एडमिशन ओपन: UP APO प्रिलिम्स + मेंस कोर्स 2025, बैच 6th October से   |   ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स (प्रयागराज)   |   अपनी सीट आज ही कन्फर्म करें - UP APO प्रिलिम्स कोर्स 2025, बैच 6th October से










होम / IT अधिनियम

आपराधिक कानून

सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69क - सूचना तक पहुँच को अवरोध करने की शक्ति

    «
 01-Jan-2026

परिचय 

डिजिटल युग मेंऑनलाइन सूचनाओं का नियमन और नियंत्रण राष्ट्रीय सुरक्षा और लोक व्यवस्था बनाए रखने के महत्त्वपूर्ण घटक बन गए हैं। विभिन्न प्लेटफार्मों पर डिजिटल सामग्री के प्रसार के कारण संभावित खतरों से निपटने के लिये एक मजबूत विधिक ढाँचा आवश्यक हो गया है। 

  • सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT Act) की धारा 69केंद्र सरकार को राष्ट्रीय हित और जन कल्याण के लिये आवश्यक समझी जाने वाली विशिष्ट परिस्थितियों में सूचना तक पहुँच को अवरोध करने की शक्तियां प्रदान करती है। 

धारा 69क क्या है? 

  • धारा 69केंद्र सरकार को किसी भी सरकारी अभिकरण या मध्यस्थ को निदेश जारी करने का अधिकार देती है कि वह किसी भी कंप्यूटर संसाधन पर उत्पन्नप्रसारितप्राप्तसंग्रहीत या होस्ट की गई किसी भी जानकारी तक जनता की पहुँच को अवरोध कर दे। 

अवरोधक शक्तियों का प्रयोग करने के आधार: 

धारा 69क के अंतर्गत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग निम्नलिखित आधारों पर किया जा सकता है: 

  • संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता: 
    • भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा। 
  • रक्षा एवं सुरक्षा: 
    • भारत की रक्षा की सुरक्षा करना। 
    • राज्य की सुरक्षा सुनिश्चित करना। 
  • विदेश से रिश्ते: 
    • विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए रखना। 
  • लोक व्यवस्था: 
    • लोक व्यवस्था का संरक्षण। 
    • उपरोक्त आधारों से संबंधित किसी भी संज्ञेय अपराध को अंजाम देने के लिये उकसाने से रोकना। 
  • अन्वेषण के उद्देश्य: 
    • किसी भी अपराध के अन्वेषण के लिये 
    • इंटरनेट वेबसाइटों को अवरोध करने की प्रक्रिया 

किसे निर्देशित किया जा सकता है? 

धारा 69क केंद्र को निम्नलिखित निदेश देने में सक्षम बनाती है: 

सरकारी अभिकरणों: 

  • सरकार की कोई भी अभिकरण या विभाग। 

मध्यस्थ: 

  • 'मध्यस्थोंशब्द में निम्नलिखित सम्मिलित हैं: 
  • दूरसंचार सेवाओं के प्रदाता। 
  • नेटवर्क सेवा प्रदाता। 
  • इंटरनेट सेवा प्रदाता (ISPs)। 
  • वेब होस्टिंग सेवाएँ 
  • खोज इंजन। 
  • ऑनलाइन संदाय प्लेटफॉर्म। 
  • नीलामी साइटें और ऑनलाइन बाज़ार। 
  • साइबर कैफे। 

प्रक्रियात्मक आवश्यकताएँ: 

लिखित निदेश: 

  • पहुँच को अवरोध करने का कोई भी अनुरोध लिखित रूप में दिये गए कारणों पर आधारित होना चाहिये 
  • अवरोधक शक्तियों के प्रयोग में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करता है। 
  • जिन आधारों का हवाला दिया गया हैवे धारा 69क में निर्दिष्ट आधारों के अनुरूप होने चाहिये 

धारा 69क की प्रमुख विशेषताएँ 

व्यापक कवरेज: 

  • यह सभी प्रकार की डिजिटल संसूचनाओं पर लागू होता हैचाहे उनका प्रारूप या माध्यम कुछ भी हो। 
  • इसमें ऑनलाइन उत्पन्नप्रेषितप्राप्तसंग्रहीत या होस्ट की गई जानकारी सम्मिलित है। 

बहु-हितधारक सहभागिता: 

  • इसमें सरकारी अभिकरण ​​और निजी मध्यस्थ दोनों सम्मिलित हैं। 
  • सामग्री विनियमन के लिये एक सहयोगात्मक ढाँचा तैयार करता है। 

विधिक उत्तरदायित्त्व: 

  • लिखित कारण दर्ज किए जाने की अनिवार्यता विधिक उत्तरदायित्त्व सुनिश्चित करती है 
  • यदि अवरोधक शक्तियों का दुरुपयोग किया जाता है तो न्यायिक पुनरीक्षण का आधार प्रदान करता है। 

अनुपालन संरक्षण: 

  • अवरोध संबंधी निदेशों का अनुपालन करने से मध्यस्थों को विधिक प्रतिरक्षा प्राप्त होती है। 

निष्कर्ष 

सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 69क भारत के डिजिटल शासन ढाँचे में एक महत्त्वपूर्ण विधिक साधन है। संभावित रूप से हानिकारक सूचनाओं तक पहुँच को अवरोध करने के लिये केंद्र सरकार को सशक्त बनाकरयह उपबंध राष्ट्रीय हितों की रक्षालोक व्यवस्था बनाए रखने और डिजिटल क्षेत्र में राज्य की सुरक्षा सुनिश्चित करने का प्रयास करता है। 

जैसे-जैसे डिजिटल खतरे विकसित होते जा रहे हैंधारा 69 सांविधानिक मूल्यों का सम्मान करते हुए डिजिटल संप्रभुता को बनाए रखने और नागरिकों को हानिकारक सामग्री से बचाने के लिये एक आवश्यक उपकरण बनी रहेगी।