमें प्रत्यर्थी की अंशकालिक बहु-कार्यकारी के रूप में नियुक्ति को चुनौती देने वाली एक रिट याचिका को खारिज कर दियायह स्पष्ट करते हुए कि चौदह वर्ष की आयु प्राप्त करने के बाद कक्षा पूरी करना नि:शुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के अधीन निषिद्ध नहीं है। 

  • न्यायालय ने निर्णय दिया कि नि:शुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम एक ऐसी विधि है जिसे निर्दिष्ट आयु वर्ग के बालकों के लिये शिक्षा तक पहुँच को प्रत्याभूत करने के लिये बनाई गई हैऔर इसके प्रावधानों को उस आयु के बाद अपनी स्कूली शिक्षा जारी रखने वाले व्यक्तियों के लिये अयोग्यता उत्पन्न करने के रूप में नहीं पढ़ा जा सकता है। 

पंकज चौहान और अन्य बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • याचिकाकर्त्ता पंकज चौहान ने हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले के एक सरकारी प्राथमिक विद्यालय में प्रत्यर्थी की अंशकालिक बहुकार्यकारी के रूप में नियुक्ति को चुनौती दी। 
  • याचिकाकर्त्ता ने आरोप लगाया कि चयनित अभ्यर्थी पहले कक्षा में अनुत्तीर्ण हो गया था और चौदह वर्ष की आयु पार करने के बाद उसने एक निजी विद्यालय से कक्षा का नया प्रमाण पत्र प्राप्त किया था।  
  • उन्होंने तर्क दिया कि ऐसा प्रमाण पत्र अवैध था और नि:शुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के प्रावधानों के विपरीत था।  
  • याचिकाकर्त्ता द्वारा अंशकालिक बहुकार्यकारी योजना, 2020 के अधीन दायर की गई अपील को प्रथम अपीलीय प्राधिकारी ने इस आधार पर नामंजूर कर दिया कि कोई महत्त्वपूर्ण अनियमितता नहीं पाई गई। 
  • विद्यालय शिक्षा निदेशक के समक्ष की गई एक और अपील को भी इसी प्रकार नामंजूर कर दिया गया। 
  • इन आदेशों से असंतुष्ट होकर याचिकाकर्त्ता ने रिट याचिका के माध्यम से हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय का रुख किया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं 

  • नि:शुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम के दायरे पर:न्यायालय ने स्पष्ट किया कि नि:शुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 छह से चौदह वर्ष की आयु वर्ग के बालकों के लिये निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा सुनिश्चित करने के विशिष्ट उद्देश्य से अधिनियमित किया गया था। अधिनियम के प्रावधानों को ध्यानपूर्वक पढ़ने से पता चलता है कि चौदह वर्ष से अधिक आयु के किसी व्यक्ति को किसी भी विद्यालय में कक्षा में प्रवेश लेने या उसे पूर्ण करने से रोकने वाला कोई सांविधिक प्रतिबंध नहीं है। 
  • प्रमाण पत्र की प्रकृति पर:न्यायालय ने पाया कि चयनित अभ्यर्थी द्वारा प्रस्तुत कक्षा के प्रमाण पत्र का सक्षम अधिकारियों द्वारा विधिवत सत्यापन किया गया था। इसकी प्रामाणिकता पर संदेह करने का कोई आधार नहीं मिलाऔर याचिकाकर्त्ता ऐसी कोई महत्त्वपूर्ण अनियमितता प्रदर्शित करने में असफल रहा जिससे इसे अमान्य घोषित किया जा सके। 
  • नियुक्ति को चुनौती देने के संबंध में:न्यायालय ने याचिकाकर्त्ता के तर्कों में कोई योग्यता नहीं पाई और अपीलीय प्राधिकरण तथा विद्यालय शिक्षा निदेशक दोनों के निर्णयों को बरकरार रखते हुए पुष्टि की कि प्रत्यर्थी की नियुक्ति किसी भी विधिक कमी से दूषित नहीं थी। 

नि:शुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम क्या है? 

पृष्ठभूमि: 

  • यह अधिनियम अगस्त 2009 में संसद द्वारा पारित किया गया तथा वर्ष 2010 में प्रभावी हुआ। 
  • अनुच्छेद 21 (86वाँ सांविधिक संशोधन, 2002) के आधार परशिक्षा को 6-14 वर्षकी आयु के बालकों के लियेमौलिक अधिकार बना दिया गया। 

मुख्य प्रावधान: 

  • से 14 वर्ष की आयु के सभी बालकों के लिये पड़ोस के विद्यालयों में निःशुल्क एवं अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा का प्रावधान 
  • किसी भी प्रकार की फीस या शुल्क नहीं लिया जाएगा जिससे बच्चे की शिक्षा पूर्ण करने में बाधा उत्पन्न हो 
  • जो बच्चे विद्यालय में नामांकित नहीं हैंउन्हें आयु के अनुरूप कक्षा में प्रवेश दिया जाएगा 
  • इसमें केंद्र/राज्य सरकारोंस्थानीय अधिकारियों और संरक्षकों के कर्त्तव्यों का उल्लेख किया गया है। 
  • यह विधेयक छात्र-शिक्षक अनुपात (PTR), आधारभूत संरचनाकार्य दिवसों और शिक्षकों की योग्यता के लिये मानदंड निर्धारित करता है। 
  • शिक्षकों की नियुक्ति में शहरी-ग्रामीण असंतुलन नहीं हैशिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों के लिये प्रयोग नहीं किया जा सकता (सिवाय जनगणनानिर्वाचनआपदा अनुतोष के)। 

निषेध: 

  • शारीरिक दण्ड तथा मानसिक उत्पीड़न 
  • प्रवेश हेतु स्क्रीनिंग प्रक्रियाएँ 
  • प्रति व्यक्ति फीस  
  • शिक्षकों द्वारा निजी ट्यूशन 
  • अमान्यता प्राप्त विद्यालयों का संचालन 

महत्त्व: 

  • निजी विद्यालयों में 25% सीटें आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS)/वंचित वर्गों के लिये आरक्षित हैं (धारा 12(1)())। 
  • विद्यालय प्रबंधन समितियों (SMC) का गठनजिससे सहभागी शासन सुनिश्चित हो सके। 
  • कक्षा तक नो-डिटेंशन नीति (No Detention Policy) तथा सतत एवं समग्र मूल्यांकन (CCE) प्रणाली की शुरुआत। 
  • जातिधर्म या लिंग के आधार पर विभेद के प्रति शून्य सहिष्णुता (Zero tolerance)। 
  • उच्च प्राथमिक स्तर पर नामांकन में 19.4% की वृद्धि हुई (2009-2016)। 

आलोचनाएँ: 

  • वर्ष से कम आयु के बालकों को इस अधिनियम के अंतर्गत शामिल नहीं किया गया। 
  • अधिनियम का प्रारूप शीघ्रता में तैयार किया गयाजिसमें शिक्षा की गुणवत्ता पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया गया 
  • निजी विद्यालयों में 25% EWS आरक्षण के क्रियान्वयन में व्यावहारिक कठिनाइयाँ 
  • अनाथ बच्चों के लिये आवश्यक दस्तावेज़ों (जन्म प्रमाण पत्र, BPL कार्ड आदि) की अनुपलब्धता के कारण बहिष्करण 
  • 2019 संशोधन द्वारा कक्षा एवं में परीक्षाएँ पुनः प्रारंभ की गईंजिससे नो-डिटेंशन नीति का आंशिक ह्रास हुआ 
  • शिक्षकों के पर्याप्त प्रशिक्षण के अभाव में CCE प्रणाली के प्रभावी क्रियान्वयन में कठिनाई