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आपराधिक कानून

आपराधिक अन्वेषण में आवाज का नमूना (वॉइस सैंपलिंग) लेना

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 03-Jan-2026

मोइन अख्तर कुरैशी बनाम केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो 

"न्यायिक मजिस्ट्रेटों के पास आपराधिक अन्वेषण के उद्देश्यों के लिये आवाज के नमूने लेने का आदेश देने की शक्ति हैऔर ऐसा निदेश संविधान के अनुच्छेद 20(3) का उल्लंघन करने वाला परिसाक्ष्य देने के लिये बाध्यता नहीं है।" 

न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा 

स्रोत: दिल्ली उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

दिल्ली उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने मोइन अख्तर कुरैशी बनाम केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (2025)के मामले मेंयाचिकाकर्त्ता को अवरोधित टेलीफोन वार्तालापों के साथ तुलना के लिये आवाज के नमूने प्रदान करने का निदेश देने वाले आदेश को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दियायह मानते हुए कि ऐसे निदेश विधिक रूप से वैध हैं और सांविधानिक सुरक्षा का उल्लंघन नहीं करते हैं। 

मोइन अख्तर कुरैशी बनाम केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (2025) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • अक्टूबर 2013 और मार्च 2014 के बीचआयकर विभाग ने याचिकाकर्त्ता से कथित तौर पर संबंधित मोबाइल नंबरों से हुई टेलीफोन बातचीत को इंटरसेप्ट (अवरोध) किया। 
  • प्रवर्तन निदेशालय ने 31 अगस्त, 2016 को CBI के समक्ष एक परिवाद दर्ज करायाजिसमें अवरोधित रिकॉर्डिंग्स एवं संदेशों के आधार पर आरोप लगाया गया कि याचिकाकर्त्ता ने लोक सेवकों के लिये मध्यस्थ के रूप में काम किया। 
  • CBI ने 16 फरवरी, 2017 को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 120-ख के अधीन भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 8, 9 और 13(2) के साथ धारा 13(1)(घ) के अधीन प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) संख्या 224/2017 दर्ज की। 
  • मार्च 2021 में, CBI ने याचिकाकर्त्ता को निदेश देने का अनुरोध किया कि वहकेंद्रीय फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला द्वारा अवरोधित कॉल के साथ तुलना के लिये आवाज के नमूने उपलब्ध कराए। 
  • विशेष न्यायाधीश ने रितेश सिन्हा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2019) 8 एससीसी पर विश्वास करते हुए 26 अक्टूबर, 2021 को आवेदन स्वीकार कर लिया। 
  • याचिकाकर्त्ता ने दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के अधीन इस आदेश को चुनौती दी। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं 

प्रक्रियात्मक विधि और मौलिक न्याय: 

  • न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि प्रक्रिया विधि न्याय की दासी होनी चाहियेन कि स्वामीऔर इसका उपयोग मौलिक अधिकारों को पराजित करने के लिये नहीं किया जा सकता है। 

आवाज का नमूना लेना और आत्म-अभिशंसनसे संरक्षण: 

  • न्यायालय ने माना किआवाज का नमूना लेना आत्म-अभिशंसननहीं है और यह भारत के संविधान, 1950 (COI) के अनुच्छेद 20(3) का उल्लंघन नहीं करता है। 
  • काठी कालू ओघड़ (1961) पर विश्वास करते हुएन्यायालय ने कहा कि आत्म- अभिशंसनका अर्थ व्यक्तिगत ज्ञान के आधार पर जानकारी देना हैन कि साक्ष्य प्रस्तुत करने की यांत्रिक प्रक्रियाएँ। 
  • आवाज के नमूने तुलना के लिये ठोस साक्ष्य हैं और अपने आप में पूरी तरह से हानिरहित हैंये परिसाक्ष्य देने के लिये किसी प्रकार की बाध्यता नहीं दर्शाते हैं। 

आवाज के नमूने लेने का निदेश देने की मजिस्ट्रेट की शक्ति: 

  • रितेश सिन्हा (2019) के मामले मेंउच्चतम न्यायालय ने विधायी अंतर को भरने के लिये अनुच्छेद 142 का हवाला देते हुए कहा कि न्यायिक मजिस्ट्रेटों के पास अन्वेषण के लिये आवाज के नमूने लेने का आदेश देने की शक्ति है। 
  • उच्चतम न्यायालय ने राहुल अग्रवाल (2025) के मामले में इसकी पुष्टि की और स्पष्ट किया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 349 में इस शक्ति को स्पष्ट रूप से सम्मिलित किया गया है। 
  • यह अधिकार किसी भी व्यक्ति पर लागू होता हैजिसमें अभियुक्त और साक्षी भी सम्मिलित हैं। 

निष्कर्ष और निदेश: 

  • न्यायालय ने विशेष न्यायाधीश के आदेश में कोई अवैधता नहीं पाई और याचिका खारिज कर दी। 
  • याचिकाकर्त्ता को विचारण न्यायालय/अन्वेषण अधिकारी द्वारा निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार अनुपालन करने और आवाज के नमूने प्रदान करने का निदेश दिया गया था। 

आपराधिक अन्वेषण में वॉइस सैंपलिंग क्या है? 

 बारे में: 

  • आपराधिक अन्वेषण में विवादित रिकॉर्डिंग से तुलना करने के लिये फोरेंसिक प्रयोगशालाओं में स्पेक्ट्रोग्राफिक विश्लेषण के माध्यम से किसी व्यक्ति की आवाज को रिकॉर्ड करना ही वॉयस सैंपलिंग है। 
  • आवाज के नमूने भौतिक साक्ष्य होते हैंपरिसाक्ष्य के साक्ष्य नहींऔर ये अपने आप में व्यक्ति को दोषी साबित नहीं करते।  

विधिक ढाँचा: 

  • रितेश सिन्हा (2019) मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह मानते हुए विधायी त्रुटी को दूर किया कि न्यायिक मजिस्ट्रेटों के पास आवाज के नमूने लेने का आदेश देने की शक्ति है। 
  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 349 मेंअब इस शक्ति को स्पष्ट रूप से संहिताबद्ध किया गया है। 

सांविधानिक वैधता: 

  • वॉयस सैंपलिंगकाठी कालू ओघड़ (1961) में स्थापित आत्म-अभिशंसन के विरुद्ध अनुच्छेद 20 (3) के संरक्षण का उल्लंघन नहीं करता है। 
  • ये तुलना के लिये भौतिक साक्ष्य हैं और अपने आप में हानिरहित हैंकेवल अन्वेषण सामग्री के साथ तुलना करने से ही दोष सिद्ध हो सकता है। 

संविधान सभा के अनुच्छेद 20(3) का क्या अर्थ है? 

  • अनुच्छेद 20 अपराधों के लिये दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण से संबंधित है। 
  • अनुच्छेद 20(3) पुष्टि करता है किकिसी भी अपराध के अभियुक्त को अपने विरुद्ध साक्षी बनने के लिये विवश नहीं किया जाएगा। 
  • इस अनुच्छेद द्वारा प्रदत्त अधिकार एक ऐसा अधिकार है जो किसी अभियुक्त को विचारण या अन्वेषण के दौरान मौन रहने का विशेषाधिकार देता हैजबकि राज्य को उसके द्वारा की गई संस्वीकृति पर कोई दावा प्राप्त नहीं होता है। 
  • सेल्वी बनाम कर्नाटक राज्य (2010)के मामले में, उच्चतम न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि संविधान के अनुच्छेद 20(3) कोसर्वोच्च दर्जाप्राप्त है । यह उपबंध आपराधिक प्रक्रिया में एक आवश्यक सुरक्षा उपाय है और अन्वेषण अधिकारियों द्वारा प्रयोग की जाने वाली यातना और अन्य दमनकारी विधियों के विरुद्ध एक महत्त्वपूर्ण सुरक्षा उपाय के रूप में भी काम करता है।