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आपराधिक कानून
दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 319 के अधीन अभियुक्तों के लिये जमानत प्रदान करने की परीक्षा का समावेशन
« »09-Jan-2026
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एम.डी. इमरान उर्फ डी.सी. गुड्डू बनाम झारखंड राज्य "न्यायालय ने विचारण के बीच में अतिरिक्त अभियुक्त के रूप में सम्मिलित किये गए व्यक्ति को जमानत देने के लिये एक नियम निर्धारित किया, जिसमें कहा गया है कि जमानत तब तक अस्वीकार नहीं की जानी चाहिये जब तक कि गंभीर संलिप्तता दर्शाने वाले मजबूत और ठोस साक्ष्य न हों।" न्यायमूर्ति जे.बी. परदीवाला और के.वी. विश्वनाथन |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
न्यायमूर्ति जे.बी. परदीवाला और केवी विश्वनाथन की पीठ ने एम.डी. इमरान उर्फ डी.सी. गुड्डू बनाम झारखंड राज्य (2025) के मामले में झारखंड उच्च न्यायालय के उस निर्णय को अपास्त कर दिया, जिसमें अपीलकर्त्ता को जमानत देने से इंकार कर दिया गया था, जिसे विचारण के बीच में दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 319 (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की 358) के अधीन अभियुक्त के रूप में जोड़ा गया था।
- न्यायालय ने विचारण के बीच में अतिरिक्त अभियुक्त के रूप में सम्मिलित किये गए व्यक्ति को जमानत देने के लिये एक नियम निर्धारित किया, जिसमें कहा गया है कि जमानत से इंकार तब तक नहीं किया जाना चाहिये जब तक कि गंभीर संलिप्तता दर्शाने वाले मजबूत और ठोस साक्ष्य न हों।
एम.डी. इमरान उर्फ डी.सी. गुड्डू बनाम झारखंड राज्य (2025) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- यह मामला हत्या की एक प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) से शुरू हुआ जिसमें नौ लोगों को अभियुक्त बनाया गया था।
- पुलिस ने केवल तीन अभियुक्त के विरुद्ध आरोपपत्र दाखिल किया और शेष छह व्यक्तियों के विरुद्ध मामला बंद कर दिया।
- विचारण के दौरान, अभियोजन पक्ष के साक्षियों ने अपने परिसाक्ष्य में सभी नौ अभियुक्त के नाम लिये।
- 2022 में, उन छह अभियुक्त को समन करने के लिये दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 319 के अधीन एक आवेदन दायर किया गया था जिनके विरुद्ध मामला बंद कर दिया गया था।
- विचारण न्यायालय ने आवेदन को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया और अपीलकर्त्ता सहित तीन हटाए गए अभियुक्त को समन किया।
- अपीलकर्त्ता को अजमानतीय वारण्ट पर गिरफ्तार किया गया था और वह रिमांड में रहा।
- झारखंड उच्च न्यायालय ने अपीलकर्त्ता की जमानत याचिका खारिज कर दी।
- अन्य दो नए समन किये गए अभियुक्त को उच्च न्यायालय द्वारा अग्रिम जमानत दे दी गई।
- उच्चतम न्यायालय में दो अपीलें दायर की गईं - एक अपीलकर्त्ता द्वारा जमानत की नामंजूरी के विरुद्ध और दूसरी राज्य द्वारा अन्य सह-अभियुक्त को अग्रिम जमानत दिये जाने के विरुद्ध।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- न्यायालय ने टिप्पणी की कि जब किसी व्यक्ति को दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 319 के अधीन अभियुक्त के रूप में जोड़ा जाता है और उसे गिरफ्तार किया जाता है, तो जमानत तय करते समय सुसंगत विचारणीय तथ्य संभाव्य और ठोस साक्ष्य की उपस्थिति होनी चाहिये, न कि केवल संलिप्तता की संभावना।
- पीठ ने इस बात पर बल दिया कि जमानत तब तक नहीं खारिज की जानी चाहिये जब तक कि गंभीर संलिप्तता को दर्शाने वाले मजबूत और ठोस साक्ष्य न हों।
- न्यायालय ने दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 319 के अधीन समन किये गए अभियुक्त से जुड़े मामलों में जमानत पर विचार करने के लिये एक संरचित त्रिस्तरीय दृष्टिकोण निर्धारित किया :
- साक्ष्य से केवल प्रथम दृष्टया मामला साबित होने से कहीं अधिक जानकारी मिलनी चाहिये, जो सामान्यत: आरोप विरचित करने के लिये पर्याप्त होता है।
- साथ ही, यह आवश्यक नहीं है कि यह संतुष्टि की उस उच्च सीमा को पूरा करे कि यदि साक्ष्य का खंडन नहीं किया जाता है, तो वह अनिवार्य रूप से दोषसिद्धि की ओर ले जाएगा।
- अभियुक्त की संलिप्तता को दर्शाने वाले मजबूत और ठोस साक्ष्य होने चाहिये, जो निरंतर अभिरक्षा को उचित ठहराते हों।
- न्यायालय ने कहा कि यह परीक्षा प्रथम दृष्टया मामले से कहीं अधिक है, जैसा कि आरोप विरचित करते समय किया गया था, लेकिन इस हद तक संतुष्टि से कम है कि यदि साक्ष्य का खंडन नहीं किया जाता है, तो दोषसिद्धि हो जाएगी।
- न्यायालय ने निदेश दिया कि अपराध की प्रकृति, नए अभियुक्त के विरुद्ध साक्ष्य की गुणवत्ता और व्यक्ति के फरार होने या साक्ष्य के साथ छेड़छाड़ करने की संभावना जैसे कारकों पर विचार किया जाना चाहिये।
- पीठ ने पाया कि धारा 319 के अधीन अभियुक्त को जमानत देने से इंकार करने के लिये आवश्यक उच्च मानदंड वर्तमान मामले में पूरा नहीं हुआ था।
- न्यायालय ने समानता के सिद्धांत को लागू करते हुए यह पाया कि अन्य सह-अभियुक्त पहले से ही जमानत पर बाहर थे, जो अपीलकर्त्ता के पक्ष में एक महत्त्वपूर्ण कारक था।
- अपील स्वीकार कर ली गई और अपीलकर्त्ता को जमानत पर रिहा करने का निदेश दिया गया।
- अन्य सह-अभियुक्त को अग्रिम जमानत दिये जाने के विरुद्ध राज्य की अपील खारिज कर दी गई।
दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 319 (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 358) क्या है?
- यह उपबंध उन अन्य व्यक्तियों के विरुद्ध कार्यवाही करने का अधिकार प्रदान करता है जो किसी अपराध के दोषी प्रतीत होते हैं।
- यह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 358 में निहित है।
- यह सिद्धांत judex damantur cum nocens absolvitur पर आधारित है , जिसका अर्थ है, जब दोषी को बरी कर दिया जाता है, तब न्यायाधीश दोषी ठहराया जाता है। इस धारा में कहा गया है कि-
- यदि किसी अपराध की जांच या विच्चारण के दौरान साक्ष्यों से यह प्रतीत होता है कि किसी अन्य व्यक्ति ने, जो अभियुक्त नहीं है, कोई ऐसा अपराध किया है जिसके लिये उस व्यक्ति पर अभियुक्त के साथ विचारण चलाया जा सकता है, तो न्यायालय उस व्यक्ति के विरुद्ध उस अपराध के लिये कार्यवाही कर सकता है जो उसने किया प्रतीत होता है।
- यदि ऐसा व्यक्ति न्यायालय में उपस्थित नहीं होता है, तो उसे मामले की परिस्थितियों के अनुसार उपर्युक्त प्रयोजन के लिये गिरफ्तार किया जा सकता है या समन किया जा सकता है।
- न्यायालय में उपस्थित होने वाले किसी भी व्यक्ति को, भले ही वह गिरफ्तार न हो या समन पर उपस्थित न हो, उस अपराध की जांच या विचारण के उद्देश्य से न्यायालय द्वारा निरुद्ध किया जा सकता है, जिसे उसने कथित तौर पर किया हो।
- जहाँ न्यायालय उपधारा (1) के अंतर्गत किसी व्यक्ति के विरुद्ध कार्यवाही करता है, तब—
- उस व्यक्ति के संबंध में कार्यवाही नए सिरे से प्रारंभ की जाएगी और साक्षियों की पुनः सुनवाई की जाएगी;
- खंड (क) के उपबंधों के रहते हुए, मामला इस प्रकार आगे बढ़ेगा मानो वह व्यक्ति उसी समय से अभियुक्त था, जब न्यायालय ने उस अपराध का संज्ञान लिया था, जिसके संबंध में जांच या विचारण प्रारंभ हुआ था।
- धारा 319 के आवश्यक तत्त्व:
- किसी अपराध की कोई भी जांच या विचारण न्यायालय के समक्ष लंबित हो।
- साक्ष्यों से यह प्रतीत होता है कि किसी भी व्यक्ति ने, जो अभियुक्त नहीं है, कोई ऐसा अपराध किया है जिसके लिये अभियुक्त के साथ संयुक्त रूप से विचारण चलाया जाना चाहिये।