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सिविल कानून

प्रपीड़न का आरोप लगाने वाला वाद सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 7 नियम 11 के अधीन अस्वीकार्य नहीं

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 11-Feb-2026

मुथुराजन और अन्य बनाम वैकुंदराजन और अन्य 

"प्रपीड़नअसम्यक् असर और उससे भी महत्त्वपूर्णदुर्व्यपदेशन के आधारजिसके परिणामस्वरूप एक असमान विभाजन होता हैको सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 7, नियम 11 के अधीन आवेदन पर विचार करते समय तुरंत नामंजूर नहीं किया जा सकता है।" 

न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति संजय कुमार और के. विनोद चंद्रन की पीठ नेजे. मुथुराजन और अन्य बनाम एस. वैकुंदराजन और अन्य (2026)के मामले में यह निर्णय दिया कि प्रपीड़नअसम्यक् असरदुर्व्यपदेशन का अभिकथन करने वाले सिविल वाद कोसिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) के आदेश नियम 11 के अधीन प्रारंभिक चरण में नामंजूर नहीं किया जा सकता है।  न्यायालय ने विचारण न्यायालय और मद्रास उच्च न्यायालय के एक साथ दिये गए निष्कर्षों को अपास्त कर दियाजिन्होंने अपीलकर्त्ता के वाद को विधिक की प्रक्रिया का दुरुपयोग बताते हुए खारिज कर दिया था।  

जे. मुथुराजन और अन्य बनाम एस. वैकुंडराजन और अन्य (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी 

  • यह विवाद 308 पृष्ठों के विभाजन विलेख (KBPP) से उत्पन्न हुआजिस पर सभी पक्षकारों ने हस्ताक्षर करने की बात स्वीकार की थी। 
  • प्रत्यर्थी-वैकुंदराजन समूह ने इस विलेख को बाध्यकारी समझौते के रूप में लागू करने की मांग कीजबकि अपीलकर्त्ता-जेगाथीसन समूह ने दावा किया कि यह विलेख प्रपीड़नअसम्यक् असरदुर्व्यपदेशन के अधीन निष्पादित किया गया थाऔर यह केवल एक "अस्थायी मसौदा (tentative draft)" था। 
  • जनवरी, 2019 को जारी एक सुलह पंचाटजिसे कथित तौर पर माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम, 1996 के अधीन जारी किया गया थाने मामले को और जटिल बना दिया। इस पंचाट पर एक सौतेले भाई ने मध्यस्थ के रूप में हस्ताक्षर किये थेजिसमें KBPP को औपचारिक रूप से संपन्न समझौते के रूप में प्रमाणित किया गया था। 
  • प्रत्यर्थी ने तर्क दिया कि ये दस्तावेज़ मिलकर माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 36 के अधीन एक प्रवर्तनीय सुलह पंचाट का गठन करते हैं। 
  • अपीलकर्त्ता ने अभिकथित किया कि कोई वास्तविक सुलह नहीं हुई और यह पंचाट एक अनुचित व्यवस्था को वैध बनाने के लिये मनगढ़ंत तरीके से तैयार किया गया था। 
  • विचारण न्यायालय ने अपीलकर्त्ता की याचिका को सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश नियम 11 के अधीन खारिज कर दियाइसे उत्पीड़नकारी और विधि की प्रक्रिया का दुरुपयोग मानते हुएकेवल इसलिये कि वाद में प्रपीड़नअसम्यक् असरदुर्व्यपदेशन के आधार सम्मिलित थे। 
  • मद्रास उच्च न्यायालय ने विचारण न्यायालय के निर्णय को बरकरार रखाजिसके परिणामस्वरूप उच्चतम न्यायालय के समक्ष यह अपील दायर की गई है। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं 

  • न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन द्वारा लिखित एक निर्णय में न्यायालय ने कहा कि विचारण न्यायालय और उच्च न्यायालय नेवाद को अभिवचन के प्रक्रम में ही खारिज करके एकमौलिक त्रुटि की है। 
  • न्यायालय ने माना कि चूँकि अपीलकर्त्ताओं नेविभाजन विलेख के साथ-साथ सुलह पंचाट की सत्यता के संबंध मेंविचारणीय विवाद्यक उठाए थेइसलिये वादपत्र को प्रारंभिक चरण में ही सरसरी तौर पर नामंजूर नहीं किया जा सकता था। 
  • न्यायालय ने आगे कहा: "अत: हम पाते हैं कि विचारण न्यायालय का वह आदेशजिसे उच्च न्यायालय ने भी पुष्ट किया है और जिसके परिणामस्वरूप वादपत्र नामंजूर हुआ हैविधिवत रूप से घोर त्रुटिपूर्ण है। हमारा मत है कि वाद में प्रथम दृष्टया वाद-हेतुक प्रकट होता है और इसे न तो उत्पीड़नकारी कहा जा सकता है और न ही विधि की प्रक्रिया का दुरुपयोग।" 
  • न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि जैसा कि प्रकटन किया गया हैवाद-हेतुकवास्तविक थान कि भ्रामक या काल्पनिकऔर यह कि तथ्यात्मक अभिकथनविधिक आधार और मांगा गया अनुतोष अर्थहीन नहीं था और न ही उस स्तर पर यह कहा जा सकता था कि वाद असफल होना तय था। 
  • उच्चतम न्यायालय ने तदनुसार विचारण न्यायालय और मद्रास उच्च न्यायालय दोनों के विवादित निर्णयों को अपास्त कर दिया। 

सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश नियम 11 – वादपत्र का नामंजूर किया जाना क्या है? 

  • सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के आदेश नियम 11 में उसके अंतर्गत सूचीबद्ध विशिष्ट परिस्थितियों में वादपत्र को नामंजूर किये जाने का उपबंध है। 
    • खण्ड (क) के अनुसारयदि वाद में वाद-हेतुक प्रकट नहीं किया गया है तो वाद को नामंजूर कर दिया जाएगा। 
    • खण्ड (ख) में जहाँ दावाकृत अनुतोष का मूल्यांकन कम किया गया है और वादी मूल्यांकन को ठीक करने के लिये न्यायालय द्वारा अपेक्षित किये जाने पर उस समय के भीतर जो न्यायालय ने नियत किया हैऐसा करने में असफल रहता है 
    • खण्ड (ग) उन मामलों से संबंधित है जहाँ दावाकृत अनुतोष का मूल्यांकन ठीक है किंतु वादपत्र अपर्याप्त स्टाम्प-पत्र पर लिखा गया है और वादी अपेक्षित स्टाम्प पत्र के देने के लिये न्यायालय द्वारा अपेक्षित किये जाने पर उस समय के भीतरजो न्यायालय ने नियत किया हैऐसा करने में असफल रहता है। 
    • खण्ड (घ) के अनुसारजहाँ वादपत्र में के कथन से यह प्रतीत होता है कि वाद किसी विधि द्वारा वर्जित है 
    • खण्ड (ङ) में यह उपबंध है कि जहाँ यह दो प्रतियों में फाइल नहीं किया जाता है 
    • खण्ड (च) में नामंजूरी का उपबंध है जहाँ वादी नियम के उपबंधों का अनुपालन करने में असफल रहता है 
  • इस परंतुक में यह कहा गया है कि मूल्यांकन की शुद्धि के लिये या अपेक्षित स्टाम्प-पत्र के देने के लिये न्यायालय द्वारा नियत समय तब तक नहीं बढ़ाया जाएगा जब तक कि न्यायालय का अभिलिखित किये जाने वाले कारणों से यह समाधान नहीं हो जाता है कि वादी किसी असाधारण कारण सेन्यायालय द्वारा नियत समय के भीतरयथास्थितिमूल्यांकन की शुद्धि करने या अपेक्षित स्टाम्प-पत्र के देने से रोक दिया गया था और ऐसे समय के बढ़ाने से इंकार किये जाने से वादी के प्रति गंभीर अन्याय होगा। 
  • आदेश नियम 11 के अधीन वादपत्र को नामंजूर करने की शक्ति एक असाधारण शक्ति है और इसका प्रयोग अत्यंत सावधानी और विवेक के साथ किया जाना चाहिये 
  • खण्ड (घ) के अधीनन्यायालय को स्वयं वादपत्र में दिये गए कथनों से यह निर्धारित करना होगा कि क्या वाद किसी विधि द्वाराजिसमें परिसीमा विधि भी शामिल हैवर्जित है। 
  • आदेश नियम 11(के अधीन जांच का दायरा वादपत्र और उससे संलग्न या उसमें संदर्भित दस्तावेज़ों तक सीमित है। 
  • सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश नियम 11 के अधीन आवेदन पर निर्णय लेते समय प्रतिवादी द्वारा प्रस्तुत प्रतिरक्षा पर विचार नहीं किया जा सकता है। 
  • इस शक्ति का प्रयोग केवल स्पष्ट और प्रत्यक्ष मामलों में ही किया जाना चाहिये जहाँ वादपत्र प्रथम दृष्टया वर्जित हो। 
  • जहाँ परिसीमा का अवधारण साक्ष्य की परीक्षा या विधि और तथ्य के मिश्रित प्रश्नों पर विचार करने की आवश्यकता होती हैवहाँ खण्ड (घ) के अधीन वादपत्र को नामंजूर नहीं किया जा सकता है। 
  • आदेश नियम 11 के अधीन नामंजूरी के लिये आवेदन पर विचार करते समय न्यायालय वाद की चारदीवारी से बाहर नहीं जा सकता है। 
  • जहाँ कई अनुतोषों की मांग की जाती है और यहाँ तक ​​कि एक अनुतोष भी परिसीमा के भीतर हैवहाँ वादपत्र को विधि द्वारा वर्जित होने के आधार पर पूरी तरह से नामंजूर नहीं किया जा सकता है। 
  • इस उपबंध का उपयोग केवल तकनीकी आधार परवास्तविक दावों को गुण-दोष के आधार पूरी तरह से जांच किये बिना खारिज करने के लिये नहीं किया जाना चाहिये