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आपराधिक कानून
क्या सम्मति की आयु कम की जानी चाहिये- लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण पर विमर्श
«12-Jan-2026
स्रोत: द हिंदू
परिचय
10 जनवरी, 2026 को, उच्चतम न्यायालय ने उत्तर प्रदेश राज्य बनाम अनुराधा एवं अन्य के मामले में अपने निर्णय में, सम्मति से बने किशोर प्रेम संबंधों में लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम (POCSO), 2012 के बढ़ते दुरुपयोग को स्वीकार किया, जहाँ एक पक्षकार अवयस्क है। इसने केंद्र सरकार से आग्रह किया कि वह वास्तविक किशोर संबंधों को विशेष बाल संरक्षण विधि के कठोर अनुप्रयोग से बाहर रखने हेतु विधायी पुनरावलोकन की प्रक्रिया प्रारंभ की जाए। इससे "सम्मति की आयु" से संबंधित विमर्श पुनः जीवंत हो गया है।
- सम्मति की आयु से तात्पर्य उस विधिक रूप से परिभाषित आयु से है जिस पर कोई व्यक्ति लैंगिक क्रियाकलाप के लिये सम्मति दे सकता है।
- भारत में, लिंग-तटस्थ में लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम के अनुसार, यह आयु सीमा वर्तमान में 18 वर्ष है। इस आयु से कम आयु का कोई भी व्यक्ति विधिक रूप से लैंगिक कृत्यों के लिये अपनी सम्मति देने में असमर्थ माना जाता है।
- परिणामस्वरूप, अवयस्कों के साथ लैंगिक कृत्यों को "सांविधिक बलात्संग" माना जाता है, जो इस विधिक उपधारणा पर आधारित है कि बालकों में वैध सम्मति देने की क्षमता नहीं होती है।
- लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम की धारा 19 में यह अनिवार्य है कि अधिनियम के अंतर्गत किसी अपराध के बारे में, चाहे वह होने की संभावना हो या पहले ही हो चुका हो, जानकारी रखने वाले किसी भी व्यक्ति को इसकी सूचना स्थानीय पुलिस या विशेष किशोर पुलिस यूनिट को देनी होगी।
विधिक ढाँचा
- आपराधिक विधि (संशोधन) अधिनियम, 2013 द्वारा इस परिभाषा को व्यापक आपराधिक विधि ढाँचे में सुदृढ़ रूप से स्थापित कर दिया गया है।
- इस अधिनियम ने विशेष रूप से भारतीय दण्ड संहिता (IPC) की धारा 375 में संशोधन किया, जो "बलात्संग" को परिभाषित करती है और 2012 तक सम्मति की आयु 16 वर्ष निर्धारित करती थी। 2013 के पश्चात् के संशोधनों का उद्देश्य महिलाओं के विरुद्ध लैंगिक अपराधों से संबंधित विधियों को सुदृढ़ करना था, जिसके अधीन भारतीय दण्ड संहिता की धारा 375 को लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण में निर्धारित 18 वर्ष की आयु के साथ संरेखित किया गया, जिससे बाल लैंगिक शोषण के विरुद्ध एक समान विधिक ढाँचा तैयार हुआ।
- भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 ने इस स्थिति को बरकरार रखा: इसकी धारा 63 के अंतर्गत, यदि महिला की आयु 18 वर्ष से कम हो, तो उसकी सम्मति होने या न होने की स्थिति में किया गया लैंगिक कृत्य “बलात्संग” की परिभाषा में सम्मिलित किया गया है।
- ऐतिहासिक दृष्टि से, भारत में सम्मति की आयु में समय-समय पर परिवर्तन हुआ है—1860 की भारतीय दण्ड संहिता के अंतर्गत यह 10 वर्ष थी, जिसे सम्मति आयु अधिनियम, 1891 द्वारा 12 वर्ष किया गया; तत्पश्चात इसे 14 वर्ष एवं फिर 16 वर्ष किया गया, जब तक कि वर्ष 2012 में लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम द्वारा इसे बढ़ाकर 18 वर्ष नहीं कर दिया गया।
- महत्त्वपूर्ण बात यह है कि सम्मति की आयु "विवाह की न्यूनतम आयु" से भिन्न है, जो बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 के अधीन महिलाओं के लिये 18 और पुरुषों के लिये 21 है।
विवाद का मूल प्रश्न
- हाल के वर्षों में सहमति की आयु से संबंधित विवाद तीव्र हुआ है, विशेष रूप से 16–18 वर्ष आयु वर्ग के किशोरों से संबंधित लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण मामलों में वृद्धि के कारण, जहाँ अनेक मामलों में पीड़िता द्वारा “परस्पर सहमति से यौन संबंध” का परिसाक्ष्य दिया जाता है।
- सम्मति की आयु को कम करने के पक्षधर यह तर्क देते हैं कि वर्तमान विधिक व्यवस्था किशोरों की लैंगिकता को मान्यता देने में विफल है, जिससे उनकी स्वायत्तता का अतिक्रमण होता है तथा उन्हें परिपक्व सहमति देने में अक्षम मान लिया जाता है।
- वे लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम के उद्देश्य को रेखांकित करते हुए यह भी बल देते हैं कि यह अधिनियम बाल लैंगिक शोषण की निवारण हेतु बनाया गया था, न कि वरिष्ठ किशोरों के मध्य सम्मति-आधारित प्रेमपूर्ण संबंधों के अपराधीकरण के लिये।
- किशोरों के लैंगिक व्यवहार की वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करते हुए, NFHS-4 (2015–16) के आँकड़े दर्शाते हैं कि 11% लड़कियों का प्रथम लैंगिक अनुभव 15 वर्ष से पूर्व तथा 39% का 18 वर्ष से पूर्व हुआ। इसके अतिरिक्त, एनफोल्ड अध्ययन द्वारा असम, महाराष्ट्र एवं पश्चिम बंगाल में वर्ष 2016–2020 के मध्य 2,764 लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण निर्णयों के विश्लेषण से यह निष्कर्ष निकला कि 24.3% मामलों में प्रेमपूर्ण संबंध शामिल थे, तथा 82% मामलों में अभियुक्त पीड़िता के परिचित या निकट संबंधी थे।
- एनफोल्ड प्रोजेक्ट 39क द्वारा किये गए एक अन्य अध्ययन में, उन्हीं राज्यों में लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण की धारा 6 (गुरुतर प्रवेशन लैंगिक हमला) के अधीन 264 मामलों में से 25.4% में सम्मति से बने संबंध सम्मिलित थे।
न्यायिक दृष्टिकोण
उच्चतम न्यायालय की टिप्पणियां:
- 10 जनवरी, 2026 को राज्य उत्तर प्रदेश बनाम अनुराधा एवं अन्य वाद में दिए गए निर्णय में उच्चतम न्यायालय ने सम्मति-आधारित किशोर संबंधों में लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम के दुरुपयोग को स्वीकार किया तथा विधायी पुनरावलोकन की आवश्यकता पर बल दिया।
- उल्लेखनीय रूप से, 20 अगस्त, 2024 को उच्चतम न्यायालय ने कोलकाता उच्च न्यायालय के उस विवादास्पद निर्णय को निरस्त कर दिया, जिसमें 14 वर्षीया बालिका से संबंधित लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण मामले में अभियुक्त को दोषमुक्त कर दिया गया था, और यह पुनः स्पष्ट किया कि लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम अवयस्कों के साथ “सम्मति से लैंगिक संबंध” को मान्यता नहीं देता। तथापि, बाद में अनुच्छेद 142 (असाधारण अधिकारिता) का प्रयोग करते हुए, न्यायालय ने दोषसिद्धि के होते हुए भी दण्डादेश देने से इंकार किया। न्यायालय ने यह तथ्य संज्ञान में लिया कि बालिका ने उक्त घटना को अपराध के रूप में नहीं देखा था तथा अभियुक्त को दीर्घकालीन न्यायिक अभिरक्षा के कारण प्रतिकूल परिणाम भुगतने पड़े थे। न्यायालय ने आत्मालोचनात्मक टिप्पणी करते हुए यह भी स्पष्ट किया कि उक्त निर्णय को किसी प्रकार का पूर्व निर्णय नहीं माना चाहिये।
- इसके पश्चात्, 19 अगस्त, 2025 को उच्चतम न्यायालय में एक मामले की सुनवाई के दौरान, माननीय न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने यह प्रश्न उठाया कि वयस्कता की दहलीज पर खड़े व्यक्तियों के मध्य संबंधों को क्या भिन्न दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिये। उन्होंने यह टिप्पणी की—“लड़की ने जिस मानसिक आघात का सामना किया है, उसे देखिये। वह एक लड़के से प्रेम करती है और उसे जेल भेज दिया जाता है, क्योंकि उसके माता-पिता पलायन को छिपाने हेतु लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण का मामला दर्ज कर देते हैं।”
उच्च न्यायालय की टिप्पणियां:
- बॉम्बे उच्च न्यायालय ने अदसित रामजैत अंसारी बनाम महाराष्ट्र राज्य (2023) के मामले में यह निर्णय दिया कि यौन स्वायत्तता में "लैंगिक आक्रमण से मुक्ति का अधिकार" और "लैंगिक आक्रमण से सुरक्षा का अधिकार" दोनों सम्मिलित हैं और दोनों की मान्यता ही मानवीय लैंगिक गरिमा के सम्मान के लिये आवश्यक है।
- यद्यपि, मोहम्मद रफीकुल अली बनाम दिल्ली राज्य के मामले में, दिल्ली उच्च न्यायालय ने यह दावा किया कि जब पीड़ित अवयस्क होता है तो लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण के अधीन "सम्मति विधक रूप से अप्रासंगिक होती है"।
अंतर्राष्ट्रीय तुलनात्मक दृष्टि
- अधिवक्ताओं ने अधिक क्रमिक दृष्टिकोण का प्रस्ताव दिया है, जो 16 वर्ष से अधिक आयु के लोगों की सम्मति का सम्मान करते हुए प्रपीड़न, शोषण या प्राधिकार के दुरुपयोग के विरुद्ध सुरक्षा उपायों को सुनिश्चित करता है।
- वे विमर्श को व्यापक अपराधीकरण से हटाकर शिक्षा, लैंगिक शिक्षा, संबंधों तथा सम्मति पर खुले संवाद की दिशा में ले जाने की आवश्यकता पर बल देते हैं, क्योंकि सर्वव्यापी अपराधीकरण प्रायः दुरुपयोग को जन्म देता है।
- कई पश्चिमी लोकतांत्रिक देशों में सम्मति की आयु 16 वर्ष है, जिसमें प्रपीड़न और दुर्व्यवहार से बचाव के लिये सुरक्षा उपाय विद्यमान हैं। जर्मनी, इटली और पुर्तगाल जैसे देश "आयु में निकटता" के आधार पर छूट या "रोमियो-जूलियट प्रावधान" को मान्यता देते हैं, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि परस्पर सहमति से संबंध रखने वाले किशोरों को, जिनके बीच आयु का अंतर न्यूनतम हो, आपराधिक दायित्त्व के अंतर्गत न लाया जाए।
सम्मति की आयु कम करने के विरुद्ध चिंताएँ
- तथापि, सहमति की आयु को बनाए रखने के पक्ष में गंभीर एवं यथार्थपरक चिंताएँ विद्यमान हैं। अनेक विद्वानों एवं नीति-निर्माताओं का मत है कि सहमति की आयु को कम करने से प्रतिरोधक विधिक ढाँचा कमजोर पड़ सकता है, जिससे मानव दुर्व्यापार एवं लैंगिक शोषण जैसे अपराध “सम्मति” के आवरण में संरक्षण प्राप्त कर सकते हैं।
- वर्तमान "स्पष्ट नियम" – जिसके अनुसार 18 वर्ष से कम आयु के सभी व्यक्ति लैंगिक क्रियाकलापों के लिये सम्मति देने में असमर्थ माने जाते हैं – बालकों को लैंगिक शोषण से बचाने के लिये एक स्पष्ट सुरक्षा कवच बनाने के विधायी आशय को दर्शाता है। यह नियम व्यक्तिपरक निर्णयों से बचता है और उनकी जगह एक वस्तुनिष्ठ, सुसंगत मानक स्थापित करता है।
- सम्मति की आयु कम करने के विरोध में खड़े लोग किशोरों के बीच सम्मति से बने संबंधों से जुड़े कुछ मामलों में "आयु में निकटता के आधार पर छूट" या "न्यायिक विवेकाधिकार" के प्रस्तावों को स्वीकार करते हैं, लेकिन वे ऐसे अपवादों को विधि में संहिताबद्ध करने के विरुद्ध चेतावनी देते हैं।
- इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि बाल शोषण प्राय: परिवार के सदस्यों, पड़ोसियों, शिक्षकों और देखरेख करने वालों जैसे भरोसेमंद व्यक्तियों द्वारा किया जाता है; महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा 2007 में किये गए एक अध्ययन में पाया गया कि 50% से अधिक बालक लैंगिक शोषण का शिकार हुए। ऐसे मामलों में, बालकों में अक्सर भावनात्मक स्वतंत्रता या दुर्व्यवहार का विरोध करने या उसकी रिपोर्ट करने की क्षमता की कमी होती है, जिससे सम्मति का कोई भी दावा अर्थहीन हो जाता है। विधि के संरक्षण को शिथिल करना न केवल बलप्रयोग को वैधता प्रदान करेगा, अपितु परिवादों के प्रकटीकरण को भी दबाएगा तथा लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम के उस विधायी आशय के विपरीत होगा, जिसका उद्देश्य बालकों के सर्वोत्तम हितों का संरक्षण करना है।
- आयु सीमा कम करने से छोटे बच्चों को भावनात्मक परिपक्वता के अभाव में ही लैंगिक क्रियाकलापों में शामिल होने के लिये प्रोत्साहित करने का जोखिम भी होगा, क्योंकि उनमें इसके परिणामों को समझने की क्षमता नहीं होगी।
संसदीय एवं विधि आयोग की स्थिति
- संसद ने सम्मति की आयु कम करने के प्रस्तावों को लगातार नामंजूर किया है।
- न्यायमूर्ति वर्मा समिति ने भारतीय दण्ड संहिता की धारा 375 के अधीन इसे 16 वर्ष रखने की सिफारिश की थी, परंतु संसद ने लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण विधायी आशय के अधीन इसे बढ़ाकर 18 वर्ष करने का विकल्प चुना। मानव संसाधन विकास पर संसदीय स्थायी समिति की 240वीं रिपोर्ट (2011) ने लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण विधेयक में अवयस्क की सम्मति को मान्यता देने से इंकार कर दिया, यह कहते हुए कि सम्मति या परिपक्वता विधिक रूप से अप्रासंगिक है। इसी प्रकार, राज्यसभा की गृह मामलों से संबंधित स्थायी समिति (2012) ने आयु को बढ़ाकर 18 वर्ष करने का समर्थन किया और किसी भी "आयु में निकटता" छूट का विरोध किया।
- हाल ही में, भारतीय विधि आयोग (2024) ने भी स्पष्ट रूप से चेतावनी दी है कि सम्मति की आयु कम करने से लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण एक "कागजी विधि" बन जाएगा, जिससे बाल विवाह, वेश्यावृत्ति और दुर्व्यापार से निपटने के प्रयासों को नुकसान होगा।
किशोर संबंधों पर न्यायालयों के निर्णय
- समय-समय पर न्यायालयों के समक्ष यह कठिन दायित्व उपस्थित हुआ है कि वे विधि के अक्षर (letter of the law) को बनाए रखते हुए यह भी स्वीकार करें कि उसका कठोर अनुप्रयोग, कुछ मामलों में, उन्हीं व्यक्तियों को वास्तविक क्षति पहुँचा सकता है, जिनके संरक्षण के लिए वह बनाई गई है। राज्य बनाम आर.के. (2020) मामले में, मद्रास उच्च न्यायालय ने यह अभिमत व्यक्त किया कि—“समाज एवं विधि में किशोर प्रेम के प्रति दृष्टिकोण ऐसा होना चाहिये जो युवाओं के उन अधिकारों पर बल दे, जिनके अंतर्गत वे शोषण एवं दुरुपयोग से मुक्त रहते हुए प्रेमपूर्ण संबंध स्थापित कर सकें।"
- विधि का विकास इस प्रकार होना चाहिये कि वह ऐसे संबंधों को, जब तक वे परस्पर सम्मति पर आधारित हों और किसी प्रकार के बलप्रयोग से रहित हों, स्वीकार एवं सम्मान प्रदान करे।
आगे की राह
यद्यपि सहमति की आयु को घटाने अथवा संशोधित करने की अधिकारिता संसद के अंतर्गत आती है, तथापि न्यायपालिका विधिक व्याख्या के इस विभाजन—जहाँ एक ओर सांविधिक ढाँचा है और दूसरी ओर जीवनगत वास्तविकताएँ—पर मार्गदर्शन प्रदान कर सकती है, जिससे अन्वेषण अभिकरणों एवं अधीनस्थ न्यायालयों के लिये एकरूपता सुनिश्चित हो सके। इसके अतिरिक्त, केवल विधि ही किशोर लैंगिकता की जटिल और बहुआयामी वास्तविकताओं का समाधान नहीं कर सकती। इसके बजाय, हमें एक समग्र दृष्टिकोण की आवश्यकता है जिसमें व्यापक यौन शिक्षा तक पहुँच, युवाओं की स्वायत्तता का सम्मान, सुलभ यौन और प्रजनन स्वास्थ्य सेवाएँ, विधिक प्रवर्तन का प्रासंगिक अनुप्रयोग और सबसे बढ़कर, एक ऐसा सामाजिक तंत्र शामिल हो जो किशोरों, विशेषत: लड़कियों को, उनके परिवारों के साथ मतभेद होने पर सहायता प्रदान करे।
एक व्यापक कटौती के बजाय, जिससे सम्मति की आड़ में प्रपीड़न करने वाले अपराधियों को बढ़ावा मिल सकता है, हमें एक व्यावहारिक मध्य मार्ग की आवश्यकता है: 18 वर्ष की आयु सीमा को बरकरार रखते हुए, 16-18 वर्ष के किशोरों को 3-4 वर्ष के अंतराल में छूट दी जाए, साथ ही किसी भी प्रकार की अनियमितता का पता लगाने के लिये अनिवार्य न्यायिक समीक्षा की जाए, और स्कूलों में शारीरिक स्वायत्तता, सम्मति और भावनात्मक लचीलेपन पर आधारित कार्यक्रमों को बढ़ाया जाए। इस तरह, हम सुरक्षा उपायों को कमजोर कि बिना किशोरों की स्वायत्तता का सम्मान करते हैं, और एक ऐसा ढाँचा तैयार करते हैं जहाँ बालक सुरक्षित रूप से प्रेम को समझना सीखते हैं, जिससे विधि का दुरुपयोग कम होता है और एक अधिक सहानुभूतिपूर्ण समाज का निर्माण होता है।