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सिविल कानून
सिविल प्रक्रिया संहिता का आदेश 6 नियम 17
«22-Jan-2026
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श्री मोहम्मदराफी और अन्य बनाम बंदेनवाज़ और अन्य "सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 6 नियम 17 के परंतुक में परिकल्पित सम्यक् तत्परता परीक्षण, विचारण के प्रारंभ के पश्चात् दायर किये गए, अभिवचनों में संशोधन की मांग करने वाले प्रत्येक आवेदन पर सार्वभौमिक रूप से लागू नहीं हो सकता है।" न्यायमूर्ति अनंत रामनाथ हेगड़े |
स्रोत: कर्नाटक उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
कर्नाटक उच्च न्यायालय (धारवाड़ खंडपीठ) के न्यायमूर्ति अनंत रामनाथ हेगड़े ने श्री मोहम्मदराफी और अन्य बनाम बंदेनवाज़ और अन्य (2025) के मामले में यह निर्णय दिया कि सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 6 नियम 17 के अधीन वादपत्र में संशोधन विचारण के प्रारंभ के पश्चात् भी सम्यक् तत्परता परीक्षा की पूर्ति न होते हुए भी अनुमत है, यह स्पष्ट करते हुए कि परीक्षा का सार्वभौमिक अनुप्रयोग नहीं है।
श्री मोहम्मदराफी और अन्य बनाम बंदेनावाज और अन्य (2025) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- याचिकाकर्त्ताओं (वादियों) ने यह घोषणा करने के लिये वाद दायर किया कि याचिकाकर्त्ता नंबर 1 के पिता द्वारा प्रतिवादियों के पक्ष में दिनांक 24.04.2009 को निष्पादित विक्रय विलेख को रद्द कर दिया जाए।
- उन्होंने प्रतिवादियों को संपत्ति पर उनके कब्जे में हस्तक्षेप करने से रोकने की भी मांग की।
- वादी के साक्षी संख्या 2 के साक्ष्य के बाद, याचिकाकर्त्ताओं ने मूल वाद प्रस्तुत करने के लगभग 10 वर्ष पश्चात् और विचारण के प्रारंभ के पश्चात् वादपत्र में संशोधन करने के लिये एक आवेदन दायर किया।
- इस संशोधन में यह अभिवचन शामिल करने की मांग की गई थी कि वाद की सुनवाई के दौरान उन्हें 29.03.2022 को संपत्ति से बेदखल कर दिया गया था।
- याचिकाकर्त्ताओं ने संशोधित वादपत्र में कब्जा दिलाए की प्रार्थना सम्मिलित करने का भी अनुरोध किया।
- विचारण न्यायालय ने यह कहते हुए संशोधन आवेदन निरस्त कर दिया कि याचिकाकर्ता आदेश 6 नियम 17 सिविल प्रक्रिया संहिता के परंतुक के अंतर्गत अपेक्षित सम्यक् तत्परता (Due Diligence) की कसौटी पर खरे नहीं उतरते।
- विचारण न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि वाद संस्थित किए जाने के 10 वर्ष पश्चात् संशोधन का आवेदन दायर किया गया है, अतः यह विलंबित है।
- याचिकाकर्त्ताओं ने विचारण न्यायालय के आदेश को कर्नाटक उच्च न्यायालय में चुनौती दी।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
मुख्य निष्कर्ष:
- सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 6 नियम 17 के अधीन सम्यक् तत्परता की कसौटी का विचारण के प्रारंभ के पश्चात् किये जाने वाले प्रत्येक संशोधन पर सार्वभौमिक अनुप्रयोग नहीं है।
- विचारण के पश्चात् संशोधन की अनुमति इस बात पर निर्भर करेगी कि प्रस्तावित संशोधन की प्रकृति क्या है, न कि केवल कठोर रूप से सम्यक् तत्परता की कसौटी लागू करने पर।
प्रमुख सिद्धांत:
1. 2002 के संशोधन का उद्देश्य:
- परंतुक को दुरुपयोग एवं विलंबकारी युक्तियों को रोकने हेतु अधिनियमित किया गया।
- तथापि, विवादों की बहुलता से बचने के लिये संशोधन का उदारतापूर्ण दृष्टिकोण अब भी लागू रहता है।
2. कार्यवाही के किसी भी प्रक्रम में:
- संसद ने 2002 में इस वाक्यांश को बरकरार रखा, जो लचीलेपन को दर्शाता है।
- यदि विचारणोत्तर प्रत्येक संशोधन पर कठोर कसौटी लागू करना अभिप्रेत होता, तो संभवतः इस वाक्यांश को हटाया गया होता।
3. सम्यक् तत्परता के बिना संशोधन की अनुमति:
- तिथियों अथवा दस्तावेज़ों में टंकण/लिपिकीय त्रुटियों का सुधार ।
- संपत्ति के विवरण अथवा सीमाओं का संशोधन।
- वाद दायर किए जाने के पश्चात् घटित घटनाओं का अभिकथन।
- वाद की सुनवाई के दौरान होने वाली पश्चात्वर्ती घटनाओं के आधार पर प्रार्थनाएँ जोड़ना।
- पहले से दावाकृत प्रतिकर के समर्थन में तथ्यों का समावेश।
- वैकल्पिक या कमतर अनुतोष की मांग।
- विद्यमान अभिवचनों के आधार पर अनुषंगी अनुतोष की मांग करना।
4. इस मामले पर लागू होने वाला आवेदन:
- मात्र 10 वर्षों का समयांतराल अपने-आप में संशोधन आवेदन निरस्त करने का आधार नहीं बन सकता।
- आवेदन परिसीमा अधिनियम की धारा 64/65 के अंतर्गत निर्धारित परिसीमा के भीतर था।
- किसी स्वीकृति को रद्द करने वाला हर संशोधन अग्राह्य नहीं होता।
- विचारण न्यायालय ने संशोधन की प्रकृति पर विचार करने के बजाय केवल समयांतराल पर ध्यान केंद्रित कर त्रुटि की।
सिविल प्रक्रिया संहिता का आदेश 6 क्या है?
- सिविल प्रक्रिया संहिता का आदेश 6 सिविल मामलों में अभिवचनों से संबंधित है। अभिवचनों से आशय वादी द्वारा प्रस्तुत वादपत्र तथा उसके प्रत्युत्तर में प्रतिवादी द्वारा दायर लिखित कथन से है।
- अभिवचन वे लिखित कथन होते हैं जिनके माध्यम से प्रत्येक पक्षकार न्यायालय तथा विपक्षी पक्षकार को अपने मामले तथा उन तथ्यों की सूचना देता है, जिन्हें वह विचारण के दौरान साबित करना चाहता है। इन दस्तावेज़ों में सभी महत्त्वपूर्ण तथ्य एवं आवश्यक विवरण सम्मिलित होना अनिवार्य है, जिससे प्रत्येक पक्षकार यह जान सके कि उसे किस मामले का उत्तर देना है।
- यह विधि का एक मूलभूत सिद्धांत है कि सभी महत्त्वपूर्ण तथ्य एवं आवश्यक विशिष्टताएँ अभिवचनों में स्पष्ट रूप से उल्लिखित हों; तथा न्यायालय ऐसे तथ्यों अथवा आधारों पर निर्णय नहीं कर सकता जो अभिवचनों में वर्णित नहीं किये गए हों।
आदेश 6 का नियम 17 क्या है?
- आदेश 6 का नियम 17 विशेष रूप से न्यायालय में याचिका दायर किये जाने के पश्चात् अभिवचनों में संशोधन या परिवर्तन से संबंधित है ।
- यह नियम न्यायालय को यह विवेकाधीन शक्ति प्रदान करता है कि वह कार्यवाही के किसी भी प्रक्रम में किसी भी पक्षकार को अपने अभिवचनों में परिवर्तन या संशोधन करने की अनुमति दे, बशर्ते कि ऐसा संशोधन पक्षकारों के बीच विवाद के वास्तविक प्रश्नों का अवधारण करने के लिये न्यायसंगत और आवश्यक हो।
- न्यायालय उचित समझे जाने वाले तरीके से और ऐसी शर्तों पर अभिवचनों में संशोधन की अनुमति दे सकता है, यह सुनिश्चित करते हुए कि पक्षकारों के बीच विवाद के वास्तविक प्रश्नों को हल करने के लिये सभी आवश्यक संशोधन किये गए हैं।
- तथापि, एक महत्त्वपूर्ण प्रतिबंध यह है कि विचारण के प्रारंभ के पश्चात् किसी संशोधन आवेदन को तब तक अनुमति नहीं दी जाएगी, जब तक न्यायालय इस बात से संतुष्ट न हो जाए कि पक्षकार द्वारा सम्यक् तत्परता का प्रयोग करते हुए भी विचारण के प्रारंभ से पूर्व उस विषय को उठाना संभव नहीं था।
- सम्यक् तत्परता का अर्थ यह है कि संबंधित पक्षकार यह प्रदर्शित करे कि उसने समुचित प्रयास किये तथा आवश्यक जाँच-पड़ताल की, फिर भी अपनी किसी त्रुटि के बिना वह उक्त विषय को पहले खोजने अथवा उठाने में असमर्थ रहा।
- नियम 17 का प्रमुख उद्देश्य वादों की बहुलता को कम करना, न्यायिक कार्यवाही में विलंब को न्यूनतम करना तथा पक्षकारों को एक ही कार्यवाही में अपने मामले को पूर्ण रूप से प्रस्तुत करने का अवसर प्रदान करना है।
- यह नियम एक ओर न्यायिक कार्यवाही की अंतिमता की आवश्यकता तथा दूसरी ओर इस सिद्धांत के मध्य संतुलन स्थापित करता है कि न्याय वास्तविक तथ्यों एवं वास्तविक विवादों के आधार पर किया जाना चाहिये।