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पर्यावरणीय विधि
उत्तर प्रदेश राज्य बनाम उदय शिक्षा एवं कल्याण ट्रस्ट (2022)
« »01-Jan-2026
परिचय
यह ऐतिहासिक निर्णय उत्तर प्रदेश में लकड़ी आधारित उद्योगों को दिये गए अस्थायी लाइसेंसों की वैधता से संबंधित है, जहाँ राष्ट्रीय हरित अधिकरण के समक्ष लकड़ी की उपलब्धता और पर्यावरणीय स्थिरता के बारे में चिंताएँ उठाई गई थीं।
- उच्चतम न्यायालय ने 2022 में यह निर्णय दिया, जिसमें पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास के बीच संतुलन बनाए रखते हुए पर्यावरणीय मामलों में वैज्ञानिक विशेषज्ञ आकलन पर विश्वास करने के महत्त्व पर बल दिया गया।
तथ्य
- उत्तर प्रदेश में 8 श्रेणियों में विभिन्न लकड़ी आधारित उद्योगों की स्थापना के लिये लाइसेंस प्रदान करने हेतु 12 दिसंबर, 2018 को एक ई-लॉटरी आयोजित की गई थी।
- 12 दिसंबर, 2018 और 31 दिसंबर, 2018 के बीच, लॉटरी प्रक्रिया के बाद 1,348 सफल आवेदकों को ऑनलाइन प्रस्ताव पत्र जारी किये गए।
- फरवरी और मार्च 2019 के दौरान, राज्य में लकड़ी आधारित उद्योग स्थापित करने के लिये 8 श्रेणियों में 1,215 सफल आवेदकों को अस्थायी लाइसेंस जारी किये गए।
- 1 मार्च, 2019 को उत्तर प्रदेश सरकार ने नव चयनित लकड़ी आधारित उद्योगों को अस्थायी लाइसेंस प्रदान करने की सूचना देते हुए एक नोटिस जारी किया।
- उदय एजुकेशन एंड वेलफेयर ट्रस्ट ने मार्च 2019 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण के समक्ष मूल आवेदन संख्या 313/2019 दायर कर इन लाइसेंसों के अनुदान को चुनौती दी थी।
- राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने 1 अक्टूबर, 2019 को यथास्थिति बनाए रखने का निदेश दिया और उसके बाद 18 फरवरी, 2020 को आवेदनों को स्वीकार करते हुए 1 मार्च, 2019 की सूचना के साथ-साथ सभी अस्थायी लाइसेंसों को रद्द कर दिया।
- उत्तर प्रदेश राज्य और अस्थायी लाइसेंस धारकों ने पुनर्विचार याचिकाएं दायर कीं, जिन्हें राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने 18 मार्च, 2020, 2 दिसंबर, 2020 और 21 दिसंबर, 2020 के आदेशों के माध्यम से नामंजूर कर दिया, जिसके कारण अपीलकर्त्ताओं ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया।
सम्मिलित विवाद्यक
- क्या राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने उत्तर प्रदेश में नए लकड़ी आधारित उद्योगों को बनाए रखने के लिये लकड़ी और कच्चे माल की उपलब्धता का सही आकलन किया था?
- क्या वन सर्वेक्षण विभाग द्वारा वन के बाहर के पेड़ों से लकड़ी की उपलब्धता के संबंध में किये गए वैज्ञानिक मूल्यांकन को खारिज करने में राष्ट्रीय हरित अधिकरण का निर्णय उचित था?
- क्या अधिकरण ने नए लकड़ी आधारित उद्योगों की स्थापना के पर्यावरणीय प्रभाव की परीक्षा करते समय सतत विकास के सिद्धांतों को उचित रूप से लागू किया?
- क्या संसाधनों की उपलब्धता और पर्यावरणीय आकलन से संबंधित तकनीकी मामलों में न्यायालयों को विशेषज्ञ वैज्ञानिक राय को प्राथमिकता देनी चाहिये?
न्यायालय की टिप्पणियां
- न्यायालय ने माना कि 2016 के दिशानिर्देशों के अनुसार, लकड़ी आधारित औद्योगिक इकाइयों के लिये लकड़ी की उपलब्धता का आकलन करने के कर्त्तव्य के साथ, उत्तर प्रदेश में 17 मई, 2017 को राज्य स्तरीय समिति का विधिवत पुनर्गठन किया गया था।
- न्यायालय ने यह स्वीकार किया कि भारतीय वन सर्वेक्षण ने उपग्रह डेटा का उपयोग करते हुए एक व्यापक सर्वेक्षण किया और मार्च 2018 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें 101 पृष्ठों के विस्तृत विश्लेषण में उचित वैज्ञानिक पद्धति का प्रयोग किया गया था।
- न्यायालय ने पाया कि राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI) द्वारा किये गए वैज्ञानिक अभ्यास को नजरअंदाज करने और वैज्ञानिक रूप से प्राप्त आंकड़ों को यथार्थवादी आकलन के बजाय मात्र अनुमान के रूप में गलत तरीके से प्रस्तुत करने में गलती की।
- न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि भारतीय वन सर्वेक्षण, एक निर्विवाद विशेषज्ञ निकाय के रूप में, वैज्ञानिक पद्धतियों के आधार पर अपने अनुमान पर पहुँचा था, और राष्ट्रीय हरित अधिकरण को विशेषज्ञ राय पर अपील नहीं करनी चाहिये थी।
- न्यायालय ने निर्णय दिया कि प्रतिबंधित पेड़ों से लकड़ी की उपलब्धता का अनुमान लगाने में राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने घोर त्रुटी की है, क्योंकि न्यायालयों को उन क्षेत्रों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये जो विशेषज्ञों की अधिकारिता में आते हैं।
- न्यायालय ने स्वीकार किया कि यद्यपि राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम की धारा 20 सतत विकास, एहतियाती सिद्धांत और प्रदूषणकारी भुगतान सिद्धांत के अनुप्रयोग का निदेश देती है, परंतु इन सिद्धांतों को एक दूसरे से अलग करके लागू नहीं किया जा सकता है।
- इस निर्णय में इस बात पर बल दिया गया कि पर्यावरण की रक्षा करते हुए, सतत विकास की आवश्यकता पर भी विचार किया जाना चाहिये और पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच उचित संतुलन स्थापित किया जाना चाहिये।
- न्यायालय ने यह स्वीकार किया कि वनों के बाहर के वृक्ष महत्त्वपूर्ण नवीकरणीय संसाधन हैं जो कृषि-पारिस्थितिकी, ग्रामीण क्षेत्रों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति, पर्यावरण सुधार में महत्त्वपूर्ण योगदान देते हैं और लकड़ी आधारित उद्योगों को कच्चा माल प्रदान करने के साथ-साथ नियोजन भी सृजित करते हैं।
निष्कर्ष
- यह ऐतिहासिक निर्णय इस बात को पुष्ट करता है कि न्यायिक निकायों को संसाधन उपलब्धता और पर्यावरणीय प्रभाव जैसे तकनीकी मामलों पर विशेषज्ञ वैज्ञानिक आकलन को प्राथमिकता देनी चाहिये और अपनी राय नहीं थोपनी चाहिये।
- उच्चतम न्यायालय ने अपीलों को स्वीकार करते हुए राष्ट्रीय हरित अधिकरण के आदेशों को अपास्त कर दिया और लकड़ी आधारित उद्योगों को लाइसेंस देने के राज्य सरकार के निर्णय को बरकरार रखा।
- इस निर्णय से यह स्थापित होता है कि सतत विकास, एहतियाती सिद्धांत और पर्यावरण संरक्षण सहित पर्यावरणीय सिद्धांतों को एक दूसरे से अलग-थलग करने के बजाय संतुलन में लागू किया जाना चाहिये।