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सांविधानिक विधि
उच्चतम न्यायालय ने याचिकाओं का प्रारूपण तैयार करने के लिये कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के उपयोग से उत्पन्न जोखिमों के बारे में चेतावनी दी
«18-Feb-2026
स्रोत: द हिंदू
परिचय
हाल ही में, भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने विधिक कार्यों में जनरेटिव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (GenAI) के अंधाधुंध उपयोग पर गंभीर चिंता व्यक्त की। न्यायालय की ये टिप्पणियां कार्तिकेय रावल द्वारा दायर एक याचिका की सुनवाई के दौरान आईं, जिसमें AI मतिभ्रम के खतरों को उजागर किया गया था - ऐसे उदाहरण जहाँ AI सिस्टम मनगढ़ंत या पूरी तरह से काल्पनिक जानकारी उत्पन्न करते हैं - जिसके परिणामस्वरूप विधिक याचिकाओं में अस्तित्वहीन वाद विधियों और न्यायिक पूर्व निर्णयों का हवाला दिया जाता है।
न्यायालय की चिंताओं का कारण क्या था?
- उच्चतम न्यायालय का हस्तक्षेप उन याचिकाओं के बढ़ते रुझान के पश्चात् सामने आया, जिनमें काल्पनिक एवं मनगढ़ंत विधिक प्राधिकारों का उल्लेख किया जा रहा था।
- दिसंबर 2025 में, मुख्य न्यायाधीश ने पहले ही विधिक कार्यों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के अंधाधुंध उपयोग से उत्पन्न होने वाले जोखिमों के बारे में न्यायालय की जागरूकता को नोट किया था, यह स्पष्ट करते हुए कि न्यायपालिका नहीं चाहती कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता न्याय प्रशासन प्रक्रिया को प्रभावित करे या उससे समझौता करे।
- इसका तात्कालिक कारण उन याचिकाओं से सामना होना था जिनमें वास्तविक निर्णयों के अस्तित्वहीन अंशों का हवाला दिया गया था। न्यायमूर्ति नागरत्ना द्वारा द्वारा स्मरण कराया गया एक विशेष रूप से चौंकाने वाला उदाहरण एक अधिवक्ता से संबंधित था, जिसने उनकी पीठ के समक्ष तर्क प्रस्तुत करते हुए, मर्सी बनाम मैनकाइंड नामक एक पूर्णतः अस्तित्वहीन वाद का हवाला दिया था।
- इसके अतिरिक्त, पीठ ने न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की अध्यक्षता वाली उच्चतम न्यायालय की पीठ के समक्ष एक अलग मामले का हवाला दिया, जहाँ इसी तरह अस्तित्वहीन न्यायिक पूर्व निर्णयों का उल्लेख किया गया था।
न्यायालय ने क्या कहा?
- पीठ ने अपनी अस्वीकृति स्पष्ट रूप से व्यक्त करते हुए इस प्रवृत्ति को "चिंताजनक" बताया और कहा कि विधिक प्रारूपण (legal drafting) तैयार करने के लिये AI का प्रयोग "पूर्णत: अनावश्यक" है।
- न्यायालय ने सुविधा और सटीकता के बीच स्पष्ट अंतर बताया, और यह भी कहा कि AI उपकरणों के माध्यम से विधिक शोध करने में आसानी कभी भी तथ्यात्मक और विधिक सटीकता की कीमत पर नहीं होनी चाहिये।
- न्यायालय ने पुनः यह दोहराया कि न्यायपालिका का कोई भी ऐसा आशय नहीं है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता न्याय प्रशासन की प्रक्रिया पर आधिपत्य स्थापित करे अथवा उसे नियंत्रित करे — यह चिंता इस तथ्य को रेखांकित करती है कि जब प्रौद्योगिकी का अंतर्संबंध विधि के शासन से होता है, तब संस्थागत दांव-पेंच अत्यंत गंभीर एवं दूरगामी हो जाते हैं।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता से होने वाली मतिभ्रम क्या है और विधि में इसका क्या महत्त्व है?
- AI मतिभ्रम उस घटना को संदर्भित करता है जहाँ बड़े भाषा मॉडल और जनरेटिव AI सिस्टम ऐसे आउटपुट उत्पन्न करते हैं जो सुनने में तो विश्वसनीय लगते हैं किंतु तथ्यात्मक रूप से गलत, मनगढ़ंत या पूरी तरह से काल्पनिक होते हैं।
- सामान्य परिस्थितियों में, ऐसी त्रुटियाँ असुविधाजनक हो सकती हैं। किंतु विधिक व्यवसाय में, इसके परिणाम कहीं अधिक गंभीर होते हैं।
- जब कोई अधिवक्ता किसी ऐसे निर्णय का हवाला देते हुए याचिका प्रस्तुत करता है जो अस्तित्व में ही नहीं है, तो यह न्यायालय को गुमराह करता है, न्यायिक समय की बर्बादी करता है और संभावित रूप से मामले के परिणाम को प्रभावित कर सकता है।
- यह स्थिति व्यावसायिक अवचार तथा नैतिक उत्तरदायित्त्व के गंभीर प्रश्न भी उत्पन्न करती है। अधिवक्ता-वृत्ति का अधिकरण के प्रति सत्यनिष्ठा एवं स्पष्टवादिता का जो मूलभूत दायित्त्व है, वह प्रत्यक्ष रूप से संकटग्रस्त हो जाता है, जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता द्वारा उत्पन्न काल्पनिक अथवा भ्रांतिपूर्ण सामग्री (AI-generated hallucinations) बिना समुचित परीक्षण एवं सत्यापन के न्यायालयीन अभिलेखों में सम्मिलित कर दी जाती है।
इसके व्यापक निहितार्थ क्या हैं?
- उच्चतम न्यायालय की टिप्पणियां भारत में वृत्तिक विधिक व्यवसाय में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विनियमन के लिये एक महत्त्वपूर्ण मोड़ का संकेत देती हैं। इस संदर्भ में कई चिंताएँ उभरती हैं।
- वृत्तिक उत्तरदायित्त्व के प्रश्न पर, बार काउंसिल और विधिक वृत्तिक निकायों को न्यायालयों में प्रस्तुत करने से पहले AI-जनित शोध के सत्यापन को अनिवार्य बनाने वाले स्पष्ट दिशानिर्देश जारी करने की आवश्यकता हो सकती है।
- संस्थागत अखंडता के प्रश्न पर, न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता न्यायालयों के समक्ष प्रस्तुत विधिक सामग्रियों की सटीकता पर निर्भर करती है - मनगढ़ंत उद्धरण इस आधार को कमजोर करते हैं।
- AI गवर्नेंस के प्रश्न पर, यह विकास विधि, चिकित्सा और लोक प्रशासन जैसे उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में AI को तैनात करते समय डोमेन-विशिष्ट सुरक्षा उपायों की आवश्यकता के बारे में एक व्यापक वैश्विक चर्चा में योगदान देता है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के संबंध में समग्र परिचय
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) एक ऐसी तकनीक है जो मशीनों को सीखने, समस्या-समाधान और निर्णय लेने जैसे मानवीय संज्ञानात्मक कार्यों की नकल करने में सक्षम बनाती है।
- एल्गोरिदम और डेटा के उपयोग के माध्यम से, AI प्रणालियाँ पैटर्न की पहचान करने, भाषा का संसाधन करने, चित्रों की पहचान करने तथा स्पष्ट प्रोग्रामिंग के अभाव में भी नवीन सूचनाओं के अनुरूप स्वयं को अनुकूलित करने में सक्षम होती हैं।
- वर्चुअल असिस्टेंट से लेकर स्वायत्त वाहनों तक, AI में मशीन लर्निंग, न्यूरल नेटवर्क और डीप लर्निंग सहित विभिन्न दृष्टिकोण शामिल हैं, जिनके अनुप्रयोग लगभग हर उद्योग में फैले हुए हैं और मनुष्यों के रहने और काम करने के तरीके को बदलने की बढ़ती क्षमता रखते हैं।
भारत में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का विकास
- भारत में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का विकास पाँच प्रमुख चरणों से होकर गुजरा है:
- 1950 के दशक का "नवजात" चरण जिसने कृत्रिम बुद्धिमत्ता की प्रारंभिक अवधारणाओं को विकसित किया।
- 1970 के दशक का "शिशुकालीन" विचार-मंथन चरण।
- 1980 का दशक "पुनः आरंभ" का दौर था, जिसमें नए सिरे से वित्त पोषण और एल्गोरिदम का विकास हुआ।
- 2000 का दशक "बीटा चरण" था जब एल्गोरिदम को लागू करने के लिये कंप्यूटिंग हार्डवेयर उपलब्ध हो गया था।
- 2010 का दशक "पूर्ण विकास" का चरण था जिसमें इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT), वर्चुअल रियलिटी (VR), ऑगमेंटेड रियलिटी (AR) और बिग डेटा के क्षेत्रों में गहन एवं व्यापक अनुप्रयोग विकसित हुए।
भारत में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का प्रभाव
- नीति आयोग द्वारा तैयार की गई भारत की राष्ट्रीय AI रणनीति, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, कृषि और स्मार्ट बुनियादी ढाँचे में सामाजिक आवश्यकतों को पूरा करती है।
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता अनुसंधान में यह देश वैश्विक स्तर पर 10वें स्थान पर है, जिसमें 386 PhD-शिक्षित शोधकर्ता हैं, जिनका काम IITs, IIIT और IISc जैसे प्रमुख संस्थानों में केंद्रित है।
- एक बहुस्तरीय ढाँचा उत्कृष्टता अनुसंधान केंद्रों (COREs) और परिवर्तनकारी AI के लिये अंतर्राष्ट्रीय केंद्रों (ICTAIs) के माध्यम से AI की प्रगति को बढ़ावा देता है, जबकि AIRAWAT जैसे प्लेटफॉर्म मशीन लर्निंग के लिये क्लाउड कंप्यूटिंग बुनियादी ढाँचा प्रदान करते हैं।
- एक्सेंचर के अनुसार, AI बुद्धिमान स्वचालन, मानवीय क्षमताओं को बढ़ाने और नवाचार के प्रसार के माध्यम से 2035 तक भारत की वार्षिक वृद्धि को 1.3 प्रतिशत अंक तक बढ़ा सकता है, यद्यपि इसे अपनाने में तकनीकी व्यवहार्यता, डेटा की उपलब्धता, नियामक बाधाएँ और नैतिक विचार सहित कई चुनौतियाँ हैं।
निष्कर्ष
विधिक प्रारूपण तैयार करने में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के अंधाधुंध उपयोग के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय की कठोर चेतावनी समयोचित और आवश्यक दोनों है। यद्यपि AI उपकरण विधिक अनुसंधान, वाद-प्रबंधन और दस्तावेज़ समीक्षा में वास्तविक उपयोगिता प्रदान करते हैं, लेकिन पर्याप्त मानवीय पर्यवेक्षण के अभाव में इनका उपयोग न्यायिक निष्पक्षता के लिये गंभीर जोखिम उत्पन्न करता है। न्यायालय के हस्तक्षेप से यह स्पष्ट होता है कि प्रौद्योगिकीय सुविधा व्यावसायिक सतर्कता एवं परिश्रम का विकल्प नहीं हो सकता। अधिवक्ताओं का यह अनिवार्य कर्त्तव्य है कि वे न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किये जाने वाले प्रत्येक विधिक प्राधिकार की सटीकता की पुष्टि करें - एक ऐसा कर्त्तव्य जिसे कोई भी AI उपकरण उनकी ओर से पूरा नहीं कर सकता।
