आज ही हमारे ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स में एडमिशन लें और अपनी तैयारी को और बेहतर बनाएँ | हिंदी माध्यम बैच: 9 मार्च, सुबह 8 बजे   |   आज ही एडमिशन लें बिहार APO (प्रिलिम्स + मेन्स) कोर्स में और अपने सपनों को दे नई दिशा | ऑफलाइन एवं ऑनलाइन मोड में उपलब्ध | 12 जनवरी 2026  से कक्षाएँ आरंभ   |   एडमिशन ओपन: UP APO प्रिलिम्स + मेंस कोर्स 2025, बैच 6th October से   |   ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स (प्रयागराज)   |   अपनी सीट आज ही कन्फर्म करें - UP APO प्रिलिम्स कोर्स 2025, बैच 6th October से










होम / करेंट अफेयर्स

सांविधानिक विधि

यदि अवैधता साबित हो जाए तो विवादित तथ्य रिट याचिका में बाधा नहीं बनते

    «    »
 20-Feb-2026

डॉ. पोश चरक और अन्य बनाम जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश 

"अनुच्छेद 226 के अधीन रिटअधिकारिता को केवल "विवादित तथ्यों" की तकनीकी दलील उठाकर नकारा नहीं जा सकताजबकि अभिलेख स्वयं विधिविरुद्ध राज्य कार्रवाई को उजागर करता है ।" 

न्यायमूर्ति रजनेश ओसवाल 

स्रोत: जम्मू और कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति रजनेश ओसवाल ने डॉपोश चरक और अन्य बनाम जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश (2026)के मामले में यह निर्णय दिया कि अनुच्छेद 226 के अधीन रिट अधिकारिता को केवल "विवादित तथ्यों" का हवाला देकर नकारा नहीं जा सकताजबकि राज्य के अपने आधिकारिक अभिलेख और स्वीकृतियाँ ही अवैधता को स्थापित करती हैं। 

डॉ. पोश चरक और अन्य बनाम जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • यह रिट याचिका दिवंगत ठाकुर लक्ष्मण सिंह चरक के विधिक वारिस डॉ. पोश चरक और अन्य लोगों द्वारा दायर की गई थीजिसमें उनकी पैतृक भूमि की बहाली या वैध अधिग्रहण की मांग की गई थी। 
  • याचिकाकर्त्ताओं के पूर्वज उस भूमि के रजिस्ट्रीकृत स्वामी और कृषक थे। 1983 में उनकी मृत्यु के पश्चात्भूमि विधिवत रूप से उनके वैधानिक उत्तराधिकारियों को हस्तांतरित हो गई। 
  • बिना किसी अधिग्रहण कार्यवाहीपंचाट या प्रतिकर के संदाय केयह भूमि राज्य की संस्थाओं - SICOP/SIDCO - के भौतिक कब्जे में आ गईजिन्होंने निजी भूमि पर एक सड़क का निर्माण भी कर दिया। 
  • जमाबंदी और खसरा गिरदावरी (2018-2024) सहित राजस्व अभिलेखों में याचिकाकर्त्ताओं के स्वामित्व और खेती को निरंतर दर्शाया गया हैजिसमें SICOP या SIDCO के पक्ष में कोई प्रविष्टि नहीं है।  
  • बीरपुर भूमि घोटाले के सिलसिले में अधिग्रहण किये जाने के कारण याचिकाकर्त्ता वर्षों से अपने राजस्व अभिलेखों तक पहुँच प्राप्त करने में असमर्थ थे। 
  • 2021 मेंराजस्व अधिकारियों द्वारा किये गए सीमांकन के बादयह चौंकाने वाली सच्चाई सामने आई कि याचिकाकर्त्ताओं की भूमि पर SICOP का अनाधिकृत कब्जा था।   
  • SICOP की ओर से प्राप्त RTI के बाद के जवाब निर्णायक साबित हुए - SICOP ने कब्जे की बात तो स्वीकार कीलेकिन अधिग्रहण पंचाट या संदाय किये गए प्रतिकर के किसी भी सबूत का प्रकटीकरण करने में असफल रहा। 
  • बारी ब्राह्मणा के तहसीलदार ने स्पष्ट रूप से पुष्टि की कि राजस्व पुस्तकों में SICOP या SIDCO का कोई अधिकारस्वामित्व या हित अभिलिखित नहीं है। 
  • वरिष्ठ अधिवक्ता श्री अजय शर्मा ने श्री नवनीद नाइक और श्री अर्जुन भारती के साथ मिलकर यह तर्क दिया कि अधिग्रहण के बिना निजी भूमि पर निरंतर कब्जा संविधान के अनुच्छेद 300-क का प्रत्यक्ष उल्लंघन है और विलंब और असावधानी किसी चल रहे सांविधानिक अपराध को वैध नहीं ठहरा सकती। 
  • राज्य की ओर से सुश्री मोनिका कोहली (वरिष्ठ AAG) और श्री रविंदर गुप्ता (AAG) ने याचिका का विलंबअसावधानी और तथ्यों के विवादित प्रश्नों के आधार पर विरोध किया और दावा किया कि भूमि दशकों पहले औद्योगिक उद्देश्यों के लिये अंतरित की गई थी।  

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • न्यायालय ने यह माना कि जब राज्य के स्वयं के अभिलेख अवैधता की पुष्टि करते हैंतो मामला विवादित तथ्यात्मक विवाद नहीं रह जाता है और पूरी तरह सेसांविधानिक प्रवर्तन का मामला बन जाता हैन कि केवल तथ्यात्मक निर्णय का। 
  • न्यायमूर्ति रजनेश ओसवाल ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 226 के अधीन रिट अधिकारिता में विवादित तथ्यों का न्यायनिर्णय करने के विरुद्ध सिद्धांत केवल तभी लागू होता है जब तथ्यों को वास्तव में विद्यमान सामग्री के आधार पर हल नहीं किया जा सकता है - न कि जहाँ आधिकारिक स्वीकृति और सीमांकन रिपोर्ट सभी अस्पष्टता को दूर कर देती हैं। 
  • न्यायालय ने राज्य की विलंब और असावधानी की दलील को खारिज कर दिया और दृढ़ता से निर्णय दिया कि संपत्ति के अधिकारों के विधिविरुद्ध हनन को उचित ठहराने के लिये इस सिद्धांत का सहारा नहीं लिया जा सकता है।  
  • उच्चतम न्यायालय के कई निर्णयों पर विश्वास करते हुएन्यायालय ने दोहराया कि संपत्ति का अधिकारयद्यपि अब मौलिक अधिकार नहीं हैफिर भी एक सांविधानिक और मानवाधिकार बना हुआ है जो पूर्ण न्यायिक संरक्षण का हकदार है। 
  • न्यायालय ने सलाह दी कि केवल विलंब के आधार पर याचिका को खारिज करना राज्य की अवैधताओं को क्षमा करने के समान होगाजिसकी अनुमति सांविधानिक अधिकारिता वाले किसी भी न्यायालय को नहीं देनी चाहिये 
  • उच्च न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि SICOP और SIDCO द्वारा याचिकाकर्त्ताओं की भूमि पर कब्जा करना अतिक्रमण से कम नहीं थाऔर राज्य प्रशासनिक बल या नौकरशाही की निष्क्रियता के माध्यम से निजी संपत्ति को जब्त नहीं कर सकता है। 
  • न्यायालय ने SICOP और SIDCO सहित प्रत्यर्थियों को निदेश दिया कि वे या तो तीन महीने के भीतर याचिकाकर्त्ताओं को भूमि का कब्जा वापस सौंप देंया उसी अवधि के भीतर उचित प्रतिकर और भूमि अधिग्रहणपुनर्वास और पुनर्स्थापन में पारदर्शिता के अधिकार अधिनियम, 2013 के अधीन अधिग्रहण की कार्यवाही शुरू करें। 

भारत के संविधान का अनुच्छेद 226 क्या है? 

बारे में: 

  • अनुच्छेद 226 संविधान के भाग के अंतर्गत निहित हैजो उच्च न्यायालय को रिट जारी करने की शक्ति प्रदान करता है। 
  • भारत के संविधान के अनुच्छेद 226(1) में कहा गया है कि प्रत्येक उच्च न्यायालय को उन राज्यक्षेत्रों में सर्वत्रजिनके संबंध में वह अपनी अधिकारिता का प्रयोग करता है,भाग द्वारा प्रदत्त अधिकारों में से किसी को प्रवर्तित कराने के लिये और किसी अन्य प्रयोजन के लिये उन राज्यक्षेत्रों के भीतर किसी व्यक्ति या प्राधिकारी को या समुचित मामलों में किसी सरकार को ऐसे निदेशआदेश या रिट जिनके अंतर्गत बंदी प्रत्यक्षीकरणपरमादेशप्रतिषेधअधिकार-पृच्छा और उत्प्रेषण रिट हैंया उनमें से कोई निकालने की शक्ति होगी। 
  • अनुच्छेद 226(2) में कहा गया है कि उच्च न्यायालय को किसी भी व्यक्तिसरकार या प्राधिकारी को रिट या आदेश जारी करने का अधिकार है। 
    • जो इसके अधिकारिता के भीतर स्थित या 
    • यदि वादहेतुक पूर्णतः या भागतः उत्पन्न होता हैअधिकारिता का प्रयोग करने वाले किसी उच्च न्यायालय द्वारा भीइस बात के होते हुए भी किया जा सकेगा कि ऐसी सरकार या प्राधिकारी का स्थान या ऐसे व्यक्ति का निवास-स्थान उन राज्यक्षेत्रों के भीतर नहीं है। 
  • अनुच्छेद 226(3) में कहा गया है कि जब किसी पक्षकार के विरुद्ध उच्च न्यायालय द्वारा व्यादेशस्थगन या अन्य माध्यमों से अंतरिम आदेश पारित किया जाता हैतो वह पक्ष न्यायालय में ऐसे आदेश को रद्द करने के लिये आवेदन कर सकता है और न्यायालय द्वारा ऐसे आवेदन का निपटारा दो सप्ताह की अवधि के भीतर किया जाना चाहिये 
  • अनुच्छेद 226(4) कहता है कि इस अनुच्छेद द्वारा उच्च न्यायालय को दी गई शक्ति अनुच्छेद 32 के खण्ड (2) द्वारा उच्चतम न्यायालय को दी गई शक्ति को कम नहीं करेगी। 
  • यह अनुच्छेद सरकार सहित किसी भी व्यक्ति या प्राधिकारी के विरुद्ध जारी किया जा सकता है। 
  • यह मात्र एक सांविधानिक अधिकार हैमौलिक अधिकार नहींऔर आपातकाल के दौरान भी इसे निलंबित नहीं किया जा सकता है। 
  • अनुच्छेद 226 मौलिक अधिकारों के मामले में अनिवार्य प्रकृति का है और जब इसे "किसी अन्य प्रयोजन" के लिये जारी किया जाता है तो विवेकाधीन प्रकृति का होता है। 
  • यह न केवल मौलिक अधिकारों को अपितु अन्य विधिक अधिकारों को भी लागू करता है। 

अनुच्छेद 226 के अधीन उपलब्ध रिट याचिकाएँ: 

  • बंदीप्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका:  
    • यह एक लैटिन वाक्यांश है जिसका अर्थ है शरीर प्रस्तुत करो” अथवा “व्यक्ति को न्यायालय के समक्ष उपस्थित करो 
    • यह सबसे अधिक प्रयोग किये जाने वाली याचिका है। 
    • जब किसी व्यक्ति को सरकार द्वारा सदोष रूप से निरोध में लिया जाता हैतो वह व्यक्तिया उसका परिवार या मित्रउस व्यक्ति को छोड़ने के लिये बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर कर सकते हैं। 
  • परमादेश (Mandamus) याचिका: 
    • यह एक लैटिन वाक्यांश है जिसका अनुवाद 'हम आदेश देते हैंहोता है। 
    • परमादेश एक न्यायिक आदेश है जो सभी लोक अधिकारियों को लोक कर्त्तव्य निर्वहन हेतु किया जाता है। 
    • इसका प्रयोग सांविधानिकसांविधिकअसांविधिकविश्वविद्यालयोंन्यायालयों और अन्य निकायों द्वारा लोक कर्त्तव्यों के निष्पादन के लिये किया जाता है। 
    • इस रिट का प्रयोग करने की एकमात्र शर्त यह है कि लोक कर्त्तव्य होना चाहिये।  
  • उत्प्रेषण (Certiorari) याचिका: 
    • यह एक लैटिन वाक्यांश है जिसका अर्थ है'सूचित होना'। 
    • यह उच्च न्यायालय द्वारा अधीनस्थ न्यायालय को जारी किया गया एक आदेश या निदेश है। 
    • यह तब जारी की जाती है जब अधीनस्थ न्यायालय प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन करते हैं। 
    • यदि उच्च न्यायालय को अधीनस्थ न्यायालय द्वारा दिये गए आदेश में कोई त्रुटि मिलती हैतो वह उसे रद्द कर सकता है। 
  • प्रतिषेध (Prohibition) याचिका: 
    • इसका शाब्दिक अर्थ है — “रोकना” 
    • यह रिट उच्च न्यायालय द्वारा अधीनस्थ न्यायालयोंअधिकरणों अथवा अर्ध-न्यायिक निकायों के विरुद्ध तब जारी की जाती हैजब वे अपनी अधिकारिता से परे कार्य कर रहे हों या विधि-विरुद्ध कार्यवाही कर रहे हों 
  • अधिकार-पृच्छा (Quo Warranto) याचिका: 
    • अधिकार-पृच्छा शब्द का अर्थ है 'किस अधिकार से'। 
    • यह किसी निजी व्यक्ति के विरुद्ध उस अधिकार के अधीन जारी की जाती है जिसके अधीन वह ऐसे पद पर आसीन है जिस पर उसे कोई अधिकार नहीं है। 
    • इस रिट के माध्यम से न्यायालय लोक अधिकारियों की नियुक्ति को नियंत्रित कर सकता है और किसी नागरिक को उस लोक पद से वंचित होने से बचा सकता है जिसका वह हकदार हो सकता है। 

विधिक निर्णय: 

  • बंधुआ मुक्ति मोर्चा बनाम भारत संघ (1984) केमामले मेंउच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि अनुच्छेद 226 का दायरा अनुच्छेद 32 की तुलना में कहीं अधिक व्यापक है क्योंकि अनुच्छेद 226 को विधिक अधिकारों की रक्षा के लिये भी जारी किया जा सकता है। 
  • कॉमन कॉज बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2018) के मामलेमें, उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि लोक प्राधिकारियों द्वारा लोक उत्तरदायित्त्व के प्रवर्तन के लिये अनुच्छेद 226 के अधीन रिट भी जारी की जा सकती है।