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आपराधिक कानून
जमानत प्रदान करने के लिये धनराशि जमा करने की शर्त आवश्यक नहीं होनी चाहिये
« »10-Feb-2026
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प्रांतिक कुमार एवं अन्य बनाम झारखंड राज्य और अन्य "यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस न्यायालय द्वारा स्पष्ट शब्दों में यह कहे जाने के बावजूद कि नियमित जमानत या अग्रिम जमानत किसी भी राशि के जमा करने के अधीन नहीं होनी चाहिये, उच्च न्यायालय ने कहा है कि याचिकाकर्त्ताओं को शेष राशि जमा करनी होगी।" न्यायमूर्ति जे.बी. परदीवाला और के.वी. विश्वनाथन |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
प्रांतिक कुमार एवं अन्य बनाम झारखंड राज्य एवं अन्य (2026) के मामले में न्यायमूर्ति जे.बी. परदीवाला और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने झारखंड उच्च न्यायालय द्वारा पारित उन जमानत आदेशों को अपास्त कर दिया, जिनमें अग्रिम जमानत को परिवादकर्त्ता को देय राशि जमा करने की शर्त पर आधारित किया गया था। न्यायालय ने दोहराया कि जमानत आवेदनों का निर्णय केवल गुण-दोष के आधार पर किया जाना चाहिये और न्यायालय जमानत की पूर्व शर्त के रूप में राशि जमा करने का निदेश देने वाले सशर्त आदेश पारित नहीं कर सकते।
प्रांतिक कुमार और अन्य बनाम झारखंड राज्य और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- यह याचिका दो अभियुक्तों - एक पिता और पुत्र - द्वारा दायर की गई थी, जिन्हें छल के एक मामले में सेशन न्यायालय द्वारा अग्रिम जमानत देने से इंकार कर दिया गया था।
- परिवाद में अभिकथित किया गया था कि अभियुक्त परिवादकर्त्ता से हस्तकला के कागज (craft papers) खरीदने के बाद 9,00,000 रुपए का संदाय करने में विफल रहा था।
- एक प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज की गई और गिरफ्तारी की आशंका के मद्देनजर, अभियुक्त ने सेशन न्यायालय में अग्रिम जमानत के लिये आवेदन किया, जिसे अस्वीकार कर दिया गया।
- तत्पश्चात् अभियुक्त ने झारखंड उच्च न्यायालय का रुख किया, जिसने 13 जनवरी, 2025 और 14 नवंबर, 2025 को दो आदेश पारित किये, जिसमें उन्हें एक अनुपूरक शपथपत्र दाखिल करने का निदेश दिया गया, जिसमें यह दर्शाया गया कि परिवादकर्त्ता को 9,12,926.84 रुपए का संदाय किया गया था।
- दोनों आदेशों में, उच्च न्यायालय ने टिप्पणी की कि यदि संदाय दर्शाने वाला शपथपत्र दाखिल नहीं किया गया, तो अग्रिम जमानत आवेदन को आगे संदर्भ के बिना खारिज कर दिया जाएगा।
- अभियुक्तों ने उच्च न्यायालय के समक्ष समय मांगा, जिसके बाद उन्होंने दोनों सशर्त आदेशों को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी।
- उच्चतम न्यायालय की पीठ ने निराशा व्यक्त करते हुए कहा कि उच्च न्यायालय ने गजानन दत्तात्रेय गोरे बनाम महाराष्ट्र राज्य (2025) के मामले में उच्चतम न्यायालय के बाध्यकारी निर्णय की अनदेखी करते हुए ये आदेश पारित किये हैं , जिसमें यह कहा गया था कि जमानत आवेदनों पर गुण-दोष के आधार पर निर्णय लिया जाना चाहिये, न कि अभियुक्त के आश्वासन पर।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- पीठ ने उच्च न्यायालय के आदेशों को "असामान्य आदेश" बताया, जो उच्चतम न्यायालय के स्पष्ट और बाध्यकारी निर्णय की अनदेखी करते हुए पारित किये गए थे।
- न्यायालय ने कहा कि यह "बेहद दुर्भाग्यपूर्ण" है कि स्पष्ट निदेशों के होते हुए भी, उच्च न्यायालय जमानत राशि जमा करने के लिये सशर्त जमानत आदेश पारित करना जारी रखे हुए हैं।
- पीठ ने स्पष्ट रूप से दोहराया कि यदि जमानत या अग्रिम जमानत देने का मामला बनता है, तो न्यायालय को जमानत देने का उचित आदेश पारित करना चाहिये; और यदि मामला नहीं बनता है, तो न्यायालय जमानत देने से इंकार कर सकता है – तथापि, न्यायालय किसी विशेष राशि को जमा करने का सशर्त आदेश पारित नहीं कर सकता और फिर अपने विवेक का प्रयोग नहीं कर सकता।
- न्यायालय ने झारखंड उच्च न्यायालय के विवादित आदेशों को अपास्त कर दिया और निदेश दिया कि यदि अभियुक्त व्यक्तियों को गिरफ्तार किया जाता है, तो उन्हें अन्वेषण अधिकारी द्वारा अधिरोपित की गई शर्तों के अधीन जमानत पर छोड़ दिया दिया जाएगा।
- न्यायालय ने रजिस्ट्री को आदेश की एक प्रति झारखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष फाइल में भेजने का भी निदेश दिया।
भारत में जमानत को नियंत्रित करने वाले सांविधिक उपबंध क्या हैं?
- भारतीय जमानत प्रणाली भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) के अध्याय 35 के अधीन संचालित होती है, जिसने दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 का स्थान लिया है। सांविधिक ढाँचा अपराधों को जमानतीय और अजमानतीय श्रेणियों में विभाजित करता है, और छोड़े जाने पर विचार के लिये पृथक् प्रक्रियात्मक मार्ग स्थापित करता है।
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 479 के अधीन जमानतीय अपराधों के अभियुक्तों को उचित जमानत राशि जमा करने पर जमानत का पूर्ण अधिकार है। थानों और न्यायालयों के भारसाधक पुलिस अधिकारियों के पास निर्धारित जमानतीय अपराधों के लिये जमानत नामंजूर करने का विवेकाधिकार नहीं है, जिससे सांविधिक शर्तों का पालन करने पर तत्काल रिहाई सुनिश्चित होती है।
- धारा 480 के अंतर्गत अजमानतीय अपराधों के लिये न्यायिक मूल्यांकन की आवश्यकता होती है, जो अपराध की गंभीरता, साक्ष्य की मजबूती और अभियुक्त के पूर्ववृत्त सहित सांविधिक मानदंडों पर आधारित होता है। न्यायालयों को विवेकाधीन अधिकार का प्रयोग करते समय धारा 480(3) में विहित कारकों पर विचार करना चाहिये, जिनमें साक्ष्य से छेड़छाड़ की संभावना, साक्षियों को धमकाना और भागने का जोखिम सम्मिलित है।
- धारा 482 अग्रिम जमानत का उपबंध करती है, जिससे अजमानतीय अपराधों के लिये गिरफ्तारी की आशंका रखने वाले व्यक्ति सेशन न्यायालयों या उच्च न्यायालयों से गिरफ्तारी से पहले संरक्षण प्राप्त कर सकते हैं। यह उपबंध अन्वेषण प्राधिकरण को बनाए रखते हुए मनमाने निरोध के विरुद्ध सांविधानिक सुरक्षा प्रदान करता है।
- सांविधिक ढाँचा धारा 187 के अधीन स्वतः जमानत का उपबंध करता है जब अन्वेषण विहित समय सीमा से अधिक हो जाती है, जिससे बिना विचारण के अनिश्चितकालीन निरोध को रोकने के लिये "व्यतिकारी जमानतम (default bail)" सिद्धांत लागू होता है।
जमानत के विभिन्न प्रकार क्या हैं?
- नियमित जमानत: न्यायालय जमानत राशि का संदाय करने के पश्चात् गिरफ्तार व्यक्ति को पुलिस अभिरक्षा से छोड़ने का आदेश देता है। अभियुक्त दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 437 और 439 (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 480 और 483) के अधीन नियमित जमानत के लिये आवेदन कर सकता है।
- अंतरिम जमानत: यह न्यायालय द्वारा अभियुक्त को उसकी नियमित या अग्रिम जमानत याचिका लंबित रहने तक अस्थायी और अल्पकालिक जमानत प्रदान करने का एक सीधा आदेश है।
- अग्रिम जमानत : अजमानतीय अपराध के लिये गिरफ्तारी की आशंका वाले व्यक्ति दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 438 (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 482) के अधीन उच्च न्यायालय या सेशन न्यायालय में अग्रिम जमानत के लिये आवेदन कर सकते हैं।