होम / गर्भावस्था का चिकित्सीय समापन अधिनियम
आपराधिक कानून
सुश्री जेड बनाम बिहार राज्य और अन्य (2017)
«15-Jan-2026
परिचय
यह ऐतिहासिक निर्णय गर्भ का चिकित्सकीय समापन की मांग करने वाली बलात्कार पीड़ितों के सांविधानिक और सांविधिक अधिकारों को संबोधित करता है, गर्भ का चिकित्सकीय समापन अधिनियम, 1971 के अधीन सम्मति के उद्देश्यों के लिये मानसिक बीमारी और मानसिक मंदता के बीच अंतर स्थापित करता है, और राज्य के उस दायित्त्व की पुष्टि करता है जिसके अधीन प्रशासनिक उपेक्षा के कारण पीड़ित की प्रजनन स्वायत्तता और मानसिक स्वास्थ्य को अपरिवर्तनीय क्षति होने पर प्रतिकर प्रदान करना आवश्यक है।
तथ्य
- जेड नाम की पैंतीस वर्षीय बेसहारा महिला, जिसे उसके पति और परिवार ने छोड़ दिया था, पटना में फुटपाथ पर रह रही थी, जब उसे 25 जनवरी, 2017 को एक सरकारी आश्रय गृह, शांति कुटीर में लाया गया।
- चिकित्सा परीक्षा से पता चला कि वह गर्भवती थी। 8 फरवरी, 2017 को पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल (PMCH) में किये गए अल्ट्रासाउंड में पता चला कि वह 13 सप्ताह और 6 दिन की गर्भवती थी।
- 4 मार्च, 2017 को, सुश्री जेड ने गर्भावस्था को समाप्त करने की इच्छा व्यक्त की और प्रकटन किया कि उनके साथ बलात्कार हुआ था।
- भारतीय दण्ड संहिता की धारा 376 के अधीन 18 मार्च 2017 को प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज की गई थी। 14 मार्च 2017 को उसे गर्भसमापन के लिये को पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल (PMCH) ले जाया गया और उसके पिता और भाई को सम्मति पत्र पर हस्ताक्षर करने के लिये बुलाया गया। तथापि, उनकी सम्मति के होते हुए भी अस्पताल अधिकारियों ने गर्भसमापन की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ाई।
- 3 अप्रैल 2017 तक उनकी गर्भावस्था 20 सप्ताह की हो चुकी थी, परंतु गर्भसमापन नहीं कराया गया। सुश्री जेड HIV पॉजिटिव भी पाई गईं। को पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल (PMCH) में गर्भसमापन न करा पाने पर उन्होंने गर्भसमापन के निदेश प्राप्त करने के लिये पटना उच्च न्यायालय का रुख किया।
- उच्च न्यायालय ने पटना स्थित IGIMS में एक चिकित्सा बोर्ड का गठन किया, जिसने उसकी परीक्षा की और रिपोर्ट दी कि वह 20-24 सप्ताह की गर्भवती है और उसे हल्का मानसिक मंदता और सिज़ोफ्रेनिया है, परंतु वह मानसिक रूप से सचेत और जागरूक है। 26 अप्रैल, 2017 को उच्च न्यायालय ने गर्भसमापन की अनुमति देने से इंकार कर दिया, यह कहते हुए कि बलात्कार की घटना को पहले न बताने का उसका आचरण मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर क्षति का संकेत नहीं देता है।
- जेड ने उच्चतम न्यायालय में अपील की, जिसने नई दिल्ली के AIIMS में एक मेडिकल बोर्ड द्वारा परीक्षा की व्यवस्था की। AIIMS बोर्ड ने निष्कर्ष निकाला कि गर्भावस्था के उस उन्नत चरण (लगभग 25 सप्ताह) में गर्भसमापन कराना माता और भ्रूण दोनों के लिये जोखिम भरा था।
सम्मिलित विवाद्यक
- क्या अस्पताल अधिकारियों को बलात्कार पीड़िता और हल्के मानसिक मंदता से पीड़ित किसी वयस्क महिला की गर्भावस्था को समाप्त करने से पहले गर्भ का चिकित्सकीय समापन अधिनियम, 1971 के अधीन उसके पिता या पति से सम्मति प्राप्त करना आवश्यक है?
- क्या गर्भ का चिकित्सकीय समापन अधिनियम की धारा 3(4) के अधीन "मानसिक बीमारी" और "मानसिक मंदता" के बीच का अंतर यह निर्धारित करने में महत्त्वपूर्ण है कि किसकी सहमति आवश्यक है?
- क्या गर्भसमापन की प्रक्रिया में राज्य अस्पताल अधिकारियों द्वारा किये गए विलंब और उपेक्षा के कारण पीड़ित को सार्वजनिक विधि के अधीन प्रतिकर का अधिकार है?
- क्या व्यापक प्रक्रियात्मक औपचारिकताओं की आवश्यकता के संबंध में उच्च न्यायालय का दृष्टिकोण विधिक रूप से उचित और सांविधिक ढाँचे के प्रति संवेदनशील था?
न्यायालय की टिप्पणियां
- विधिक ढाँचा: न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि गर्भ का चिकित्सकीय समापन अधिनियम, 1971 को स्वास्थ्य, मानवीय (बलात्कार) और सुजनन संबंधी आधारों पर गर्भसमापन को उदार बनाने के लिये अधिनियमित किया गया था। धारा 3(2) 20 सप्ताह तक गर्भसमापन की अनुमति देती है, जब गर्भसमापन जारी रखने से शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर क्षति पहुँच सकती है। स्पष्टीकरण 1 एक सांविधिक उपधारणा स्थापित करता है कि बलात्कार के कारण होने वाली गर्भावस्था मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर क्षति पहुँचाती है।
- मानसिक बीमारी बनाम मानसिक मंदता: न्यायालय ने "मानसिक बीमारी" और "मानसिक मंदता" के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए कहा कि धारा 3(4)(क) के अधीन संरक्षक की सम्मति केवल अवयस्कों या मानसिक बीमारी से ग्रस्त व्यक्तियों के लिये आवश्यक है, मानसिक मंदता के लिये नहीं। सुचिता श्रीवास्तव बनाम चंडीगढ़ प्रशासन मामले पर विश्वास करते हुए न्यायालय ने पुष्टि की कि हल्की मानसिक मंदता से ग्रस्त व्यक्ति व्यक्तिगत स्वायत्तता बनाए रखते हैं और गर्भसमापन के लिये वैध सम्मति दे सकते हैं।
- अस्पताल की उपेक्षा: न्यायालय ने पाया कि सुश्री जेड ने स्पष्ट सम्मति दी थी, बलात्कार का आरोप लगाया था (जिससे सांविधिक उपधारणा लागू होती है), और उन्हें एक सरकारी आश्रय गृह द्वारा लाया गया था। अस्पताल अधिकारियों द्वारा पिता और पति की सम्मति प्राप्त करने पर बल देना विधिक रूप से अनुचित था और इसके कारण घातक विलंब हुआ। जब तक मामला उच्चतम न्यायालय पहुँचा, गर्भ का चिकित्सकीय समापन जोखिम भरा हो गया था, जिससे राज्य की उपेक्षा के कारण स्थिति अपरिवर्तनीय हो गई थी।
- उच्च न्यायालय की त्रुटियाँ: उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालय के दृष्टिकोण को "पूरी तरह से त्रुटिपूर्ण" और "संवेदनहीनता का पूर्ण अभाव" बताया। उच्च न्यायालय ने इसे गलत तरीके से प्रतिद्वंद्वी वाद के रूप में लिया, उन परिवार के सदस्यों को अनावश्यक रूप से पक्षकार बनाया जिन्होंने उसे छोड़ दिया था, और आघात संबंधी प्रतिक्रियाओं को गलत समझा। "राज्य के महत्त्वपूर्ण हित" पर बल देना गलत था, जबकि सांविधिक आवश्यकताओं को स्पष्ट रूप से पूरा किया गया था।
- सार्वजनिक विधि के अधीन प्रतिकर: न्यायालय ने माना कि जब राज्य के पदाधिकारी सांविधिक कर्त्तव्यों का पालन करने में असफल रहते हैं, जिससे मौलिक अधिकारों को गंभीर और अपरिवर्तनीय क्षति पहुँचती है, तो सार्वजनिक विधि के अधीन प्रतिकर देना उचित है। नीलाबती बेहरा और अन्य पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए, न्यायालय ने पुष्टि की कि मानसिक यातना का प्रभाव अक्सर शारीरिक यातना से कहीं अधिक गंभीर होता है।
- प्रजनन अधिकार: न्यायालय ने इस बात की पुष्टि की कि प्रजनन संबंधी विकल्प अनुच्छेद 21 के अंतर्गत व्यक्तिगत स्वतंत्रता का एक आयाम है। भारत के CEDAW दायित्त्वों को ध्यान में रखते हुए, न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि गर्भावस्था के मामलों में समय अत्यंत महत्त्वपूर्ण है—अस्पतालों को संवेदनशीलता और तत्परता के साथ कार्य करना चाहिये।
निर्णयाधार:
- जब बलात्कार पीड़िता कोई वयस्क महिला गर्भसमापन कराना चाहती है और उसे हल्का मानसिक विकार है (मानसिक रोग नहीं), तो गर्भ का चिकित्सकीय समापन अधिनियम की धारा 3 के अधीन उसकी अपनी सम्मति ही पर्याप्त है, और अस्पताल अधिकारियों को उसके संरक्षक, पिता या पति से सम्मति लेने की आवश्यकता नहीं है। बलात्कार से उत्पन्न गर्भावस्था को मानसिक स्वास्थ्य के लिये गंभीर क्षति मानना सांविधिक उपधारणा अनिवार्य है। जब राज्य अधिकारी सांविधिक अधिकार के होते हुए भी उपेक्षा से गर्भसमापन में विलंब करते हैं, जिससे अपरिवर्तनीय क्षति होती है, तो राज्य अनुच्छेद 21 के अधिकारों के उल्लंघन के लिये सार्वजनिक विधि के अधीन प्रतिकर के उत्तरदायी है।
निर्णय:
- उच्चतम न्यायालय ने अपील स्वीकार करते हुए उच्च न्यायालय के आदेश को अपास्त कर दिया। न्यायालय ने बिहार राज्य को सुश्री जेड को उपेक्षा और मानसिक क्षति के लिये प्रतिकर के रूप में 10,00,000 रुपए का संदाय करने का निदेश दिया, जिसे सावधि जमा में रखा जाएगा। यह राशि दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 357क के अधीन पहले से संदाय किये गए 3,00,000 रुपए के अतिरिक्त होगी। न्यायालय ने राज्य को नवजात शिशु को उचित उपचार, पोषण और चिकित्सा सहायता प्रदान करने का निदेश दिया और भविष्य में किसी भी शिकायत के लिये उच्च न्यायालय में जाने की स्वतंत्रता प्रदान की।
निष्कर्ष
यह निर्णय भारत में प्रजनन अधिकारों, विशेष रूप से कमजोर महिलाओं के लिये महत्त्वपूर्ण पूर्ण निर्णय स्थापित करता है। यह स्पष्ट करता है कि मानसिक मंदता गर्भ का चिकित्सकीय समापन अधिनियम के अधीन संरक्षक की सम्मति की आवश्यकता को लागू नहीं करती है, बलात्कार से उत्पन्न गर्भावस्था को गंभीर मानसिक क्षति मानने की सांविधिक उपधारणा को मजबूत करता है, और प्रशासनिक उपेक्षा के कारण संरक्षित प्रजनन विकल्प के अपरिवर्तनीय आघात में परिवर्तित होने पर राज्य को सार्वजनिक विधि के अधीन प्रतिकर के लिये जवाबदेह ठहराता है, इस बात पर बल देते हुए कि समय पर और संवेदनशील कार्रवाई आवश्यक है क्योंकि विलंब का हर दिन सांविधानिक अधिकारों को अपूरणीय क्षति पहुँचा सकता है।
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