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सिविल कानून
केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों के लिये उपदान (ग्रेच्युटी) का समावेशन
« »12-Feb-2026
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मनोहरन बनाम प्रशासनिक अधिकारी और अन्य (संबंधित मामलों सहित) "कर्मचारी केंद्रीय सिविल सेवा नियमों, केंद्रीय सरकारी कर्मचारी के दर्जे और उपदान के लिये उपदान संदाय अधिनियम के अधीन मिलने वाले लाभों का दावा नहीं कर सकते।" न्यायमूर्ति पंकज मिथल और एस.वी.एन. भट्टी |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
न्यायमूर्ति पंकज मिथल और एस.वी.एन. भट्टी की पीठ ने एन. मनोहरन बनाम प्रशासनिक अधिकारी और अन्य (2026) के मामले में निर्णय दिया कि परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE) के अधीन संचालित तूतीकोरिन स्थित भारी जल संयंत्र (HWP) के सेवानिवृत्त कर्मचारी, उपदान संदाय अधिनियम, 1972 ((PG Act) के अधीन उपदान के हकदार नहीं हैं। केंद्रीय सरकारी कर्मचारी होने के नाते, जो केंद्रीय सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1972 द्वारा शासित हैं, वे उपदान संदाय अधिनियम की धारा 2(ङ) के अपवर्जन खण्ड के अंतर्गत आते हैं।
एन. मनोहरन बनाम प्रशासनिक अधिकारी और अन्य (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- अपीलकर्त्ता परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE) के अधीन कार्यरत तूतीकोरिन स्थित भारी जल संयंत्र (HWP) के सेवानिवृत्त कर्मचारी थे।
- उन्होंने केंद्रीय सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1972 के अधीन अपनी ग्रेच्युटी की गणना को चुनौती दी, यह तर्क देते हुए कि वे उपदान संदाय अधिनियम, 1972 के अधीन अधिक राशि के हकदार थे, और अंतर राशि के संदाय की मांग की।
- नियंत्रण प्राधिकारी और अपीलीय प्राधिकारी ने कर्मचारियों के पक्ष में निर्णय सुनाते हुए माना कि भारी जल संयंत्र (HWP) एक "उद्योग" की श्रेणी में आता है और इसलिये उपदान संदाय अधिनियम के दायरे में आता है। मद्रास उच्च न्यायालय के एक एकल न्यायाधीश ने इस मत का समर्थन किया।
- तथापि, मद्रास उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ ने इस निर्णय को पलट दिया, यह मानते हुए कि चूँकि भारी जल संयंत्र (HWP) के सेवानिवृत्त कर्मचारी केंद्रीय सरकारी कर्मचारी हैं जो केंद्रीय सिविल सेवा पेंशन नियमों द्वारा शासित हैं, इसलिये वे उपदान संदाय अधिनियम की धारा 2(ङ) के अपवर्जन खण्ड के अंतर्गत आते हैं, और इसलिये उपदान संदाय अधिनियम के अधीन ग्रेच्युटी का दावा करने के हकदार "कर्मचारी" नहीं हैं।
- इसी के चलते उच्चतम न्यायालय में अपील दायर की गई।
- यह ध्यान दिया जा सकता है कि उपदान संदाय अधिनियम की धारा 2(ङ) के अनुसार, कर्मचारी की परिभाषा में ऐसा कोई व्यक्ति शामिल नहीं है जो केंद्र सरकार या राज्य सरकार के अधीन कोई पद धारण करता है और किसी अन्य अधिनियम या किसी नियम द्वारा शासित होता है जो उपदान के संदाय का प्रावधान करता है।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- उच्चतम न्यायालय ने खंडपीठ के निर्णय में हस्तक्षेप करने से इंकार कर दिया और अपील खारिज कर दी।
- न्यायमूर्ति भट्टी द्वारा लिखित निर्णय में यह टिप्पणी की गई कि उपदान संदाय अधिनियम की धारा 2(ङ) के अंतर्गत अपवर्जन खण्ड स्पष्ट रूप से केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों को इसके दायरे से बाहर रखता है, जिससे यह स्पष्ट हो जाता है कि अपीलकर्त्ता उपदान संदाय अधिनियम के अधीन ग्रेच्युटी का दावा करने के हकदार "कर्मचारी" नहीं थे।
- न्यायालय ने प्रत्यर्थी के इस तर्क का समर्थन किया: "कर्मचारी केंद्रीय सिविल सेवा नियमों का लाभ, केंद्रीय सरकारी कर्मचारी का दर्जा, जबकि ग्रेच्युटी के लिये उपदान संदाय अधिनियम के अधीन लाभ का दावा नहीं कर सकते।"
- अपीलकर्त्ताओं ने म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन ऑफ दिल्ली बनाम धर्म प्रकाश शर्मा (1998) के मामले का हवाला दिया था, जिसमें न्यायालय ने केंद्रीय सिविल सेवा नियमों को अपनाते हुए भी उपदान संदाय अधिनियम के लाभों को बरकरार रखा था। पीठ ने तथ्यों के आधार पर उस मामले को अलग बताया और कहा कि MCD कर्मचारी केंद्र सरकार के कर्मचारी नहीं अपितु एक सांविधिक निगम के कर्मचारी हैं। इसके विपरीत, भारी जल संयंत्र (HWP) कर्मचारी प्रत्यक्षतः सरकारी ढाँचे का भाग हैं।
- न्यायालय ने टिप्पणी की: "संघटन, स्थापना और निरंतरता की परीक्षा करने पर, हम भारी जल संयंत्र (HWP) की प्रकृति को परमाणु ऊर्जा विभाग के एक सहायक अंग के रूप में देखते हैं... इसलिये, कर्मचारी उपदान संदाय अधिनियम की धारा 2(ङ) के अपवर्जन खण्ड के अंतर्गत आते हैं।"
- तदनुसार, अपील खारिज कर दी गई।
उपदान संदाय अधिनियम, 1972 क्या है?
परिचय:
- उपदान संदाय अधिनियम, 1972 एक केंद्रीय विधान है जो कारखानों, खानों, तेल क्षेत्रों, बागानों, बंदरगाहों, रेलवे कंपनियों, दुकानों या अन्य प्रतिष्ठानों में कार्यरत कर्मचारियों को उपदान के संदाय का प्रावधान करता है
- उपदान एकमुश्त संदाय है जो नियोक्ता द्वारा कर्मचारी को निरंतर अवधि में प्रदान की गई सेवाओं के लिये कृतज्ञता के प्रतीक के रूप में किया जाता है।
- एक कर्मचारी पाँच या उससे अधिक वर्षों की निरंतर सेवा पूरी करने पर उपदान (ग्रेच्युटी) के लिये पात्र हो जाता है, और यह त्यागपत्र, सेवानिवृत्ति, मृत्यु या असमर्थता के समय देय होती है।
- इस अधिनियम का उद्देश्य लंबे समय तक सेवा करने के पश्चात् कर्मचारियों को सामाजिक सुरक्षा और वित्तीय सहायता प्रदान करना है।
धारा 2(ङ) के अधीन अपवर्जन के आधार के रूप में उपदान:
- उपदान संदाय अधिनियम, 1972 के अधीन धारा 2(ङ) यह परिभाषित करती है कि अधिनियम के अधीन उपदान का दावा करने के उद्देश्य से कौन "कर्मचारी" के रूप में अर्हता प्राप्त करता है।
- इस परिभाषा में विशेष रूप से ऐसे किसी भी व्यक्ति को सम्मिलित नहीं किया गया है जो केंद्र सरकार या राज्य सरकार के अधीन कोई पद धारण करता है और किसी अन्य अधिनियम या किसी नियम द्वारा शासित होता है जो उपदान के संदाय का प्रावधान करता है।
- यह उपबंध सुनिश्चित करता है कि केंद्र सरकार के वे कर्मचारी जो पहले से ही अपने सेवा नियमों, जैसे कि केंद्रीय सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1972 के अधीन उपदान लाभ प्राप्त कर रहे हैं, उन्हें उपदान संदाय अधिनियम के अधीन उपलब्ध उच्च या भिन्न लाभों का दावा करने की अनुमति नहीं है।
- यह अपवाद विधायी आशय को दर्शाता है कि उपदान संदाय अधिनियम उन कर्मचारियों को बताने के लिये बनाया गया था जिनके पास सेवानिवृत्ति के बाद के लाभों के लिये कोई अन्य सांविधिक सुरक्षा नहीं थी, न कि उन लोगों के लिये जो पहले से ही एक व्यापक सरकारी योजना के अंतर्गत आते थे।
केंद्रीय सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1972
- केंद्रीय सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1972 1 जून 1972 को लागू हुए और इन्हें भारत के संविधान के अनुच्छेद 309 के अधीन बनाया गया है।
- ये नियम 31 दिसंबर 2003 को या उससे पहले नियुक्त सरकारी कर्मचारियों पर लागू होते हैं, जिनमें रक्षा सेवाओं में स्थायी रूप से नियुक्त सिविल सरकारी कर्मचारी और संघ के मामलों से संबंधित पद शामिल हैं, जो पेंशन योग्य प्रतिष्ठानों के अंतर्गत आते हैं।
- ये नियम केंद्र सरकार के कर्मचारियों के लिये अधिवर्षिता पेंशन, सेवानिवृत्ति पेंशन, विकलांगता पेंशन, पारिवारिक पेंशन और उपदान को नियंत्रित करने वाला एक व्यापक ढाँचा प्रदान करते हैं, जिससे उनके सेवानिवृत्ति लाभ इस योजना के अंतर्गत पूरी तरह से समाहित हो जाते हैं।
- 2025 में, वित्त विधेयक के भाग के रूप में एक सत्यापन विधान पारित किया गया था, जिसमें यह पुष्टि की गई थी कि संविधान के अनुच्छेद 309 के अधीन केंद्रीय सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1972 के लिये बनाए गए सभी नियम - जिनमें इसके अधीन जारी किये गए सभी निदेश शामिल हैं - 1 जून 1972 से प्रभावी रूप से मान्य हैं।