9 मार्च से शुरू हो रहे हमारे ऑल-इन-वन ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स के साथ अपनी ज्यूडिशियरी की तैयारी को मजबूत बनाएं | यह कोर्स अंग्रेज़ी और हिंदी दोनों माध्यमों में उपलब्ध है।   |   आज ही हमारे ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स में एडमिशन लें और अपनी तैयारी को और बेहतर बनाएँ | हिंदी माध्यम बैच: 9 मार्च, सुबह 8 बजे   |   आज ही एडमिशन लें बिहार APO (प्रिलिम्स + मेन्स) कोर्स में और अपने सपनों को दे नई दिशा | ऑफलाइन एवं ऑनलाइन मोड में उपलब्ध | 12 जनवरी 2026  से कक्षाएँ आरंभ   |   एडमिशन ओपन: UP APO प्रिलिम्स + मेंस कोर्स 2025, बैच 6th October से   |   ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स (प्रयागराज)   |   अपनी सीट आज ही कन्फर्म करें - UP APO प्रिलिम्स कोर्स 2025, बैच 6th October से










होम / करेंट अफेयर्स

सिविल कानून

नगरपालिका विधियों का उल्लंघन करने वाले अतिक्रमणों को हटाने का निदेश राष्ट्रीय हरित अधिकरण द्वारा नहीं दे सकती

    «    »
 18-Mar-2026

नरेंद्र भारद्वाज बनाम एम./एस. 108 सुपर कॉम्प्लेक्स आर.डब्ल्यू.. और अन्य 

"राष्ट्रीय हरित अधिकरण के पास कथित अतिक्रमण और कथित अवैध निर्माण को हटाने का निदेश देने की कोई अधिकारिता नहीं हैजो कि राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम की अनुसूची में निर्दिष्ट विधियों के उल्लंघन में किया गया हो।" 

न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और आलोक आराधे 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

भारत के उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और आलोक आराधे की पीठ नेनरेंद्र भारद्वाज बनाम एम./एस. 108 सुपर कॉम्प्लेक्स आर.डब्ल्यू.. और अन्य (2026) के मामलेमें राष्ट्रीय हरित अधिकरण (नई दिल्ली) के उस आदेश को अपास्त कर दियाजिसमें गाजियाबाद जिले के वसुंधरा जिले के सेक्टर-16A में खुले स्थान/पार्क के रूप में नामित भूमि पर कथित रूप से अवैध रूप से निर्मित मंदिर को हटाने का निदेश दिया गया था। 

  • न्यायालय ने निर्णय दिया कि राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 की धारा 14 के अधीन राष्ट्रीय हरित अधिकरण की अधिकारिता अनुसूची में सूचीबद्ध विधियों के अंतर्गत पर्यावरण से संबंधित विधि के महत्त्वपूर्ण प्रश्नों तक ही सीमित हैऔर नगरपालिका या नगर नियोजन विधियों के उल्लंघन में अनधिकृत निर्माण से जुड़े विवाद पूरी तरह से इस अधिकारिता से बाहर हैं।  

नरेंद्र भारद्वाज बनाम एम./एस. 108 सुपर कॉम्प्लेक्स आर.डब्ल्यू.. और अन्य (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • एक रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन (RWA) ने गाजियाबाद जिले के वसुंधरा जिले के सेक्टर 16Aमें खुले स्थान/पार्क के रूप में निर्धारित भूमि पर कथित रूप से निर्मित मंदिर को हटाने की मांग करते हुए राष्ट्रीय हरित अधिकरण से संपर्क किया।  
  • रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन ने तर्क दिया कि निर्माण अनधिकृत था और नगरपालिका विधियों और नगर नियोजन अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करते हुए किया गया था। 
  • नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने याचिका स्वीकार कर ली और कथित अनाधिकृत निर्माण को हटाने का आदेश पारित किया।  
  • इस आदेश से असंतुष्ट होकर अपीलकर्त्ता नरेंद्र भारद्वाज ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण के आदेश को भारत के उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम की धारा 14 के दायरे पर:न्यायालय ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 की धारा 14 अधिकरण को केवल पर्यावरण से संबंधित महत्त्वपूर्ण विधिक प्रश्नों पर ही निर्णय देने का अधिकार देती हैऔर वह भी केवल अनुसूची में विशेष रूप से सूचीबद्ध विधियों के संबंध में – अर्थात् वायु अधिनियमजल अधिनियमवन अधिनियमपर्यावरण संरक्षण अधिनियम और अन्य संबंधित विधि। राष्ट्रीय हरित अधिकरण की अधिकारिता व्यापक नहीं हैयह इस सांविधिक ढाँचे द्वारा सख्ती से सीमित है।  
  • विवाद की प्रकृति पर:न्यायालय ने पाया कि रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन (RWA) द्वारा उठाई गई शिकायत कथित तौर पर नगरपालिका विधियों और नगर नियोजन अधिनियम के उल्लंघन में किये गए अनधिकृत निर्माण को हटाने से संबंधित थी - इनमें से किसी का भी उल्लेख राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम की अनुसूची I में नहीं है। अतःयह विवाद्यक मूलतः नगरपालिका विधि और शहरी नियोजन का थान कि पर्यावरण विधि का। न्यायालय ने माना कि ऐसा विवाद अधिनियम के अर्थ के अंतर्गत पर्यावरण से संबंधित किसी भी महत्त्वपूर्ण विधिक प्रश्न को जन्म नहीं देता है। 
  • राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की अधिकारिता के प्रयोग पर:न्यायालय ने माना कि धारा 14 के अधीन अधिकरण की अधिकारिता का प्रयोग करने के लिये आवश्यक शर्तें इस मामले में पूरी नहीं हुईं। तदनुसारसंरचना को हटाने का निदेश देने वाला राष्ट्रीय हरित अधिकरण का आदेश अधिकारिता से बाहर पाया गया और उसे अपास्त कर दिया गया। 
  • रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन (RWA) को अनुतोष के संबंध में:विवादित आदेश को अपास्त करते हुएन्यायालय ने RWA की यह स्वतंत्रता बरकरार रखी कि वह अपनी शिकायत के उचित निवारण के लिये लागू नगरपालिका या नगर नियोजन ढाँचे के अधीन सक्षम प्राधिकारी से संपर्क कर सकता है। 
  • अपीलकर्त्ताओं के संरक्षण पर:न्यायालय ने राज्य को निदेश दिया कि वह अपीलकर्त्ताओं और प्रभावित पक्षकारों को नोटिस जारी किये बिना उनके विरुद्ध कोई भी दण्डात्मक कार्रवाई न करे। 

राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) क्या है? 

स्थापना एवं पृष्ठभूमि: 

  • पर्यावरण संबंधी मामलों के शीघ्र निपटान के लियेराष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के अधीन स्थापित। 
  • भारत विश्व स्तर पर (ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के बाद) तीसरा और पहला विकासशील देश था जिसने एक विशेष पर्यावरण अधिकरण की स्थापना की। 
  • मामले दर्ज होने के महीने के भीतर उनका निपटारा करना अनिवार्य है। 

संरचना: 

  • इसमें अध्यक्षन्यायिक सदस्य और विशेषज्ञ सदस्य शामिल होते हैं। 
  • कार्यकाल: 3 वर्ष या 65 वर्ष की आयु तकजो भी पहले होपुनर्नियुक्ति नहीं। 
  • सदस्यों की संख्या: न्यूनतम 10, अधिकतम 20 पूर्णकालिक सदस्य। 
  • पीठें(Benches) - प्रधान पीठ नई दिल्ली मेंअन्य भोपालपुणेकोलकाता और चेन्नई में। 

शक्तियां एवं अधिकारिता: 

  • इसमें पर्यावरण संबंधी महत्त्वपूर्ण प्रश्नों से जुड़े सभी सिविल मामले सम्मिलित हैं। 
  • उसे स्वप्रेरित होने कीशक्तियां प्राप्त हैं (उच्चतम न्यायालय द्वारा 2021 में पुष्टि की गई)। 
  • सिविल प्रक्रिया संहिता या भारतीय साक्ष्य अधिनियम से बाध्य नहीं; प्राकृतिक न्याय द्वारा निर्देशित। 
  • यह प्रदूषण फैलाने वाले से भुगतान लेने , एहतियाती उपायों और सतत विकास के सिद्धांतों कोलागू करता है । 
  • ये आदेशसिविल न्यायालय के निर्णयोंके समान ही लागू होंगे इनके विरुद्ध 90 दिनों के भीतर उच्चतम न्यायालय में अपील की जा सकती है। 

शास्ति: 

  • वर्षतक का कारावास, 10 करोड़ रुपएतक का जुर्मानाया दोनों। 

मुख्य विधियाँ (अनुसूची I) 

  • जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974। 
  • जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) उपकर अधिनियम, 1977। 
  • वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980। 
  • वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981। 
  • पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986। 
  • लोक दायित्त्व बीमा अधिनियम, 1991। 
  • जैव विविधता अधिनियम, 2002। 

इन विधियों से संबंधित किसी भी उल्लंघन या इन विधियों के अधीन सरकार द्वारा लिये गए किसी भी निर्णय को राष्ट्रीय हरित अधिकरण के समक्ष चुनौती दी जा सकती है।  

सुदृढ़ताएँ : 

  • उच्च न्यायालयों एवं उच्चतम न्यायालय पर भार को कम करता है । 
  • नियमित न्यायालयों की तुलना में अधिक तीव्रकम खर्चीला एवं कम औपचारिक मंच प्रदान करता है 
  • पुनर्नियुक्ति के अभाव के कारण स्वतंत्र एवं निष्पक्ष निर्णय सुनिश्चित करता है 
  • पर्यावरण प्रभाव आकलन के अनुपालन को सुदृढ़ करता है।