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अंतर्राष्ट्रीय नियम
वेनेजुएला में अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप
«07-Jan-2026
स्रोत: द हिंदू
परिचय
वेनेजुएला में अमेरिकी सैन्य अभियान, जिसका कोडनेम ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व था, एक ऐसा निर्णायक मोड़ है जो 1945 के बाद की अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की नींव को चुनौती देता है। मुनरो सिद्धांत के पुनर्जीवित "ट्रम्प कोरोलरी" के अधीन राष्ट्रपति निकोलस मादुरो, उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस और वरिष्ठ अधिकारियों को गिरफ्तार करके, संयुक्त राज्य अमेरिका ने अंतरराष्ट्रीय विधि का घोर उल्लंघन किया है। कैरेबियन सागर में कथित वेनेजुएलाई ड्रग नौकाओं पर अमेरिकी सेना द्वारा किये गए कई अवैध हमलों के बाद की गई यह कार्रवाई संप्रभुता, बल प्रयोग, राष्ट्राध्यक्ष की प्रतिरक्षा और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के भविष्य के बारे में गंभीर प्रश्न उठाती है।
मुनरो सिद्धांत: 1823 से वर्तमान तक
- राष्ट्रपति जेम्स मुनरो द्वारा 1823 में प्रतिपादित मुनरो सिद्धांत ने तीन मुख्य सिद्धांतों को स्थापित किया: यूरोपीय शक्तियों को अमेरिका में नए उपनिवेश स्थापित नहीं करने चाहिये; पश्चिमी गोलार्ध के देशों को प्रभावित करने का कोई भी बाहरी प्रयास अमेरिका के प्रति शत्रुतापूर्ण माना जाएगा; और अमेरिका यूरोपीय मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा।
- 1904 के रूजवेल्ट कोरोलरी के माध्यम से इस सिद्धांत का महत्त्वपूर्ण विस्तार हुआ, जिसने अस्थिरता का सामना कर रहे लैटिन अमेरिकी देशों में "अंतर्राष्ट्रीय पुलिस शक्ति" का प्रयोग करने के अमेरिकी अधिकार पर बल दिया, जिससे यह सिद्धांत रक्षात्मक नीति से प्रत्यक्ष हस्तक्षेप के औचित्य में परिवर्तित हो गया।
- शीत युद्ध के दौरान, इस सिद्धांत का प्रयोग क्यूबा, मध्य अमेरिका और पूरे क्षेत्र में सोवियत प्रभाव का मुकाबला करने के लिये किया गया था। सोवियत संघ के पतन के बाद, अमेरिका द्वारा बहुपक्षवाद को अपनाने के कारण इसका उपयोग अपेक्षाकृत कम हो गया।
- यद्यपि, "ट्रम्प कोरोलरी" एकतरफा हस्तक्षेपवाद का जानबूझकर पुनरुद्धार है, जो अब यूरोपीय औपनिवेशिक शक्तियों के बजाय चीन, रूस और ईरान को लक्षित करता है, जो अमेरिकी हस्तक्षेपवाद में एक तीव्र वृद्धि का संकेत देता है।
अंतर्राष्ट्रीय विधि का उल्लंघन
संयुक्त राष्ट्र चार्टर में बल प्रयोग पर प्रतिबंध:
- यह सर्वविदित है कि संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 2(4) अंतरराष्ट्रीय संबंधों में बल प्रयोग को प्रतिबंधित करता है। जैसा कि ऊना हैथवे और स्कॉट शापिरो जैसे विद्वानों का तर्क है, इस प्रतिषेध ने युद्ध को विधिविरुद्ध घोषित कर दिया और अंतरराष्ट्रीय विधि को मौलिक रूप से नया रूप दिया, जिससे आक्रामक युद्ध विवादों के निपटारे का एक अवैध साधन बन गया। अनुच्छेद 2(4) केवल दो सीमित अपवादों की अनुमति देता है: अनुच्छेद 51 के अधीन आत्मरक्षा में बल का प्रयोग किया जा सकता है—केवल सशस्त्र हमले के जवाब में, आवश्यकता और आनुपातिकता के अधीन—या अनुच्छेद 24 और 25 के अधीन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्राधिकरण के साथ। इनमें से कोई भी अपवाद वेनेजुएला के मामले पर लागू नहीं होता है।
- यद्यपि, इनमें से कोई भी औचित्य—भले ही तथ्यात्मक रूप से सही हो—विधिक रूप से किसी संप्रभु राज्य के विरुद्ध बल प्रयोग की अनुमति नहीं देता। किसी विदेशी नागरिक को, विशेषकर किसी राष्ट्राध्यक्ष को, विदेशी धरती पर बिना वास्तविक राज्य की सहमति या विधिक प्रक्रियाओं के बंदी बनाना और उसे घरेलू न्यायालय के समक्ष पेश करना, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक कुकर्म है जो खुले साम्राज्यवाद की याद दिलाता है।
राष्ट्राध्यक्ष की प्रतिरक्षा:
- यह मामला राष्ट्रपति मादुरो की स्थिति से संबंधित मत्त्वपूर्ण विधिक विवाद्यक उठाता है। जैसा कि अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय ने गिरफ्तारी वारण्ट मामले (कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य बनाम बेल्जियम) में कहा था, राष्ट्राध्यक्षों को विदेशी आपराधिक न्यायालयों से अभेद्यता और व्यक्तिगत प्रतिरक्षा प्राप्त होती है। तदनुसार, अमेरिकी न्यायालयों के पास राष्ट्रपति मादुरो पर उनके आधिकारिक पद पर रहते हुए कथित गतिविधियों के लिये मुकदमा चलाने की अधिकारिता नहीं है।
- यह तर्क कि कथित धांधलीपूर्ण चुनावों के कारण मादुरो वैध राष्ट्रपति नहीं हैं, अथवा यह कि संयुक्त राज्य अमेरिका उन्हें मान्यता नहीं देता, अंतरराष्ट्रीय विधि के अंतर्गत कोई महत्त्व नहीं रखता। निर्णायक कसौटी प्रभावी नियंत्रण की होती है। मादुरो प्रशासन ने वेनेज़ुएला के क्षेत्र पर प्रभावी नियंत्रण का प्रयोग किया, जिससे उन्हें राष्ट्राध्यक्ष की प्रतिरक्षा का अधिकार प्राप्त होता है। इसके विपरीत दृष्टिकोण अपनाना राज्यों को व्यक्तिपरक मानदंडों के आधार पर प्रतिरक्षा से इंकार करने की छूट प्रदान करेगा, जिससे अंतरराष्ट्रीय विधिक व्यवस्था में गंभीर अव्यवस्था उत्पन्न होगी तथा संयुक्त राष्ट्र चार्टर में निहित संप्रभु समानता के सिद्धांतों का उल्लंघन होगा।
हस्तक्षेप हेतु अमेरिकी प्रेरणाएँ
नार्को-आतंकवाद की कहानी:
- अमेरिका ने मादुरो पर नशीले पदार्थों से जुड़े आतंकवाद और मादक पदार्थों की तस्करी का आरोप लगाया, और वेनेजुएला सरकार को अमेरिकी फेंटानिल संकट से जोड़ा। इस बयान ने विधिक-राजनीतिक औचित्य प्रदान किया, और इस अभियान को सत्ता परिवर्तन के बजाय विधि प्रवर्तन के रूप में प्रस्तुत किया।
ऊर्जा भू-राजनीति:
- वेनेज़ुएला के पास विश्व का सर्वाधिक सिद्ध कच्चे तेल का भंडार है—300 अरब बैरल से अधिक, जो वैश्विक सिद्ध भंडार का लगभग एक-पाँचवाँ हिस्सा है—फिर भी प्रतिबंधों, आर्थिक संकट तथा अवसंरचना के क्षरण के कारण उसका वैश्विक उत्पादन में योगदान एक प्रतिशत से भी कम है। संयुक्त राज्य अमेरिका वेनेज़ुएलाई तेल पर नियंत्रण को ऊर्जा सुरक्षा, मूल्य स्थिरता तथा वैश्विक ऊर्जा बाज़ारों में रणनीतिक प्रभाव बनाए रखने के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण मानता है।
बाह्य क्षेत्रीय शक्तियों का मुकाबला करना:
- चीन, रूस एवं ईरान के साथ वेनेज़ुएला के गहराते संबंध—जिनमें चीनी अवसंरचनात्मक निवेश, रूसी सैन्य उपकरण तथा ईरानी ईंधन आपूर्ति सम्मिलित हैं—ने पश्चिमी गोलार्द्ध में अमेरिकी वर्चस्व को मौलिक रूप से चुनौती दी। इसके परिणामस्वरूप वॉशिंगटन ने प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई के माध्यम से अपना प्रभुत्व पुनः स्थापित करने का प्रयास किया। यह हस्तक्षेप अन्य क्षेत्रीय राज्यों के लिये भी एक संकेत के रूप में कार्य करता है कि अमेरिकी प्रतिद्वंद्वियों के साथ गठजोड़ के क्या परिणाम हो सकते हैं।
भारत और वैश्विक दक्षिण के लिये निहितार्थ
सीमित आर्थिक प्रभाव:
- ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव के अनुसार, इस संघर्ष का भारत के व्यापार पर नगण्य प्रभाव पड़ेगा, क्योंकि प्रतिबंधों के चलते द्विपक्षीय व्यापार पहले ही ठप हो चुका है। वित्त वर्ष 2025 में वेनेजुएला को भारत का निर्यात मात्र 95.3 मिलियन अमेरिकी डॉलर रहा, जबकि कच्चे तेल का आयात 81.3 प्रतिशत गिरकर 255.3 मिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया। यद्यपि, यदि अंततः प्रतिबंधों में ढील दी जाती है, तो रियायती दरों पर मिलने वाला वेनेजुएला का कच्चा तेल बाजारों में फिर से प्रवेश कर सकता है, जिससे पश्चिम एशियाई आपूर्तिकर्ताओं के साथ भारत की आपूर्ति विविधता और सौदेबाजी की शक्ति मजबूत होगी।
रणनीतिक स्वायत्तता से जुड़ी चुनौतियाँ:
- भारत ने सदैव हस्तक्षेप न करने की नीति और बाहरी सैन्य बल के बजाय लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के माध्यम से सत्ता परिवर्तन की वकालत की है। अमेरिका की इस कार्रवाई से वैश्विक दक्षिण (जो इस तरह के हस्तक्षेप का विरोध करता है) और वाशिंगटन के साथ भारत की रणनीतिक भागीदारी के बीच कूटनीतिक संतुलन बनाना काफी जटिल हो गया है। भारत ने संप्रभु समानता पर आधारित बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था को बढ़ावा देने में काफी पूँजी निवेश की है, ऐसे में वेनेजुएला का हस्तक्षेप एक चिंताजनक उदाहरण प्रस्तुत करता है जो यह दर्शाता है कि शक्तिशाली देश भविष्य में एकतरफा कार्रवाई का सहारा ले सकते हैं।
अंतर्राष्ट्रीय विधि को सुदृढ़ बनाना
अनुपालन संकट:
- सार्वजनिक अंतरराष्ट्रीय विधि के विद्वान मार्को मिलोनेविच के अनुसार, समस्या विधि की सारभूत सामग्री में नहीं, अपितु उसके अनुपालन के प्रति प्रतिबद्धता के पूर्ण अभाव में निहित है।
- उदार लोकतंत्र माने जाने वाले देशों सहित अन्य देशों में सत्तावादी शासन व्यवस्थाओं के तेजी से उदय का अर्थ है कि सरकारें घरेलू या अंतरराष्ट्रीय विधि द्वारा निर्धारित प्रतिबंधों को मानने से इंकार कर रही हैं।
- घरेलू विधि के शासन के कमजोर होने से शक्ति को सीमित करने में अंतरराष्ट्रीय विधि की प्रभावशीलता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है।
आगे का राह:
- अंतर्राष्ट्रीय विधि के शासन को मजबूत करने के लिये, हमें साथ ही साथ घरेलू विधि के शासन और लोकतंत्र को भी मजबूत करना होगा।
- यद्यपि शक्तिशाली राष्ट्र अपने प्रभुत्व को कायम रखने के लिये अंतरराष्ट्रीय विधि का प्रयोग करते हैं, लेकिन इसके कई तत्त्व—विशेष रूप से अनुच्छेद 2(4)—सत्तावाद के विपरीत हैं। सत्तावादी शासन इन मानदंडों पर हमला करते रहेंगे और अंतरराष्ट्रीय विधि का उपहास करते रहेंगे। इसलिये, वैश्विक लोकतांत्रिक ताकतों को नए संकल्प के साथ एकजुट होकर इनका प्रतिरोध करना होगा।
- हाल के वर्षों में अंतरराष्ट्रीय विधि के घोर उल्लंघन की एक श्रृंखला के हिस्से के रूप में अमेरिकी कार्रवाइयाँ एक खतरनाक पूर्व निर्णय स्थापित करती हैं।
- व्यापक प्रश्न यह है कि क्या अंतरराष्ट्रीय समुदाय सामूहिक रूप से ऐसे उल्लंघनों का प्रतिरोध करेगा और संप्रभुता के सिद्धांतों की रक्षा करेगा, अथवा क्या यह हस्तक्षेप महाशक्ति-विशेषाधिकार (great power prerogative) के एक नवीन मानक को स्थापित करने में सफल होगा।
निष्कर्ष
वेनेजुएला में अमेरिकी हस्तक्षेप न केवल विशिष्ट विधिक प्रावधानों का उल्लंघन है, अपितु संप्रभु समानता, क्षेत्रीय अखंडता और आक्रामक युद्ध पर प्रतिबंध के आधार पर निर्मित 1945 के बाद की व्यवस्था के लिये एक मौलिक चुनौती भी है। अप्रचलित मुनरो सिद्धांत का आह्वान न केवल पश्चिमी गोलार्ध की संप्रभुता का अपमान है, अपितु तीसरी दुनिया के लोगों के साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्षों का भी अपमान है।
अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के लिये, विशेष रूप से वैश्विक दक्षिण के उन देशों के लिये जो ऐतिहासिक रूप से इस तरह के हस्तक्षेपों से पीड़ित रहे हैं, वेनेजुएला का मामला उन सिद्धांतों की एकीकृत रक्षा की मांग करता है जो सभी राज्यों को मनमानी शक्ति के प्रयोग से बचाते हैं।