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आपराधिक कानून
पुलिस अभिरक्षा के बाहर किया गया प्रकटीकरण कथन साक्ष्य के रूप में ग्राह्य नहीं
« »18-Feb-2026
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रोहित जांगड़े बनाम छत्तीसगढ़ राज्य "साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि किसी अपराध के अभियुक्त व्यक्ति से पुलिस अभिरक्षा में रहते हुए प्राप्त सूचना, जिसके परिणामस्वरूप किसी तथ्य का पता चलता है, विचारण में सबूत के रूपर में प्रयोग किया जा सकता है। कथन करते समय अभियुक्त पुलिस अभिरक्षा में नहीं था, इसलिये यह धारा 27 के दायरे से बाहर है ।" न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
रोहित जांगडे बनाम छत्तीसगढ़ राज्य (2026) के मामले में न्यायमूर्ति संजय कुमार और के. विनोद चंद्रन की पीठ ने अपनी छह वर्षीय सौतेली पुत्री की हत्या के दोषी व्यक्ति को दोषमुक्त कर दिया, यह निर्णय देते हुए कि साक्ष्य की बरामदगी की ओर ले जाने वाला प्रकटीकरण कथन भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (IEA) की धारा 27 के अधीन तभी ग्राह्य है जब कथन करते समय अभियुक्त पुलिस अभिरक्षा में था।
रोहित जांगडे बनाम छत्तीसगढ़ राज्य (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- अभियुक्त को अपनी छह वर्षीय सौतेली पुत्री की हत्या का दोषी पाया गया।
- अभियोजन पक्ष का मामला काफी हद तक अभियुक्त द्वारा किये गए एक प्रकटीकरण कथन पर आधारित था, जिसके कारण मृतक के अस्थि अवशेषों की खोज हुई।
- धारा 27 के अधीन ज्ञापन 13 अक्टूबर, 2018 को सुबह 10:30 बजे अभिलिखित किया गया था, जबकि गिरफ्तारी ज्ञापन से पता चलता है कि अभियुक्त को उसी दिन रात 10:00 बजे गिरफ्तार किया गया था – कथन अभिलिखित होने के लगभग बारह घंटे बाद।
- अभियुक्त को प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज होने से दो दिन पहले, 8 अक्टूबर 2018 को छोड़ दिया गया था।
- DNA साक्ष्य से बच्चे की मृत्यु की पुष्टि होते हुए भी, मृत्यु का निश्चित समय निर्धारित नहीं किया जा सका, क्योंकि अपराध के साक्ष्य बरामद नहीं हुए थे।
- परिवार और पुलिस को सूचित किया गया था कि बच्चा आखिरी बार अभियुक्त के साथ गया था, फिर भी लापता बच्चे के संबंध में काफी समय तक कोई परिवाद नहीं किया गया और उस दौरान अभियुक्त से पूछताछ नहीं की गई।
- अधीनस्थ न्यायालय ने अभियुक्त को दोषी ठहराया था और अपील के जरिए मामला उच्चतम न्यायालय के समक्ष आया।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
धारा 27 के अधीन ग्राह्यता पर – अभिरक्षा अनिवार्य शर्त:
- पीठ ने निर्णय दिया कि अभियुक्त के प्रकटीकरण कथनों के आधार पर मृतक के अस्थि-अवशेषों की हुई बरामदगी को साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि ऐसे प्रकटीकरण कथन करते समय अभियुक्त पुलिस अभिरक्षा में नहीं था।
- न्यायालय ने दुर्लाव नामासुद्र बनाम सम्राट (1931) के निर्णय का हवाला दिया , जिसमें यह प्रतिपादित किया था कि पुलिस अभिरक्षा में न होने वाले व्यक्ति से प्राप्त जानकारी को धारा 27 के अंतर्गत नहीं लाया जा सकता है।
"अभिरक्षा" के अर्थ पर:
- यद्यपि, न्यायालय ने स्वीकार किया कि "अभिरक्षा" का अर्थ औपचारिक गिरफ्तारी होना आवश्यक नहीं है और इसमें निगरानी या अवरोध सम्मिलित हो सकता है।
- ज्ञापन दर्ज करने और औपचारिक गिरफ्तारी के बीच बारह घंटे से अधिक का अंतराल निर्णायक साबित हुआ।
धारा 8 के अधीन आचरण साक्ष्य के रूप में ग्राह्यता:
- आंध्र प्रदेश राज्य बनाम गंगुला सत्य मूर्ति (1997) के पूर्व पूर्व निर्णय पर विश्वास करते हुए, न्यायालय ने माना कि यद्यपि अभिरक्षा से बाहर दिया गया प्रकटीकरण कथन धारा 27 के दायरे से बाहर आता है, फिर भी इसे साक्ष्य अधिनियम की धारा 8 के अधीन अभियुक्त के आचरण को दर्शाने के लिये ग्राह्य माना जा सकता है ।
- तथापि, पीठ ने इस बात पर बल दिया कि ऐसे सबूत कमजोर हैं और अकेले ही दोषसिद्धि का आधार नहीं बन सकते।
संदेह का लाभ एवं दोषमुक्ति:
- न्यायमूर्ति चंद्रन द्वारा लिखित निर्णय में यह उल्लेख किया गया कि DNA साक्ष्य से बालिका की मृत्यु की पुष्टि तो होती है, किंतु यह अभियुक्त को अपराध से निश्चायक रूप से नहीं जोड़ता, विशेष रूप से तब जब मृत्यु के समय के संबंध में कोई निश्चित निष्कर्ष उपलब्ध नहीं है तथा बालिका के लापता होने की सूचना देने में परिवार द्वारा की गई दीर्घ एवं अस्पष्टीकृत देरी भी विद्यमान है।
- अपील मंजूर कर ली गई।
प्रकटीकरण कथन क्या हैं?
बारे में:
- यह प्रकटीकरण कथन भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के अधीन उपबंधित किया गया है।
- यह धारा पश्चात्वर्ती घटनाओं द्वारा पुष्टि के सिद्धांत पर आधारित है - एक तथ्य वास्तव में दी गई जानकारी के परिणामस्वरूप खोजा जाता है, जिसके परिणामस्वरूप एक भौतिक वस्तु की बरामदगी होती है।
भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 27:
- यह अन्य उपबंधों के लिये एक शर्त के रूप में है।
- किसी अपराध के अभियुक्त व्यक्ति से प्राप्त जानकारी के आधार पर ही तथ्य का पता लगाया जाना चाहिये।
- अभियुक्त को पुलिस की अभिरक्षा में होना चाहिये।
- इस प्रकार खोजे गए तथ्य से संबंधित जितनी भी जानकारी स्पष्ट रूप से उपलब्ध हो, उसे साबित किया जा सकता है।
- यह इस बात से अप्रभावित है कि कथन संस्वीकृति के समान है या नहीं।
- पुलुकुरी कोट्टाया बनाम सम्राट (1947) के मामले में, सर जॉन ब्यूमोंट ने निर्णय दिया कि धारा 27 केवल भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 26 का परंतुक है।
- यद्यपि, हाल ही में जाफरूद्दीन बनाम केरल राज्य (2022) के मामले में, उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया है कि धारा 27 पूर्ववर्ती धाराओं, विशेष रूप से धारा 25 और धारा 26 का अपवाद है।
भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 को लागू करने के लिये आवश्यक शर्तें:
- यह बात पेरुमल राजा उर्फ पेरुमल बनाम पुलिस निरीक्षक द्वारा राज्य प्रतिनिधि (2024) के मामले में निर्धारित की गई थी, जहाँ न्यायालय ने निम्नलिखित निर्णय दिया:
- सर्वप्रथम, तथ्यों की खोज होनी चाहिये। ये तथ्य अभियुक्त व्यक्ति से प्राप्त जानकारी के आधार पर सुसंगत होने चाहिये।
- द्वितीयतः, ऐसे तथ्य की खोज के संबंध में साक्ष्य प्रस्तुत किया जाना आवश्यक है। इसका अभिप्राय यह है कि वह तथ्य पूर्व से ही पुलिस के ज्ञान में नहीं होना चाहिये।
- तृतीयतः, सूचना प्राप्त किये जाने के समय अभियुक्त पुलिस अभिरक्षा में होना चाहिये।
- अंत में केवल उतनी ही सूचना साक्ष्य के रूप में ग्राह्य होगी, जो स्पष्टतः उस तथ्य से संबंधित हो, जिसकी खोज की गई है।
- इस खोजे गए तथ्य में निम्नलिखित बातें सम्मिलित होंगी:
- वह स्थान जहाँ से कोई वस्तु प्राप्त/उत्पन्न की गई हो; तथा।
- उक्त तथ्य के संबंध में अभियुक्त का ज्ञान।
भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 का कौन सा प्रावधान प्रकटीकरण विवरण प्रदान करता है?
- यह भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (BSA) की धारा 23 (2) के परंतुक के रूप में निहित है ।
- धारा 23 (2) में उपबंधित किया गया है:
- कोई भी संस्वीकृति, जो किसी व्यक्ति ने उस समय की हो जब वह पुलिस अधिकारी की अभिरक्षा में हो, उसके विरुद्ध साबित न की जाएगी जब तक, कि वह मजिस्ट्रेट की साक्षात् उपस्थिति में न की गई हो।
- परंतु जब किसी तथ्य के बारे में यह अभिसाक्ष्य दिया जाता है कि किसी अपराध के अभियुक्त व्यक्ति से, जो पुलिस अधिकारी की अभिरक्षा में हो. प्राप्त जानकारी के परिणामस्वरूप उसका पता चला है, तब ऐसी जानकारी में से, उतनी चाहे वह संस्वीकृति की कोटि में आती हो या नहीं, जितनी पता चले हुए तथ्य से स्पष्टतया संबंधित है, साबित की जा सकेगी।
भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 पर महत्त्वपूर्ण विधिक मामले कौन से हैं?
- मोहम्मद इनायतुल्लाह बनाम महाराष्ट्र राज्य (1976):
- यह निर्णय दिया गया है कि धारा को लागू करने के लिये अधिरोपित की गई प्रथम और आवश्यक शर्त एक ऐसे तथ्य की खोज है जो किसी अपराध के अभियुक्त व्यक्ति से प्राप्त जानकारी के परिणामस्वरूप एक सुसंगत तथ्य होना चाहिये।
- दूसरी बात यह है कि ऐसे तथ्य की खोज का प्रमाण देना आवश्यक है । पुलिस को पहले से ज्ञात तथ्य इस शर्त को पूरा नहीं करेगा और इस श्रेणी में नहीं आएगा।
- तीसरी शर्त यह है कि सूचना प्राप्त होने के समय अभियुक्त पुलिस अभिरक्षा में होना चाहिये।
- अंत में, केवल उतनी ही जानकारी ग्राह्य है जो किसी भौतिक वस्तु की बरामदगी के परिणामस्वरूप खोजे गए तथ्य से स्पष्ट रूप से संबंधित हो ।
- पेरुमल राजा उर्फ पेरुमल बनाम पुलिस निरीक्षक द्वारा राज्य प्रतिनिधि (2024):
- धारा 27 को लागू करने के लिये आवश्यक शर्तें निम्नलिखित हैं:
- सर्वप्रथम, तथ्यों की खोज होनी चाहिये। ये तथ्य अभियुक्त व्यक्ति से प्राप्त जानकारी के आधार पर सुसंगत होने चाहिये।
- दूसरे, ऐसे तथ्य की खोज के संबंध में साक्ष्य प्रस्तुत किया जाना आवश्यक है। इसका तात्पर्य यह है कि वह तथ्य पूर्व से ही पुलिस के संज्ञान में नहीं होना चाहिये।
- तीसरा, सूचना प्राप्त होने के समय अभियुक्त पुलिस की अभिरक्षा में होना चाहिये।
- अंत में, केवल उतनी ही जानकारी ग्राह्य है जो इस प्रकार खोजे गए तथ्य से स्पष्ट रूप से संबंधित हो।
- धारा 27 को लागू करने के लिये आवश्यक शर्तें निम्नलिखित हैं:
- दिल्ली एन.सी.टी. राज्य बनाम नवजोत संधू उर्फ अफसान गुरु (2005):
- उच्चतम न्यायालय ने इस बात की पुष्टि की कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के अर्थ में खोजा गया तथ्य कोई ठोस तथ्य होना चाहिये जिससे जानकारी प्रत्यक्ष रूप से संबंधित हो।