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सांविधानिक विधि

एयर फ़ोर्स ग्रुप इंश्योरेंस सोसाइटी, भारत के संविधान के अनुच्छेद 12 के अधीन 'राज्य' के अंतर्गत आती है

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 17-Mar-2026

रवि खोखर एवं अन्य बनाम भारत संघ एवं अन्य 

"एयर फोर्स ग्रुप इंश्योरेंस सोसाइटी भारतीय वायु सेना के सदस्यों के प्रति राज्य के दायित्त्वों से निकटता से जुड़ा एक लोक कार्य करती हैइसलिये यह एक राज्य के रूप में योग्य है।" 

न्यायमूर्ति संजय करोल और विपुल एम. पंचोली 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति संजय करोल और विपुल एम. पंचोली की पीठ नेरवि खोखर एवं अन्य बनाम भारत संघ एवं अन्य (2026) के मामलेमें दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्णय को पलट दिया और यह माना कि एयर फ़ोर्स ग्रुप इंश्योरेंस सोसाइटी (AFGIS) भारत के संविधान के अनुच्छेद 12 के अर्थ में एक 'राज्यहै। 

  • न्यायालय ने माना कि एयर फ़ोर्स ग्रुप इंश्योरेंस सोसाइटी (AFGIS) एक लोक कार्य करता है जो सशस्त्र बलों के कर्मियों के प्रति राज्य के कर्त्तव्य से आंतरिक रूप से जुड़ा हुआ हैऔर इसके प्रशासन और वित्त में सरकार की गहरी भागीदारी इसे राज्य के एक साधन की परिभाषा के दायरे में लाती है। 

रवि खोखर एवं अन्य बनाम भारत संघ एवं अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • एयर फोर्स ग्रुप इंश्योरेंस सोसाइटी भारतीय वायु सेना के सदस्यों की सेवा करने वाली एक कल्याणकारी और बीमा संस्था है। 
  • दिसंबर 2016 मेंएयर फ़ोर्स ग्रुप इंश्योरेंस सोसाइटी (AFGIS) के न्यासी बोर्ड ने छठे केंद्रीय वेतन आयोग की सिफारिशों के अनुसार कर्मचारियों के वेतनमानों को संशोधित करने का संकल्प लिया। 
  • तत्पश्चात्, 13 फरवरी, 2017 को आयोजित एक बैठक मेंबोर्ड ने अपने पहले के निर्णय को पलट दिया और सोसायटी की वेतन संरचनाओं को केंद्र सरकार के वेतनमानों से पूरी तरह से अलग करने का संकल्प लिया। 
  • कर्मचारियों को 22 मई, 2017 को एक नोटिस जारी किया गया थाजिसमें उनसे संशोधित सेवा शर्तों को स्वीकार करने के लिये कहा गया था। 
  • इस निर्णय से व्यथित होकर कर्मचारियों ने संविधान के अनुच्छेद 226 के अधीन रिट याचिकाओं के माध्यम से दिल्ली उच्च न्यायालय में इस निर्णय को चुनौती दी। 
  • दिल्ली उच्च न्यायालय ने याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि एयर फ़ोर्स ग्रुप इंश्योरेंस सोसाइटी (AFGIS) एक आत्मनिर्भर कल्याण और बीमा योजना है जो सदस्यों के अंशदान से वित्त पोषित है और इसलिये अनुच्छेद 12 के अधीन 'राज्यकी श्रेणी में नहीं आती है। परिणामस्वरूपन्यायालय ने रिट याचिकाओं को पोषणीय नहीं माना। 
  • कर्मचारियों ने इस बर्खास्तगी के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय में अपील की। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

सार्वजनिक कार्य परीक्षा पर: 

  • न्यायालय ने माना कि एयर फ़ोर्स ग्रुप इंश्योरेंस सोसाइटी (AFGIS) निस्संदेह एक लोक कर्त्तव्य का निर्वाह करता है। न्यायालय ने तर्क दिया कि सशस्त्र बलों के कर्मियों की सुरक्षा और कल्याण सरकार का एक प्रमुख कार्य हैक्योंकि सशस्त्र बलों की भूमिका राष्ट्र की संप्रभुता और सुरक्षा से सीधे तौर पर जुड़ी हुई है। 
  • न्यायालय ने टिप्पणी की कि सशस्त्र बलों के सदस्यों को कठोर नियमों के अधीन और कभी-कभी सबसे गंभीर और प्रतिकूल परिस्थितियों में काम करना होता हैजिससे बीमा कवरेज का प्रावधान एक लोक कार्य बन जाता है - एक ऐसा कार्य जो राज्य के उस सामूहिक दायित्त्व को पूरा करता है जो व्यक्तियों के एक परिभाषित वर्ग के प्रति है जिनकी सेवा अपरिहार्य है। 

गहन और व्यापक नियंत्रण पर: 

न्यायालय ने एयर फ़ोर्स ग्रुप इंश्योरेंस सोसाइटी (AFGIS) के कामकाज में सरकार की गहरी भागीदारी की ओर इशारा करने वाले कई महत्त्वपूर्ण कारकों पर ध्यान दियाजिनमें शामिल हैं: 

  • इस संस्था की स्थापना भारत के राष्ट्रपति की स्वीकृति से हुई थीजिन्होंने विशेष रूप से इसके प्रतिनिधिमंडल नियमों को भी मंजूरी दी थी। 
  • एयर फ़ोर्स ग्रुप इंश्योरेंस सोसाइटी (AFGIS) के प्रधान निदेशक को सोसाइटी के नकदी प्रवाह के संबंध में वायु सेना के सहायक प्रमुख को मासिक आधार पर जानकारी देना आवश्यक हैजिससे एक वरिष्ठ भारतीय वायु सेना अधिकारी द्वारा निरंतर निगरानी सुनिश्चित हो सके। 
  • एयर फ़ोर्स ग्रुप इंश्योरेंस सोसाइटी (AFGIS) की सदस्यता और उसके परिणामस्वरूप वेतन से होने वाली कटौती प्रत्येक सेवारत भारतीय वायु सेना अधिकारी के लिये अनिवार्य है - इस मामले में कोई व्यक्तिगत विकल्प नहीं हैक्योंकि यह नियोक्ता का आदेश है। 

प्रशासनिक नियंत्रण पर: 

  • न्यायालय ने पाया कि न्यासी बोर्ड और प्रबंध समिति के सभी सदस्य भारतीय वायु सेना के सेवारत अधिकारी हैंजिन्हें निश्चित अवधि के लिये एयर फ़ोर्स ग्रुप इंश्योरेंस सोसाइटी (AFGIS) में प्रतिनियुक्त किया गया है। 
  • संक्षेप मेंइस निकाय का प्रशासन पूरी तरह से सरकारी कर्मचारियों के हाथों में हैभले ही यह निकाय स्वयं को एक कथित रूप से निजीआत्मनिर्भर समाज के रूप में संरचित करता हो। 

शासी विधिक परीक्षा पर: 

  • अनुच्छेद 12 के दायरे पर स्थापित पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुएन्यायालय ने दोहराया कि यह निर्धारित करने के लिये कि कोई निकाय वित्तीयकार्यात्मक और प्रशासनिक रूप से राज्य के प्रभुत्व में है या नहींसभी प्रासंगिक कारकों के संचयी प्रभाव का आकलन किया जाना चाहिये 
  • न्यायालय ने कहा कि यह परीक्षण स्वामित्व या उत्पत्ति के प्रश्नों तक सीमित नहीं हैअपितु जवाबदेहीविधि के शासन और शासन की व्यावहारिक वास्तविकताओं से भी प्रेरित है। 

अनुतोष के संबंध में: 

  • न्यायालय ने अपील को स्वीकार करते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश को अपास्त कर दिया और संविधान के अनुच्छेद 12 के अधीन एयर फ़ोर्स ग्रुप इंश्योरेंस सोसाइटी (AFGIS) को 'राज्यघोषित किया। 
  • इसने उच्च न्यायालय को निदेश दिया कि वह अपीलकर्त्ताओं द्वारा दायर रिट याचिकाओं पर शीघ्रता से निर्णय लेयह ध्यान में रखते हुए कि याचिकाएँ 2017 से लंबित हैं। 

भारत के संविधान का अनुच्छेद 12 क्या है? 

बारे में: 

  • अनुच्छेद 12 में यह निर्धारित किया गया है कि जब तक संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, राज्य मेंभारत की सरकार और संसद तथा प्रत्येक राज्य की सरकार और विधानमंडल तथा भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर या भारत सरकार के नियंत्रण के अधीन स्थित सभी स्थानीय या अन्य प्राधिकारी सम्मिलित हैं। 
  • राज्य की परिभाषाव्यापकहै और इसमें निम्नलिखित बातें सम्मिलित हैं: 
    • भारत की सरकार और संसदअर्थात् संघ की कार्यपालिका और विधायिका। 
    • प्रत्येक राज्य की सरकार और विधानमंडलअर्थात् भारत के विभिन्न राज्यों की कार्यपालिका और विधानमंडल। 
    • भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर या भारत सरकार के नियंत्रण में आने वाले सभी स्थानीय या अन्य प्राधिकारी 

भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर स्थित स्थानीय या अन्य प्राधिकारी: 

  • स्थानीय प्राधिकारी अभिव्यक्ति कोसाधारण खण्ड अधिनियम, 1897 की धारा 3(31)में परिभाषित किया गया है कि स्थानीय प्राधिकारी का अर्थ नगर समितिजिला बोर्डआयुक्तों का निकाय या अन्य प्राधिकारी होंगे जो विधिक रूप से किसी नगरपालिका या स्थानीय निधि के नियंत्रण या प्रबंधन के लिये सरकार द्वारा प्राधिकृत या सौंपा गया हो। 
  • स्थानीय प्राधिकारी शब्द से सामान्यत: नगरपालिकाओंजिला बोर्डोंपंचायतोंखनन बंदोबस्ती बोर्डों आदि जैसे प्राधिकरणों का तात्पर्य होता है। राज्य के अधीन कार्य करने वालाराज्य के स्वामित्व वालाराज्य द्वारा नियंत्रित और प्रबंधित कोई भी निकाय जो लोक कार्य करता हैवह स्थानीय प्राधिकरण कहलाता है और राज्य की परिभाषा के अंतर्गत आता है। 
  • अन्य प्राधिकारियों शब्द को कहीं भी परिभाषित नहीं किया गया है। इसलियेइसकी निर्वचन में काफी कठिनाई आई है और न्यायिक मत समय के साथ परिवर्तित होता रहा है। 
  • भारत संघ बनाम आर.सी. जैन (1981)के मामले में उच्चतम न्यायालय नेभारत के संविधान के अनुच्छेद 12 में निहित राज्य की परिभाषा के अंतर्गत किन निकायों को स्थानीय प्राधिकारी माना जाएगायह निर्धारित करने के लिये मानदंड निर्धारित किया। न्यायालय ने कहा कि यदि कोई प्राधिकारी: 
    • एक पृथक् विधिक अस्तित्व रखता है 
    • एक परिभाषित क्षेत्र में कार्य करता है 
    • स्वयं धन जुटाने की क्षमता रखता है 
    • स्वायत्तता का आनंद लेता हैअर्थात् स्वशासन का। 
    • यदि किसी प्राधिकारी को विधि द्वारा ऐसे कार्य सौंपे जाते हैं जो सामान्यतः नगरपालिकाओं को सौंपे जाते हैंतो ऐसे प्राधिकारी 'स्थानीय प्राधिकारी’ के अंतर्गत आएंगे और इसलिये संविधान के अनुच्छेद 12 के अधीन राज्य कहलाएंगे। 

क्या कोई संस्था अनुच्छेद 12 के अंतर्गत आती है या नहीं? 

  • डी. शेट्टी बनाम एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (1979) के मामलेमेंन्यायमूर्ति पी.एन. भगवती ने पाँच सूत्रीय परीक्षण दिया। यह परीक्षण यह निर्धारित करने के लिये है कि कोई निकाय राज्य की अभिकरण या साधन है या नहींऔर यह इस प्रकार है – 
    • राज्य के वित्तीय संसाधनजहाँ राज्य मुख्य वित्तपोषण स्रोत हैअर्थात् संपूर्ण शेयर पूँजी सरकार के पास है। 
    • राज्य पर गहरा और व्यापक नियंत्रण। 
    • इसका कार्यात्मक स्वरूप मूल रूप से सरकारी हैजिसका अर्थ है कि इसके कार्यों का लोक महत्त्व है या वे सरकारी प्रकृति के हैं। 
    • सरकार का एक विभाग निगम को अंतरित कर दिया गया। 
    • इसे राज्य द्वारा प्रदत्त या राज्य द्वारा संरक्षित एकाधिकार का दर्जा प्राप्त है। 
  • इस बात को इस कथन के साथ स्पष्ट किया गया कि यह परीक्षण केवल दृष्टांतदर्शक हैनिश्चायक नहीं है और इसे अत्यंत सावधानी और सतर्कता के साथ किया जाना चाहिये 

विधिक निर्णय: 

  • मद्रास विश्वविद्यालय बनाम शांता बाई (1950) के मामले में, मद्रास उच्च न्यायालय ने 'समान प्रकृतिका सिद्धांत विकसित किया। इसका अर्थ यह है कि 'अन्य प्राधिकारी’ अभिव्यक्ति के अंतर्गत केवल वे प्राधिकारी आते हैं जो सरकारी या संप्रभु कार्य करते हैं। इसके अतिरिक्तइसमें गैर-सरकारी विश्वविद्यालयों जैसे व्यक्तिचाहे वे प्राकृतिक हों या विधिकशामिल नहीं हो सकते। 
  • उज्जम्माबाई बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1961) के मामले में, उच्चतम न्यायालय ने उपरोक्त प्रतिबंधात्मक दायरे को खारिज कर दिया और यह निर्णय दिया कि अन्य प्राधिकारियों के निर्वचन में 'समता के सिद्धांतका सहारा नहीं लिया जा सकता। अनुच्छेद 12 के अंतर्गत नामित निकायों में कोई सामान्य वंश नहीं है और उन्हें किसी भी तर्कसंगत आधार पर एक ही श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।