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सिविल कानून
वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के अंतर्गत भरण-पोषण अधिकरण की अधिकारिता
«19-Feb-2026
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पुष्पा शर्मा बनाम पश्चिम बंगाल राज्य और अन्य "धारा 4 और 5 में केवल भरणपोषण प्रदान करने का उपबंध है। इसमें निष्कासन का कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष उल्लेख नहीं है। अधिकरण ऐसे आवेदन पर निष्कासन का आदेश पारित नहीं कर सकता ।" न्यायमूर्ति कृष्णा राव |
स्रोत: कलकत्ता उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
पुष्पा शर्मा बनाम पश्चिम बंगाल राज्य और अन्य (2026) मामले में कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति कृष्णा राव ने निर्णय दिया कि माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरणपोषण तथा कल्याण अधिनियम, 2007 के अंतर्गत गठित भरणपोषण अधिकरण को अधिनियम की धारा 4 और 5 के अधीन कार्यवाही में बच्चों को संपत्ति से निष्कासित करने का निदेश देने की कोई अधिकारिता नहीं है। न्यायालय ने भरण-पोषण अधिकरण के रूप में कार्य कर रहे उप-विभागीय अधिकारी के आदेशों में आंशिक संशोधन करते हुए, निष्कासन के निदेश को अपास्त कर दिया, जबकि भरणपोषण प्रावधान को बरकरार रखा।
पुष्पा शर्मा बनाम पश्चिम बंगाल राज्य और अन्य (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- पश्चिम बंगाल के पश्चिम मेदिनीपुर में एक तीन मंजिला आवासीय मकान पर कब्जे को लेकर बुजुर्ग माता पुष्पा शर्मा और उनके दो पुत्रों के बीच विवाद उत्पन्न हुआ।
- अपने पति की मृत्यु के बाद, माता ने अभिकथित किया कि उसके पुत्रों ने उसे घर से निकाल दिया और उसे आर्थिक सहायता प्रदान करने में असफल रहे।
- उसने भरण-पोषण अधिकरण से ₹30,000 के मासिक भरण-पोषण और चिकित्सा खर्चों की प्रतिपूर्ति की मांग की।
- 6 सितंबर और 6 दिसंबर, 2024 के आदेशों द्वारा, उप-विभागीय अधिकारी (भरणपोषण अधिकरण के रूप में कार्य करते हुए) ने पुत्रों को मासिक भरणपोषण का संदाय करने का निदेश दिया और उन्हें तीन महीने के भीतर परिसर खाली करने का भी आदेश दिया।
- पुत्रों में से एक ने कलकत्ता उच्च न्यायालय में निष्कासन के निदेश को चुनौती दी, जबकि माता ने साथ ही निष्कासन के आदेश को लागू कराने की मांग की।
- न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि भरण-पोषण अधिकरण के आदेश संविधान के अनुच्छेद 226 के अधीन चुनौती के योग्य हैं, क्योंकि अधिकरण अर्ध-न्यायिक कार्यों का निर्वहन करता है।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- न्यायालय ने माना कि 2007 अधिनियम का अध्याय 2 माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरणपोषण से संबंधित है और अधिकरण को केवल मासिक भत्ते निर्धारित करने और प्रदान करने का अधिकार देता है।
- इसमें पाया गया कि धारा 4 और 5 में निष्कासन का कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संदर्भ नहीं है, और इसलिये अधिकरण निष्कासन आदेश पारित करने के लिये सांविधिक जनादेश से आगे नहीं जा सकता है।
- न्यायालय ने कहा कि अधिनियम में त्वरित और कम खर्चीला भरणपोषण अनुतोष सुनिश्चित करने के लिये एक संक्षिप्त तंत्र निर्धारित किया गया है और इसका उद्देश्य संपत्ति विवादों में सिविल उपचारों के विकल्प के रूप में कार्य करना कभी नहीं था।
- तदनुसार, अधिकरण के उस आदेश के भाग को अपास्त कर दिया गया जिसमें पुत्र को इमारत खाली करने का निदेश दिया गया था, जबकि भरणपोषण संबंधी पंचाट को बरकरार रखा गया।
माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरणपोषण तथा कल्याण अधिनियम, 2007 क्या है?
बारे में:
- भारत में माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरणपोषण और कल्याण के लिये अधिक प्रभावी उपबंध प्रदान करने हेतु माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरणपोषण तथा कल्याण अधिनियम, 2007 को अधिनियमित किया गया था। अधिनियम के अनुसार, "वरिष्ठ नागरिक" वह व्यक्ति है जो भारत का नागरिक है और जिसकी आयु 60 वर्ष या उससे अधिक हो चुकी है।
मुख्य उपबंध:
- भरणपोषण का दायित्त्व (धारा 4-18): बालकों का अपने माता-पिता का भरण-पोषण करने का विधिक दायित्त्व है, और नातेदारों का निःसंतान वरिष्ठ नागरिकों का भरणपोषण करने का दायित्त्व है।
- अधिकरणों की स्थापना (धारा 7): राज्य सरकारों को भरण-पोषण दावों का निपटारा करने के लिये भरण-पोषण अधिकरणों की स्थापना करनी होगी।
- वृद्धाश्रम (धारा 19): राज्य सरकारों को प्रत्येक जिले में वृद्धाश्रम स्थापित करने की आवश्यकता है।
- चिकित्सीय सहायता (धारा 20): वरिष्ठ नागरिकों के लिये चिकित्सीय देखरेख के पउपबंध।
- जीवन और संपत्ति की सुरक्षा (धारा 21-23): वरिष्ठ नागरिकों के जीवन और संपत्ति की संरक्षा के उपाय।
अधिकरण क्या है?
बारे में:
अधिकरण एक अर्ध-न्यायिक संस्था है जिसे प्रशासनिक या कर संबंधी विवादों के समाधान जैसे मामलों से निपटने के लिये स्थापित किया जाता है। मूल संविधान में अधिकरणों से संबंधित कोई प्रावधान नहीं थे। 1976 के 42वें संशोधन अधिनियम ने एक नया भाग 14-क जोड़ा।
- भाग 14-क को अधिकरण कहा जाता है और इसमें दो अनुच्छेद शामिल हैं, अर्थात् अनुच्छेद 323क और 323ख।
न्यायालय और अधिकरण के बीच अंतर:
- अधिकरण और न्यायालय दोनों ही पक्षकारों के बीच उन विवादों का निपटारा करते हैं जो नागरिकों के अधिकारों को प्रभावित करते हैं। लेकिन इन दोनों में कुछ अंतर हैं जो इस प्रकार हैं:
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न्यायालय |
अधिकरण |
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