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सांविधानिक विधि
भारत की आकस्मिकता निधि
« »30-Sep-2025
परिचय
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 267(1) संसद को विधि द्वारा, अग्रदाय के रूप में एक आकस्मिकता निधि स्थापित करने का अधिकार देता है, जिसे "भारत की आकस्मिकता निधि" कहा जाता है। यह उपबंध यह अनिवार्य करता है कि विधि द्वारा अवधारित राशियाँ समय-समय पर इस निधि में जमा की जाएंगी। सांविधानिक अधिदेश इस निधि को भारत के राष्ट्रपति के अधीन रखता है, जिससे वे अप्रत्याशित व्यय की पूर्ति के लिये इसमें से अग्रिम राशि प्राधिकृत कर सकते हैं।
सांविधानिक उपबंध: अनुच्छेद 267
अनुच्छेद 267(1): संघ आकस्मिकता निधि
- भारतीय संविधान का अनुच्छेद 267(1) संसद को विधि द्वारा अग्रदाय के स्वरूप में एक आकस्मिकता निधि स्थापित करने का अधिकार देता है, जिसे "भारत की आकस्मिकता निधि" कहा जाता है। इस उपबंध में यह अनिवार्य किया गया है कि विधि द्वारा निर्धारित राशियाँ समय-समय पर इस निधि में जमा की जाएंगी। सांविधानिक अधिदेश इस निधि को भारत के राष्ट्रपति के अधीन रखता है, जिससे वे अप्रत्याशित व्यय की पूर्ति के लिये इसमें से अग्रिम राशि प्राधिकृत कर सकते हैं।
- ऐसे व्यय के लिये विधायी प्राधिकार बाद में अनुच्छेद 115 के अधीन संसद से प्राप्त किया जाना चाहिये, जो अनुपूरक, अतिरिक्त या अधिक अनुदानों (से संबंधित है, या अनुच्छेद 116 के अधीन, जो लेखानुदान, ऋण-पत्र और असाधारण अनुदानों को नियंत्रित करता है। यह व्यवस्था सुनिश्चित करती है कि तत्काल वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके, किंतु अंतिम विधायी स्वीकृति अनिवार्य बनी रहे, जिससे संचित निधि पर संसदीय नियंत्रण का मूल सिद्धांत सुरक्षित रहे।
अनुच्छेद 267(2): राज्य आकस्मिकता निधि
- अनुच्छेद 267(2) राज्य सरकारों के लिये एक समरूप उपबंध लागू करता है, जो राज्य विधानमंडलों को विधि द्वारा, अग्रिम निधि के रूप में एक आकस्मिकता निधि स्थापित करने के लिये प्राधिकृत करता है, जिसे "राज्य की आकस्मिकता निधि" कहा जाएगा। राज्य की विधि द्वारा निर्धारित ऐसी राशियाँ समय-समय पर इस निधि में जमा की जाएंगी और यह निधि राज्य के राज्यपाल के अधीन रहेगी।
- इस प्रकार, राज्यपाल को अप्रत्याशित व्यय की पूर्ति हेतु राज्य आकस्मिकता निधि से अग्रिम राशि स्वीकृत करने का अधिकार प्राप्त है, बशर्ते कि अनुच्छेद 205 (अनुपूरक, अतिरिक्त या अधिक अनुदान) या अनुच्छेद 206 (लेखानुदान, ऋणपत्र और असाधारण अनुदान) के अंतर्गत राज्य विधानमंडल द्वारा बाद में प्राधिकरण प्रदान किया जाए। इससे वित्तीय आपात स्थितियों से निपटने के लिये संघ और राज्य तंत्रों के बीच सांविधानिक समानता सुनिश्चित होती है।
सांविधिक ढाँचा: भारतीय आकस्मिकता निधि अधिनियम, 1950
- अनुच्छेद 267(1) के अधीन सांविधानिक आदेश के अनुसरण में, संसद ने भारतीय आकस्मिकता निधि अधिनियम, 1950 पारित किया, जिसने आकस्मिकता निधि की स्थापना और रखरखाव को क्रियान्वित किया। अधिनियम में प्रारंभिक निधि 5 करोड़ रुपए विहित की गई थी, जिसे बाद में 2005 में उपयुक्त विधायी संशोधन के माध्यम से बढ़ाकर 500 करोड़ रुपए कर दिया गया। हाल के सरकारी विचार-विमर्शों ने समकालीन राजकोषीय आवश्यकताओं और मुद्रास्फीति संबंधी विचारों के अनुरूप, इसे बढ़ाकर 30,000 करोड़ रुपए करने की सिफारिश की है।
प्रशासनिक ढाँचा और संरक्षकता
- आकस्मिकता निधि, राष्ट्रपति की ओर से भारत सरकार के वित्त सचिव द्वारा रखी जाती है। इस निधि का प्रशासन भारत के लोक लेखा के प्रबंधन के समान, कार्यपालिका कार्रवाई के माध्यम से संचालित होता है। यद्यपि अनुच्छेद 267 राष्ट्रपति को अग्रिम राशि प्राधिकृत करने की शक्ति प्रदान करता है, सांविधानि परंपरा और व्यवहार के अनुसार, किसी भी निकासी को मंजूरी देने से पहले केंद्रीय मंत्रिमंडल से परामर्श करना आवश्यक है।
- राज्य स्तर पर, संबंधित राज्य वित्त सचिव राज्यपाल की ओर से राज्य आकस्मिकता निधि का प्रबंधन करता है, जो राज्य मंत्रिपरिषद के साथ समान परामर्शात्मक आवश्यकताओं के अधीन होता है।
परिचालन तंत्र और कॉर्पस संरक्षण
- आकस्मिकता निधि अग्रदाय के सिद्धांत पर कार्य करती है, और आपात स्थितियों के लिये एक स्थायी निधि बनाए रखती है। जब अप्रत्याशित व्यय उत्पन्न होता है—चाहे प्राकृतिक आपदाओं, सशस्त्र संघर्षों, या अन्य आकस्मिकताओं के कारण—राष्ट्रपति निधि से तत्काल अग्रिम राशि की अनुमति दे सकते हैं, जिससे पूर्व संसदीय अनुमोदन की आवश्यकता समाप्त हो जाती है, जो अन्यथा समेकित निधि से व्यय के लिये अनुच्छेद 266 के अधीन अनिवार्य होता।
- यद्यपि ऐसे अग्रिम अस्थायी प्रकृति के होते हैं। सरकार सांविधानिक रूप से अनुच्छेद 115 या 116 के अधीन संसदीय प्राधिकरण लेने के लिये आबद्ध है। विधायी स्वीकृति मिलने पर, व्यय भारत की संचित निधि में जमा कर दिया जाता है और आकस्मिकता निधि में तदनुसार प्रतिपूर्ति की जाती है, जिससे भविष्य की आकस्मिकताओं के लिये निधि सुरक्षित रहती है।
- यह दोहरी व्यवस्था संकट प्रबंधन में परिचालन दक्षता तथा विधायी निगरानी एवं वित्तीय जवाबदेही के सांविधानिक सिद्धांतों का पालन सुनिश्चित करती है।
आकस्मिकता निधि और समेकित निधि के बीच अंतर
- आकस्मिकता निधि को अनुच्छेद 266(1) के अंतर्गत स्थापित भारत की संचित निधि से अलग करना अनिवार्य है। संचित निधि सभी सरकारी राजस्वों, लिये गए ऋणों और ऋणों के पुनर्भुगतान में प्राप्त धनराशि का प्राथमिक भंडार है। सांविधानिक प्रावधानों के अंतर्गत संचित निधि पर प्रभारित व्यय के सिवाय, सभी सरकारी व्यय संसदीय विनियोग द्वारा प्राधिकृत होने चाहिये।
- इसके विपरीत, आकस्मिकता निधि एक सीमित राशि है जो विशेष रूप से अप्रत्याशित आपात स्थितियों के लिये निर्धारित की जाती है। जहाँ समेकित निधि से निकासी के लिये पूर्व संसदीय अनुमति की आवश्यकता होती है, वहीं आकस्मिकता निधि तत्काल कार्यपालिका कार्रवाई की अनुमति देती है जिसके बाद विधायी अनुमोदन प्राप्त होता है। समेकित निधि नियोजित सरकारी व्यय को पूरा करती है; आकस्मिकता निधि असाधारण और अप्रत्याशित आवश्यकताओं को पूरा करती है।