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आपराधिक कानून

समानता का सिद्धांत

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 17-Feb-2026

बालमुकुंद सिंह गौतम बनाम मध्य प्रदेश राज्य एवं अन्य 

"जो अभियुक्त जानबूझकर विचारण से पलायन करता हुआ फरार रहता हैवह केवल इस आधार पर कि किसी सह-अभियुक्त को विचारण में दोषमुक्त कर दिया गया हैसमानता के सिद्धांत का सहारा लेकर अग्रिम जमानत की मांग नहीं कर सकता।" 

न्यायमूर्ति जे.बी. परदीवाला और विजय बिश्नोई 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

बालमुकुंद सिंह गौतम बनाम मध्य प्रदेश राज्य और अन्य (2026) केमामले में न्यायमूर्ति जे.बी. परदीवाला और विजय बिश्नोई की पीठ नेनिर्णय दिया कि फरार अभियुक्त केवल इसलिये अग्रिम जमानत मांगने के लिये समानता के सिद्धांत का सहारा नहीं ले सकता क्योंकि सह-अभियुक्तों को विचारण में दोषमुक्त कर दिया गया है। 

बलमुकुंद सिंह गौतम बनाम मध्य प्रदेश राज्य और अन्य (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • परिवादकर्त्ता मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ के उस आदेश से व्यथित था जिसमें प्रत्यर्थी संख्या 2-अभियुक्त को अग्रिम जमानत दी गई थीजिसे फरार घोषित किया गया था। 
  • उच्च न्यायालय ने अग्रिम जमानत केवल इसलिये दी क्योंकि संबंधित प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) में सह-अभियुक्तों को विचारण न्यायालय ने दोषमुक्त कर दिया था। 
  • अभियुक्त लगभग छह वर्ष तक अन्वेषण और विचारण से फरार रहा था। 
  • अभियुक्त ने घायल पीड़ित शैलेंद्र उर्फ ​​पिंटू कोजो इस प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) में प्रत्यक्षदर्शी भी हैउसकी जमानत याचिका का विरोध करने पर जान से मारने की धमकी दी थी। 
  • अभियुक्त के विरुद्ध साक्षी को धमकाने के आरोप में प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) संख्या 272/2019 दिनांक 10.05.2019 को दर्ज की गई थी। 
  • अभियुक्त की अग्रिम जमानत याचिका पहले ही नामंजूर हो चुकी थीं। 
  • परिवादकर्त्ता ने उच्च न्यायालय के आदेश को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी और तर्क दिया किफरार अभियुक्त द्वारा समानता का दावा नहीं किया जा सकता है। 
  • परिवादकर्त्ता ने तर्क दिया कि सह-अभियुक्त व्यक्ति की दोषमुक्त होने का निर्णय उनसे संबंधित विशिष्ट साक्ष्यों पर आधारित था और इसका फरार अभियुक्त से कोई संबंध नहीं था। 
  • राज्य (प्रत्यर्थी संख्या 1) ने परिवादकर्त्ता की अपील का समर्थन कियातथापि उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध अपील न करने के उनके निर्णय पर प्रश्न उठाया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • न्यायालय ने टिप्पणी की किसमानता के सिद्धांत का हवाला उस फरार अभियुक्त द्वारा नहीं दिया जा सकता हैजो जानबूझकर विचारण से बचने के लिये केवल इसलिये अग्रिम जमानत की मांग करता है क्योंकि उसके एक सह-अभियुक्त को दोषमुक्त कर दिया गया है। 
  • न्यायालय ने कहा, "फरार अभियुक्त को अग्रिम जमानत देना एक दोषपूर्ण और अनुचित पूर्व निर्णय स्थापित करता है और यह संदेश देता है कि विचारण का सामना करने वाले विधि का पालन करने वाले सह-अभियुक्तों का विचारण की प्रक्रिया में लगन से उपस्थित होना गलत थाऔर इसके अतिरिक्तयह लोगों को विधि की प्रक्रिया से बेखौफ होकर बचने के लिये प्रोत्साहित करता है।" 
  • न्यायालय ने पाया कि अभियुक्त द्वारा उठाया गया यह आधार कि अन्य सह-अभियुक्तों को दोषमुक्त कर दिया गया था,"स्वयं ही उसे समानता के आधार पर अग्रिम जमानत के अनुतोष का हकदार नहीं बनाता हैविशेषत: तब जब अभियुक्त स्वयं न्यायालय के साथ सहयोग करने में विफल रहा और फरार होकर अन्य सह-अभियुक्तों के विचारण में विलंब किया।" 
  • उच्च न्यायालय द्वारा केवल ठोस साक्ष्यों के अभाव और सह-अभियुक्तों के दोषमुक्त होने के आधार पर अग्रिम जमानत देने के तर्क को उच्चतम न्यायालय ने त्रुटिपूर्ण करार दिया। 
  • न्यायालय ने पाया कि उच्च न्यायालय इस बात पर विचार करने में विफल रहा कि विचारण न्यायालय द्वारा फरार अभियुक्त के विरुद्ध या उसके पक्ष में अभिलिखित किया गया कोई भी निर्णय जमानत आवेदन पर निर्णय लेने के लिये पूरी तरह से अप्रासंगिक हैक्योंकि सह-अभियुक्तों के विचारण के दौरान अभियोजन पक्ष को फरार अभियुक्त के विरुद्ध कोई सबूत पेश करने की आवश्यकता नहीं थी। 
  • न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि अभियुक्त लगभग वर्षों से फरार था और उसने न्यायिक प्रक्रिया का मजाक उड़ाया था। 
  • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यद्यपि सामान्य नियम के अनुसार फरार अभियुक्त अग्रिम जमानत का हकदार नहीं होता हैलेकिन असाधारण मामलों में जहाँ प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR), केस डायरी और अन्य प्रासंगिक सामग्रियों की जांच करने पर न्यायालय की प्रथम दृष्टया यह राय हो कि फरार अभियुक्त के विरुद्ध कोई मामला नहीं बनता हैतो अग्रिम जमानत देने की शक्ति का प्रयोग किया जा सकता है। 
  • न्यायालय ने माना कि उच्च न्यायालय ने अग्रिम जमानत देने के लिये अपने विवेक का सही ढंग से प्रयोग नहीं किया था क्योंकि यह इस प्रकार के अनुतोष के लिये उपयुक्त मामला नहीं था। 
  • अपील मंजूर कर ली गई और अभियुक्त को निर्णय की तारीख से चार सप्ताह के भीतर संबंधित न्यायालय के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निदेश दिया गया। 

समानता का सिद्धांत क्या है? 

अर्थ एवं परिभाषा: 

  • समानता के सिद्धांत का अर्थ है कि दण्ड "समान परिस्थितियों में अधिरोपित किये गए समान अपराधों के लिये समान अपराधियों को दिये गए दण्ड के समान" होना चाहिये 
  • दण्ड निर्धारण की प्रक्रिया स्वभावतः व्यक्तिपरक होते हुए भीप्रत्येक दण्डादेश को समानता के सिद्धांत का सम्मान करना चाहिये 
  • समान अथवा मिलते-जुलते अपराधों के लिये दोषसिद्ध व्यक्तियों को परस्पर अत्यधिक भिन्न दण्ड नहीं दिया जाना चाहिये 
  • दण्ड लगभग एक समान होना चाहियेजिसमें व्यक्ति विशेष से संबंधित गंभीर और हल्के कारकों को ध्यान में रखा जाए। 
  • समानता का अर्थ एकरूपता नहीं है और इससे आनुपातिकता की आवश्यकता पर ध्यान कम नहीं होना चाहिये 

उद्देश्य: 

  • समानता के सिद्धांत का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जिन दोषसिद्ध व्यक्तियों के विरुद्ध मूलतः समान तथ्य एवं परिस्थितियाँ विद्यमान होंउनके बीच असंगत या असमान दण्डादेश न दिए जाएँजिससे न्यायसंगतता बनी रहे 
  • यह सिद्धांत दण्ड निर्धारण में व्यक्तिगत दृष्टिकोण को रद्द नहीं करता है। 
  • इसका उद्देश्य दण्डादेश को पूर्णतः समान बनाना नहींअपितु न्यायसंगतता एवं समरूपता को बढ़ावा देना है 

जमानत मामलों में समानता 

  • जमानत के मामलों मेंसमानता के सिद्धांत का सहारा तब लिया जाता है जब किसी सह-अभियुक्त को जमानत दी जा चुकी हो और अभियुक्त समान स्थिति में होने के आधार पर समान अनुतोष की मांग करता हो। 
  • इस सिद्धांत के अधीन अभियुक्त इस आधार पर जमानत का दावा कर सकता है कि उसी प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) में उसके सह-अभियुक्त को जमानत मिल गई है या उसे दोषमुक्त कर दिया गया है। 

जमानत में समानता की परिसीमाएँ: 

  • समानता को पूर्ण अधिकार के रूप में दावा नहीं किया जा सकताइसका मूल्यांकन व्यक्तिगत परिस्थितियों के आलोक में किया जाना चाहिये 
  • फरार अभियुक्त केवल इसलिये अग्रिम जमानत मांगने के लिये समानता के सिद्धांत का हवाला नहीं दे सकता क्योंकि उसके सह-अभियुक्तों को दोषमुक्त कर दिया गया है। 
  • सह-अभियुक्तों की दोषमुक्त होने का निर्णय उनके विचारण से संबंधित विशिष्ट साक्ष्यों पर आधारित है और इससे स्वतः ही उस फरार अभियुक्त को लाभ नहीं मिलता जिसने पूरे विचारण की प्रक्रिया से बचने की कोशिश की हो। 
  • सह-अभियुक्त के विचारण के दौरान विचारण न्यायालय द्वारा फरार अभियुक्त के पक्ष या विपक्ष में अभिलिखित किये गए कोई भी निष्कर्ष फरार अभियुक्त की जमानत याचिका पर निर्णय लेने के लिये पूरी तरह से अप्रासंगिक हैं। 
  • समानता के आधार पर फरार अभियुक्त को अग्रिम जमानत देना एक दोषपूर्ण और अनुचित पूर्व निर्णय स्थापित करता है और न्यायिक प्रक्रिया से बचने के लिये प्रोत्साहन देता है।