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सांविधानिक विधि

दिल्ली बल्वा मामले में जमानत की पेचीदगी: विधिविरुद्ध क्रियाकलाप निवारण अधिनियम के अधीन स्वतंत्रता बनाम सुरक्षा

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 05-Jan-2026

स्रोत:द हिंदू 

परिचय 

जनवरी 2026 कोउच्च्च्तम न्यायालय ने 2020 के दिल्ली बल्वा के व्यापक षड्यंत्र मामले में विभाजित निर्णय दियाजिसमें कार्यकर्त्ता उमर खालिद और शरजील इमाम कीजमानत याचिका खारिज कर दी गईजबकि पाँच सह-अहियुक्त को अनुतोष दिया गया। विचारण के बिना के पाँच वर्ष से अधिक समय तक कारावास में रहने के बादयह निर्णय भारत के कड़े आतंकवाद-विरोधी विधिविधिविरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम, 1967 (UAPA) के अधीन व्यक्तिगत स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच चल रहे तनाव को स्पष्ट करता है। 

  • नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के विरोध में हुए प्रदर्शनों के दौरान फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए बल्वा में 53 लोग मारे गए और 700 से अधिक लोग घायल हुए। विधिविरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम के अधीन अभियोजन भारतीय न्यायालयों के लिये एक कसौटी बन गया है कि वे राष्ट्रीय सुरक्षा के खतरों से निपटने के लिये बनाई गई विशेष विधियों के साथ सांविधानिक प्रत्याभूतियों को कैसे संतुलित करती हैं।  

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

उच्चतम न्यायालय का निर्णय: 

  • उच्चतम न्यायालय ने व्यक्तिगत दृष्टिकोण अपनाते हुएअभियुक्त की कथित भूमिकाओं के आधार पर उनमें अंतर किया। 
  • खालिद और इमाम के लियेन्यायालय ने निर्णय दिया कि अभियोजन सामग्री ने विधिविरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम की धारा 43 (5) के अधीन जमानत पर सांविधिक रोक को आकर्षित करने के लिये पर्याप्त प्रथम दृष्टया आरोप प्रकट किये 
  • पीठ ने पाया कि उनकी भूमिका "षड्यंत्र में केंद्रीय" थीजिसमें "योजना बनानालामबंदी करना और रणनीतिक दिशा देना" सम्मिलित था। 
  • यद्यपिन्यायालय ने स्पष्ट किया कि संरक्षित साक्षियों की परीक्षा के बाद या एक वर्ष बाद दोनों नए सिरे से जमानत याचिका दायर कर सकते हैंऔर पुनर्विचार का रास्ता खुला रखा। अन्य पाँच लोगों - गुलफिशा फातिमामीरान हैदरशिफा उर रहमानमोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद - को जमानत दी गईलेकिन न्यायालय ने उनकी दीर्घकालिक निरुद्धि को स्वीकार करते हुए उन पर 12 कठोर शर्तें अधिरोपित की 
  • महत्त्वपूर्ण रूप सेन्यायालय ने देखा कि विधिविरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम के अधीन विचारण में विलंब एक "ट्रम्प कार्ड" के रूप में काम नहीं करता है जो स्वचालित रूप से सांविधिक सुरक्षा उपायों को विस्थापित कर देती हैलेकिन धारा 43 (5) न्यायिक जांच को पूरी तरह से रोकती भी नहीं है। 

दिल्ली उच्च न्यायालय का रुख: 

  • उच्चतम न्यायालय का यह निर्णय 2 सितंबर, 2025 को दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा सभी अभियुक की जमानत याचिका खारिज करने के निर्णय के विरुद्ध आया है। 
  • न्यायमूर्ति नवीन चावला और न्यायमूर्ति शालिंदर कौर ने अभियोजन पक्ष के इस तर्क को स्वीकार किया कि दंगे स्वतःस्फूर्त हिंसा के बजाय "सुनियोजितसुनियोजित षड्यंत्र" थे। 
  • उच्च न्यायालय ने व्यापक साक्ष्य—लगभग 3,000 पृष्ठों की आरोपपत्र (चार्जशीट) तथा 30,000 पृष्ठों के इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख—का संदर्भ लेते हुए यह निष्कर्ष निकाला कि विचारण “स्वाभाविक गति से प्रगति कर रहा है।” इससे पूर्वअक्टूबर 2022 मेंदिल्ली उच्च न्यायालय ने भी पूर्व नियोजित षड्यंत्र के प्रारंभिक साक्ष्य पाए जाने पर खालिद की जमानत याचिका खारिज कर दी थी।  

घटनाओं का क्रम 

तारीख 

आयोजन 

जनवरी 2020 

शरजील इमाम को 28 जनवरी को कथित तौर पर सड़क जाम करने का आह्वान करने वाले भाषणों के आधार पर गिरफ्तार किया गया था। 

फरवरी 2020 

नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के विरोध-प्रदर्शनों के दौरान उत्तर-पूर्वी दिल्ली में बल्वा भड़के; 53 व्यक्तियों की मृत्यु हुई तथा 700 से अधिक लोग घायल हुए। 

सितंबर 2020 

13 सितंबर को उमर ख़ालिद की गिरफ्तारी की गईउन पर UAPA एवं भारतीय दण्ड संहिता के अंतर्गत षड्यंत्र के आरोप लगाए गए।  

मार्च 2021 

सेशन न्यायालय द्वारा राजद्रोह के आरोप जोड़े गएउमर ख़ालिद को एक पृथक् मामले में जमानत प्रदान की गईकिंतु प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) संख्या 59/2020 के कारण वे न्यायिक अभिरक्षा में बने रहे। 

मार्च 2022 

दिल्ली सत्र न्यायालय ने पूर्वनियोजित षड्यंत्र का उल्लेख करते हुए जमानत याचिका अस्वीकृत कर दी।  

अप्रैल–अक्टूबर 2022 

दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा जमानत अपीलों पर विस्तृत एवं दीर्घ सुनवाई की गई।  

अक्टूबर 2022 

दिल्ली उच्च न्यायालय ने उमर ख़ालिद एवं शरजील इमामदोनों की जमानत याचिकाएँ निरस्त कर दीं।  

दिसंबर 2022 

उमर ख़ालिद को बहन के विवाह हेतु एक सप्ताह की अंतरिम जमानत प्रदान की गईसाथ ही गैग ऑर्डर आरोपित किया गयाइसी अवधि में उन्हें पथराव से संबंधित एक पृथक् मामले में दोषमुक्त भी किया गया। 

वर्ष 2023–2024 

उच्चतम न्यायालय में कई बार सुनवाई स्थगित हुईयाचिका को UAPA की सांविधानिक वैधता को चुनौती देने वाले मामलों के साथ संलग्न किया गयावर्ष 2023 में कोई ठोस सुनवाई नहीं हुई। 

फरवरी 2024 

खालिद ने विचारण न्यायालय जाने के लिये उच्चतम न्यायालय की याचिका वापस ले ली। 

मई 2024 

शाहदरा सेशन न्यायालय ने नवीन जमानत आवेदन को नामंजूर कर दिया। 

दिसंबर 2024–जुलाई 2025 

न्यायमूर्ति नवीन चावला एवं न्यायमूर्ति शालिंदर कौर की पीठ के समक्ष दिल्ली उच्च न्यायालय में पुनः सुनवाई हुई। 

सितंबर 2025 

दिल्ली उच्च न्यायालय ने सभी अभियुक्तों की जमानत याचिकाएँ निरस्त कर दीं। 

अक्टूबर–दिसंबर 2025 

उच्चतम न्यायालय में दोनों पक्षकारों के वरिष्ठ अधिवक्ताओं के साथ अहम सुनवाई करता है। 

10 दिसंबर 2025 

उच्चतम न्यायालय ने निर्णय सुरक्षित रख लिया। 

जनवरी 2026 

उच्चतम न्यायालय ने उमर ख़ालिद एवं शरजील इमाम को जमानत देने से इंकार कियाजबकि पाँच सह-अभियुक्तों को जमानत प्रदान की गई। 

 विधिविरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम, 1967 (UAPA) क्या है? 

बारे में: 

  • विधिविरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम, 1967 को व्यक्तियों और संगठनों की कुछ विधिविरुद्ध क्रियाकलाप की अधिक प्रभावी निवारणआतंकवादी क्रियाकलाप से निपटने और संबंधित मामलों के लिये अधिनियमित किया गया था।  
  • मूल रूप से, "विधिविरुद्ध क्रियाकलाप" से तात्पर्य उन कार्यों से था जो अलगाववाद का समर्थन करते थे या भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता पर प्रश्न उठाते थे। 
  • यह अधिनियम राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (NIA) को देशभर में मामलों के अन्वेषण और अभियोजन चलाने का अधिकार देता है। 

प्रमुख संशोधन: 

विधिविरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम में कई संशोधन किये गए जिससे इसका दायरा बढ़ गया: 

  • 2004 का संशोधन: अलगाव से संबंधित विधिविरुद्ध क्रियाकलाप के अतिरिक्त अपराधों की सूची में "आतंकवादी कृत्य" को जोड़ा गया।  
  • 2008 का संशोधन: आतंकवादी वित्तपोषण से संबंधित प्रावधानों का विस्तार किया गया। 
  • 2012 का संशोधन: साइबर आतंकवाद और संपत्ति ज़ब्ती तंत्रों को संबोधित किया गया। 
  • 2019 का संशोधन: सरकार को व्यक्तियों को आतंकवादी घोषित करने का अधिकार दिया गया (पहले केवल संगठनों को ही आतंकवादी घोषित किया जा सकता था)  

प्रमुख प्रावधान: 

  • सरकारी शक्तियां: केंद्र सरकार को राजपत्र में नोटिस प्रकाशित करके किसी भी क्रियाकलाप को विधिविरुद्ध घोषित करने का पूर्ण अधिकार है। 
  • अन्वेषण की समयसीमाअन्वेषण अभिकरण गिरफ्तारी के बाद अधिकतम 180 दिनों के भीतर आरोप पत्र दाखिल कर सकती हैन्यायालय को सूचित करने के बाद समयसीमा बढ़ाई जा सकती है। 
  • क्षेत्राधिकार से बाहर लागू होना: भारतीय और विदेशी दोनों नागरिकों पर आरोप लगाया जा सकता हैयह तब भी लागू होता है जब अपराध भारत के बाहर किया गया हो। 
  • दण्ड: अधिनियम में मृत्युदण्ड और आजीवन कारावास को अधिकतम दण्ड के रूप में निर्धारित किया गया है। 
  • जमानत निर्बंधन : धारा 43 (5) कठोर जमानत शर्तें बनाती हैजिसके अधीन न्यायालयों को जमानत देने से पहले यह मानना ​​पड़ता है कि आरोप प्रथम दृष्टया सत्य नहीं हैं - जमानत के पक्ष में सामान्य उपधारणा को उलटते हुए। 

विधिविरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम और जमानत से संबंधित निर्णय: 

  • अरुप भुयान बनाम असम राज्य (2011): उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि किसी प्रतिबंधित संगठन की मात्र सदस्यता किसी व्यक्ति को तब तक अपराधी नहीं बनाएगी जब तक कि वह हिंसा का सहारा न लेहिंसा को उकसाए या अव्यवस्था उत्पन्न न करे। यद्यपि, 2023 में न्यायालय ने इस स्थिति को पलटते हुए निर्णय दिया कि प्रत्यक्ष हिंसा के बिना भी केवल सदस्यता को ही अपराध माना जा सकता है।  
  • पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2004): न्यायालय ने निर्णय दिया कि यदि आतंकवाद से निपटने में मानवाधिकारों का उल्लंघन होता हैतो यह प्रयास असफल हो जाएगा। निर्णय में इस बात पर बल दिया गया कि एक पूर्व पुलिस अधिकारी राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में नियुक्ति के लिये उपयुक्त नहीं है। 
  • मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ (2018) : न्यायालय ने पुष्टि की कि सरकारी और संसदीय कार्रवाइयों के विरुद्ध विरोध प्रदर्शन वैध हैंबशर्ते वे शांतिपूर्ण और अहिंसक रहें। 
  • हुसैन और अन्य बनाम भारत संघ (2017): न्यायालय ने जमानत आवेदनों में तेजी लाने पर बल दियायह दोहराते हुए कि जमानत मानक होनी चाहिये और कारावास अपवाद। 
  • एन.आई.ए .बनाम ज़हूर अहमद शाह वटाली (2019): उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि न्यायालयों को साक्ष्यों की गहराई से जांच नहीं करनी चाहियेअपितु विधिविरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम जमानत आवेदनों पर निर्णय करते समय राज्य द्वारा प्रस्तुत मामले पर विश्वास करना चाहिये - एक पूर्व निर्णय जिस पर खालिद और अन्य को जमानत देने से इंकार करने में काफी हद तक विश्वास किया गया था। 

निष्कर्ष 

जनवरी 2026 में उच्चतम न्यायालय का निर्णय मौलिक अधिकारों और सुरक्षा संबंधी अनिवार्यताओं के बीच सामंजस्य स्थापित करने के लिये न्यायपालिका के निरंतर संघर्ष को दर्शाता है। यद्यपि यह विभेदित दृष्टिकोण न्यायिक परिष्कार को प्रदर्शित करता हैफिर भी पाँच वर्षों से अधिक कारावास के बाद खालिद और इमाम को जमानत देने से इंकार करना इस बात पर गंभीर चिंता उत्पन्न करता है कि क्या स्वतंत्रता की कीमत पर सुरक्षा की ओर संतुलन बहुत अधिक झुक गया है। 

न्यायालय द्वारा यह स्पष्ट करना कि नई जमानत याचिकाएँ दायर की जा सकती हैंकुछ उम्मीद जगाता हैलेकिन इसका अर्थ यह भी है कि बिना विचारण के कई और महीने या वर्ष निरोध में बिताने पड़ सकते हैं। सांविधानिक मूल्यों और विधि के शासन पर गर्व करने वाले लोकतंत्र के लियेयह मामला इस बात की याद दिलाता है कि इन सिद्धांतों की असली परीक्षा इस बात में निहित है कि हम सबसे गंभीर अपराधों के अभियुक्त के साथ कैसा व्यवहार करते हैं।