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सिविल कानून
वन निवासी का दर्जा प्राप्त करने हेतु निवास एवं आजीविका हेतु कृषि का होना आवश्यक है
«18-Mar-2026
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ए.सी. मुरुगेसन और अन्य बनाम जिला कलेक्टर और अन्य "वन क्षेत्र में निरंतर निवास करना और आजीविका के लिये कृषि करके वन पर निर्भर रहना, अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 के अधीन वन निवासी घोषित होने के लिये आवश्यक है।" न्यायमूर्ति एस.एम. सुब्रमण्यम और न्यायमूर्ति के. सुरेंद्र |
स्रोत: मद्रास उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति एस.एम. सुब्रमण्यम और न्यायमूर्ति के. सुरेंद्र की पीठ ने, ए.सी. मुरुगेसन और अन्य बनाम जिला कलेक्टर और अन्य (2026) के मामले में, आरक्षित वन घोषित भूमि पर अपने कब्जे के अधिकार की घोषणा की मांग करने वाले व्यक्तियों के एक समूह द्वारा दायर अपीलों को खारिज कर दिया, यह मानते हुए कि वन क्षेत्र में निरंतर निवास और कृषि के माध्यम से आजीविका के लिये वन पर निर्भरता, अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 के अधीन वन निवासी घोषित होने के लिये आवश्यक और गैर-परक्राम्य शर्तें हैं।
ए.सी. मुरुगेसन और अन्य बनाम जिला कलेक्टर और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- अपीलकर्त्ताओं ने दावा किया कि उनके पूर्वज वन भूमि पर कब्जा रखते थे, उस पर कृषि करते थे और 75 वर्षों से अधिक समय से वन क्षेत्र में रह रहे थे।
- पनामाराथुपट्टी झील और जलाशय के निर्माण के दौरान, क्षेत्र में भूमि के विशाल विस्तार का अधिग्रहण किया गया, जिससे अपीलकर्त्ताओं के दावे वाली संपत्तियों पर प्रभाव पड़ा।
- अपीलकर्त्ताओं ने जिला कलेक्टर के समक्ष एक आवेदन दायर कर आरक्षित वन के रूप में नामित भूमि पर अपने कब्जे के अधिकार की घोषणा की मांग की ।
- जिला कलेक्टर ने दावे का समर्थन करने के लिये अपर्याप्त साक्ष्य पाते हुए उनका आवेदन खारिज कर दिया।
- अपीलकर्त्ताओं ने इस नामंजूरी को रिट न्यायालय के समक्ष चुनौती दी; तथापि, रिट न्यायालय ने उनकी याचिका खारिज कर दी।
- इससे व्यथित होकर, अपीलकर्त्ताओं ने मद्रास उच्च न्यायालय में अपील दायर की, जिसमें उन्होंने अधिनियम के अधीन अन्य पारंपरिक वन निवासियों के रूप में अपने दावे को दोहराया।
- अपीलकर्त्ताओं ने स्वीकार किया कि वे वर्तमान में वन क्षेत्र के बाहर रह रहे हैं, लेकिन उन्होंने तर्क दिया कि वे भूमि पर कृषि करना जारी रखते हैं, और 75 वर्षों से अधिक के उनके पैतृक संबंध उन्हें अनुतोष पाने का अधिकार देते हैं।
- राज्य ने इस दावे का विरोध करते हुए कहा कि अपीलकर्त्ता स्थानीय निवासी नहीं थे, किसी आदिवासी समुदाय से संबंधित नहीं थे, और उनके पास प्राथमिक निवास या आजीविका के लिये जंगल पर वास्तविक निर्भरता का कोई साक्ष्य नहीं था।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- अधिनियम के अंतर्गत आवश्यक शर्तों पर: न्यायालय ने माना कि दो शर्तें निश्चायक रूप से स्थापित होनी चाहिये - वन क्षेत्र में निवास और आजीविका के लिये कृषि। इन मूलभूत आवश्यकताओं के सबूत के अभाव में अधिनियम के अंतर्गत कोई अनुतोष प्रदान नहीं किया जा सकता।
- धारा 2(ण) के अधीन 'अन्य पारंपरिक वन निवासी' की परिभाषा पर: न्यायालय ने धारा 2(ण) का उल्लेख किया, जिसके अनुसार दावेदार को 13 दिसंबर, 2005 से पहले कम से कम तीन पीढ़ियों तक प्राथमिक रूप से वन या वन भूमि में निवास करता रहा है और जो जीविका की वास्तविक आवश्यकताओं के लिये उन पर निर्भर रहा है - एक ऐसी सीमा जिसे अपीलकर्त्ता पूरा करने में असफल रहे थे।
- वास्तविक कृषि बनाम वाणिज्यिक दोहन: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वास्तविक कृषि का अर्थ जीवन निर्वाह के लिये जुताई, सिंचाई और रोपण करना है, न कि व्यावसायिक दोहन। चूँकि वन भूमि का वाणिज्यिक उपयोग किया जा रहा था, इसलिये अपीलकर्त्ता अधिनियम के संरक्षण क्षेत्र से बाहर थे।
- वन क्षेत्र से बाहर स्थानांतरण के संबंध में: यदि यह मान भी लिया जाए कि अपीलकर्त्ता अपने पूर्वजों के साथ वन में ही निवास करते थे, तब भी वे वर्तमान में कहीं और निवास कर रहे थे। न्यायालय ने माना कि केवल इस स्थानांतरण के कारण ही वे वन निवासी का दर्जा प्राप्त करने के पात्र नहीं रह जाते, क्योंकि वर्तमान निवास एक अनिवार्य शर्त है।
- अपील खारिज होने पर: अपीलकर्त्ताओं द्वारा कोई विधिक अधिकार स्थापित न होने के कारण, न्यायालय ने जिला कलेक्टर और रिट न्यायालय के आदेशों को बरकरार रखते हुए अपील खारिज कर दी।
अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 क्या है?
पृष्ठभूमि:
- यह अधिनियम वर्ष 2006 में अधिनियमित किया गया तथा वर्ष 2008 में प्रवर्तन में लाया गया; इसे सामान्यतः “वन अधिकार अधिनियम (FRA)” अथवा “वन अधिकार अधिनियम” भी कहा जाता है।
- यह अधिनियम उन वन-निवासी समुदायों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय को दूर करने के लिये बनाया गया था जो पीढ़ियों से जंगलों में रहते आए थे और उन पर निर्भर थे, लेकिन जिन्हें उनके अधिकारों की विधिक मान्यता से वंचित रखा गया था।
- यह संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 46 के अधीन अनुसूचित जनजातियों और वन निवासियों के प्रति संवैधानिक प्रतिबद्धता को प्रभावी बनाता है।
मुख्य उपबंध:
- यह व्यक्तिगत वन अधिकारों (13 दिसंबर, 2005 से पूर्व कब्जे वाली वन भूमि पर कृषि करने और रहने का अधिकार) और सामुदायिक वन अधिकारों (सामुदायिक वन संसाधनों की रक्षा, प्रबंधन और उपयोग करने का अधिकार) को मान्यता देता है और उन्हें प्रदान करता है।
- इसमें वन क्षेत्रों में रहने वाली अनुसूचित जनजातियाँ और अन्य पारंपरिक वैन निवासी शामिल हैं - जिन्हें धारा 2(ण) के अधीन उन समुदायों के रूप में परिभाषित किया गया है जो 13 दिसंबर, 2005 से पूर्व कम से कम तीन पीढ़ियों (75 वर्ष) से जंगलों में रह रहे हैं।
- ग्राम सभा वन अधिकारों के अवधारण की प्रक्रिया शुरू करने वाली प्राथमिक संस्था है।
- मान्यता प्राप्त अधिकारों में निवास, कृषि, पशुपालन, मछली पकड़ने और वन उत्पादों तक पहुँच के अधिकार शामिल हैं।
संस्थागत तंत्र:
- दावों का निर्णय तीन स्तरों पर किया जाता है — उप-मंडल स्तरीय समिति, जिला स्तरीय समिति और राज्य स्तरीय निगरानी समिति।
- अधिकारों को मान्यता देने का अंतिम अधिकार जिला स्तरीय समिति के पास निहित है।
- दावों के सत्यापन और अनुशंसा में ग्राम सभाओं की केंद्रीय भूमिका होती है।
महत्त्व:
- यह लाखों वन-निवासी के परिवारों को भूमि स्वामित्व की सुरक्षा प्रदान करता है।
- यह सामुदायिक वन संसाधन अधिकारों के माध्यम से समुदायों को वनों के संरक्षण और प्रबंधन के लिये सशक्त बनाता है।
- इसे आदिवासी अधिकारों, पर्यावरण विधि और सामाजिक न्याय के अंतर्संबंध में एक ऐतिहासिक विधि के रूप में मान्यता प्राप्त है।
- इसके लागू होने के बाद से इसे पूरे भारत में वन-निवासी के परिवारों को वितरित किया गया है।