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सिविल कानून
जहाँ स्वामित्व विवादित है, वहाँ आज्ञापक व्यादेश पोषणीय नहीं है
« »17-Jan-2026
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संजय पालीवाल और अन्य बनाम भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड "स्वामित्व की घोषणा और कब्जे की वसूली के लिये उपचारों की खोज किये बिना केवल अनिवार्य व्यादेश की मांग करने वाला वाद नहीं चलाया जा सकता है, विशेषत: जब वादी के संपत्ति पर स्वामित्व को लेकर विवाद हो।" न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और एन. कोटिस्वर सिंह |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
संजय पालीवाल और अन्य बनाम भारत हेवी इलेक्ट्रिकल लिमिटेड (2026) के मामले में न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने उत्तराखंड उच्च न्यायालय के उस निर्णय को बरकरार रखा जिसमें अनिवार्य व्यादेश के लिये दायर वाद को खारिज कर दिया गया था, जहाँ वादी के संपत्ति पर स्वामित्व को लेकर विवाद था।
संजय पालीवाल और अन्य बनाम भारत हेवी इलेक्ट्रिकल लिमिटेड (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- अपीलकर्त्ताओं ने भारत हेवी इलेक्ट्रिकल लिमिटेड (BHEL) के विरुद्ध आज्ञापक व्यादेश की मांग करते हुए एक वाद दायर किया।
- इस वाद में अपीलकर्त्ताओं की भूमि पर कथित तौर पर भारत हेवी इलेक्ट्रिकल लिमिटेड (BHEL) द्वारा निर्मित सीमा दीवार को ध्वस्त करने की मांग की गई थी।
- अपीलकर्त्ताओं के अनुसार, दीवार ने उनकी संपत्ति से सार्वजनिक सड़क तक उनकी पहुँच को बाधित कर दिया था।
- विचारण न्यायालय ने वादी के पक्ष में वाद सुनाया और दीवार को हटाने का आज्ञापक व्यादेश जारी किया।
- प्रथम अपीलीय न्यायालय ने भी वादियों के पक्ष में निर्णय दिया।
- यद्यपि, उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने दूसरी अपील में इन निष्कर्षों को पलट दिया और वाद को खारिज कर दिया।
- उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 की धारा 41(ज) के अधीन वाद वर्जित था, क्योंकि अधिक प्रभावी उपचार उपलब्ध था।
- उच्च न्यायालय ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में कब्जे के लिये वाद दायर करना ही उचित उपचार होगा।
- इस निर्णय को अपीलकर्त्ताओं द्वारा उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गई थी।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- उच्चतम न्यायालय ने विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 की धारा 41(ज) के उच्च न्यायालय के निर्वचन और उसके अनुप्रयोग का समर्थन किया।
- न्यायालय ने पाया कि वर्तमान मामले में संपत्ति के स्वामित्व, कब्जे और पहचान को लेकर गंभीर विवाद विद्यमान हैं।
- जब प्रतिवादी कथित तौर पर वादी द्वारा दावा की गई भूमि पर कोई ढाँचा खड़ा करता है, तो यह अतिचार और बेदखली के समान होता है।
- अतिचार और बेदखली के लिये सबसे प्रभावी उपचार कब्जे की वसूली के लिये वाद दायर करना है।
- न्यायालय ने कहा कि यदि वादी के पास वैध स्वामित्व भी हो, तब भी विवादित संपत्ति पर निर्माण होने की स्थिति में, उचित उपचार कब्जे के लिये वाद दायर करना और उसके परिणामस्वरूप व्यादेश जैसा अनुतोष प्राप्त करना है।
- न्यायालय ने माना कि केवल व्यादेश के लिये वाद दायर करना उचित विधिक उपचार नहीं था।
- विवादित संपत्ति पर कब्जे को लेकर अनिश्चितता के होते हुए भी वादी कब्जे के अनुतोष की मांग करने में असफल रहे।
- इसलिये, साधारण व्यादेश का वाद पोषणीय नहीं था और विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 की धारा 41(ज) के अधीन इसे सही ढंग से वर्जित कर दिया गया था।
- न्यायालय ने निर्णय दिया कि जब वादी के वाद संपत्ति पर स्वामित्व को लेकर विवाद हो, तो कब्जे का दावा करने और स्वामित्व की घोषणा की मांग करने के बजाय आज्ञापक व्यादेश की मांग करते हुए साधारण वाद दायर करना अनुमेय नहीं है।
- उच्चतम न्यायालय ने अपील खारिज करते हुए उच्च न्यायालय के निर्णय को बरकरार रखा।
आज्ञापक व्यादेश क्या है?
विधिक उपबंध और आवश्यकताएँ:
- विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 की धारा 39 न्यायालयों को बाध्यता के भंग के निवारण और आवश्यक कार्यों के पालन को बाध्य करने के लिये आज्ञापक व्यादेश जारी करने का अधिकार देती है, जो न्यायालय के विवेक के अधीन है।
- इस उपबंध के अधीन एक स्पष्ट, विनिर्दिष्ट और विधिक रूप से बाध्यकारी दायित्त्व का अस्तित्व आवश्यक है, जिसके भंग को न्यायिक हस्तक्षेप के माध्यम से रोका जाना है।
- बाध्यता का वास्तविक भंग या भंग की युक्तियुक्त आशंका होनी चाहिये, और जिन कार्यों के पालन की मांग की जा रही है, वे न्यायालय द्वारा लागू किये जाने योग्य होने चाहिये।
- आवश्यक शर्तें:
- ऐसे कृत्यों का पालन परिवाद किये गए भंग के निवारण के लिये आवश्यक होना चाहिये, और जिन कृत्यों को बाध्य किया जाना है और बाध्यता के भंग के निवारण के बीच प्रत्यक्ष संबंध होना चाहिये।
- आज्ञापक व्यादेश एक असाधारण उपचार है जो केवल तभी प्रदान किया जाता है जब सामान्य विधिक उपचार अपर्याप्त साबित होते हैं, और वादी को सभी पूर्व शर्तों के अनुपालन को प्रदर्शित करना होगा।
- न्यायालय स्थापित न्यायसंगत सिद्धांतों के आधार पर विवेक का प्रयोग करता है, जिसमें सुविधा का संतुलन, अपूरणीय क्षति और क्षतिपूर्ति की पर्याप्तता सम्मिलित है, जिससे यह अधिकार का मामला नहीं रह जाता अपितु न्यायिक मूल्यांकन और न्यायसंगत विचारों पर निर्भर करता है।
विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 की धारा 41(ज) क्या है?
- विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 की धारा 41(ज) न्यायालयों को व्यादेश देने से वर्जित करती है जब वादी के लिये अधिक प्रभावी विधिक उपचार उपलब्ध हो।
- यह उपबंध सुनिश्चित करता है कि पक्षकार अपने परिवादों के लिये सबसे उपयुक्त और प्रभावी समाधान तलाशें।
- जब कब्जे या घोषणा के वादों जैसे वैकल्पिक उपचार सरल या अधिक उपयुक्त समाधान प्रदान करते हैं, तो न्यायालय व्यादेश अनुतोष देने से इंकार कर देंगे।