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अंतर्राष्ट्रीय नियम
ऑस्ट्रेलिया के घृणास्पद भाषण और आग्नेयास्त्र नियंत्रण विधि: बॉन्डी बीच नरसंहार के प्रति सुरक्षा-आधारित विधिक प्रतिक्रिया
«21-Jan-2026
स्रोत: द इंडियन एक्सप्रेस
परिचय
21 जनवरी, 2026 को, ऑस्ट्रेलिया की संसद ने सिडनी में एक यहूदी उत्सव के दौरान हुए दुखद बोंडी बीच नरसंहार के जवाब में व्यापक घृणास्पद भाषण-विरोधी और बंदूक नियंत्रण विधान पारित किया, जिसमें 15 लोगों की जान चली गई थी। अधिकारियों द्वारा इस्लामी चरमपंथी समूह से प्रेरित घटना के रूप में वर्णित इस हमले को दो हमलावरों ने अंजाम दिया था, जिसके बाद हथियारों की उपलब्धता और घृणास्पद भाषण के प्रसार दोनों को रोकने के लिये तत्काल विधायी कार्रवाई की गई।
प्रमुख विधायी उपाय क्या थे?
बंदूक नियंत्रण संबंधी विधान:
- स्वामित्व संबंधी प्रतिबंध: ऑस्ट्रेलिया में नए आग्नेयास्त्र विधियों के अधीन बंदूक रखने पर कड़े नियंत्रण अधिरोपित किये गए हैं। प्रमुख प्रावधानों में व्यापक पृष्ठभूमि जांच, अनिवार्य लाइसेंसिंग आवश्यकताएँ और नागरिकों के लिये उपलब्ध आग्नेयास्त्रों के प्रकारों पर प्रतिबंध शामिल हैं।
- सरकारी पुनर्खरीदी कार्यक्रम: इस विधायी व्यवस्था का एक केंद्रीय तत्त्व सरकार द्वारा वित्तपोषित शस्त्र पुनर्खरीदी कार्यक्रम है, जिसके अंतर्गत स्वेच्छा से अपने आग्नेयास्त्र समर्पित करने वाले नागरिकों को प्रतिकर प्रदान किया जाता है। इस तंत्र का उद्देश्य नागरिकों के पास उपलब्ध हथियारों की कुल संख्या को कम करना है, साथ ही बिना प्रतिकर के बलपूर्वक अधिग्रहण से बचना भी है।
- विशिष्ट मामले में अनुप्रयोग: विधान में ऐसे प्रावधान सम्मिलित हैं, जिनके अंतर्गत बॉन्डी बीच हमलावरों को वैधानिक रूप से आग्नेयास्त्र रखने से रोका जा सकता था। प्राधिकरणों ने पुष्टि की कि सैजिद अकरम (50 वर्ष) तथा उसका पुत्र नवीनद अकरम (24 वर्ष) नए विधिक ढाँचे के अंतर्गत शस्त्र लाइसेंस प्राप्त करने की पात्रता नहीं रखते।
घृणास्पद भाषण विरोधी विधान:
- आतंकवाद की विस्तारित परिभाषा: घृणा-भाषण विरोधी विधेयक के माध्यम से ऑस्ट्रेलिया में आतंकवादी संगठनों एवं प्रतिबंधित समूहों की विधिक परिभाषा का विस्तार किया गया है। यह विधान विशेष रूप से हिज़्ब-उत-तहरीर जैसे संगठनों को लक्षित करता है, जिन पर प्राधिकारियों द्वारा हमले को प्रेरित करने का आरोप लगाया गया, यद्यपि वे पूर्व में कुछ देशों में प्रतिबंधित घोषित किये जा चुके थे।
- ऑनलाइन सामग्री विनियमन: यह विधान डिजिटल मंचों के माध्यम से घृणा-भाषण के प्रसार को नियंत्रित करने का प्रावधान करता है, यह स्वीकार करते हुए कि उग्रवादी विचारधाराएँ प्रायः भौतिक हिंसा में परिणत होने से पूर्व ऑनलाइन माध्यमों से फैलती हैं।
- आपराधिक दायित्त्व: यह विधि आतंकवादी कृत्यों के संपादन अथवा उनके लिये उकसाने वाले व्यक्तियों हेतु स्पष्ट आपराधिक दायित्त्व निर्धारित करता है तथा घृणा-प्रेरित अपराधों के लिये दण्डात्मक प्रावधानों को अधिक कठोर बनाता है।
भारत में घृणास्पद भाषण से संबंधित विधिक प्रावधान क्या हैं?
बारे में:
- 267वीं विधि आयोग की रिपोर्ट (2017) के अनुसार, घृणास्पद भाषण का अर्थ ऐसे शब्द या कार्य हैं जिनका उद्देश्य मूलवंश, जातीयता, लिंग, धर्म, यौन अभिविन्यास आदि के आधार पर समूहों के विरुद्ध घृणा उत्पन्न करना है।
- इस प्रकार, इसमें बोले गए या लिखे गए शब्द, संकेत या दृश्य सम्मिलित हैं जिनका उद्देश्य भय उत्पन्न करना, हिंसा भड़काना या घृणा उत्पन्न करना है।
सांविधानिक ढाँचा:
- अनुच्छेद 19(1)(क) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुनिश्चित करता है, जबकि अनुच्छेद 19(2) संप्रभुता, अखंडता, लोक व्यवस्था, नैतिकता, गरिमा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों की रक्षा हेतु और मानहानि, न्यायालय की अवमानना, या अपराधों को उकसाने से रोकने के लिये उचित सीमाएँ निर्धारित करता है।
विधिक ढाँचा:
- भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023: भारतीय न्याय संहिता की धारा 196 (पूर्व में भारतीय दण्ड संहिता (IPC), 1860 की धारा 153क) धर्म, मूलवंश, भाषा आदि के आधार पर समूहों के बीच शत्रुता को बढ़ावा देने को दण्डित करती है।
- धारा 299 (पूर्व में भारतीय दण्ड संहिता 295क) धार्मिक भावनाओं का अपमान करने के उद्देश्य से जानबूझकर किये गए कृत्यों को दण्डनीय बनाती है।
- सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000: इस अधिनियम की धारा 66क का प्रयोग ऑनलाइन घृणास्पद भाषण के लिये किया गया था, परंतु अस्पष्टता के कारण श्रेया सिंघल मामले, 2015 में इसे निरस्त कर दिया गया था।
- जन प्रतिनिधित्व अधिनियम (RPA), 1951: जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 8 उन लोगों को प्रतिबंधित करती है जो धर्म, मूलवंश, जन्मस्थान, निवास स्थान या भाषा के आधार पर समूहों के बीच वैमनस्य फैलाने अथवा सामाजिक समरसता को क्षति पहुँचाने के अपराध में दोषसिद्ध व्यक्ति को निर्वाचन के लिये अयोग्य ठहराया जाता है।
- अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989: यह अधिनियम अनुसूचित जाति अथवा अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य का जानबूझकर अपमान या सार्वजनिक रूप से अपमानित करने को दण्डनीय अपराध घोषित करता है।
- सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955: यह अधिनियम शब्दों, संकेतों, दृश्य प्रस्तुतीकरणों अथवा अन्य किसी माध्यम से अस्पृश्यता को प्रोत्साहित या उकसाने वाले कृत्यों के लिये दण्ड का प्रावधान करता है।
प्रमुख निर्णय:
- शाहीन अब्दुल्ला बनाम भारत संघ और अन्य (2022): उच्चतम न्यायालय ने नफरत के बढ़ते माहौल को देखते हुए पुलिस को औपचारिक परिवादों की प्रतीक्षा किये बिना स्वतः संज्ञान लेने का निदेश दिया।
- तहसीन एस. पूनावाला बनाम भारत संघ (2018): उच्चतम न्यायालय ने भारतीय दण्ड संहिता की धारा 153 और 295क के अधीन घृणा-भाषण से प्रेरित भीड़ हिंसा से निपटने के लिये दिशानिर्देश जारी किये, जिसमें लिंचिंग और गौ रक्षा के नाम पर हिंसा को रोकने के लिये एक जिला नोडल अधिकारी की नियुक्ति भी सम्मिलित है।
- प्रवासी भलाई संगठन बनाम भारत संघ (2014): उच्चतम न्यायालय ने विधि आयोग से घृणास्पद भाषण को परिभाषित करने पर विचार करने और निर्वाचन आयोग को इसे रोकने के लिये सशक्त बनाने के तरीकों की सिफारिश करने को कहा।
- श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ (2015): उच्चतम न्यायालय ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 66क को निरस्त करते हुए यह माना कि “झुँझलाहट” एवं “अपमान” जैसे शब्द अत्यधिक अस्पष्ट हैं और अनुच्छेद 19(2) के अंतर्गत युक्तिसंगत निर्बंधन की कसौटी पर खरे नहीं उतरते।
निष्कर्ष
बॉन्डी बीच त्रासदी के उपरांत ऑस्ट्रेलिया की विधायी प्रतिक्रिया इस तथ्य को रेखांकित करती है कि लोकतांत्रिक व्यवस्थाएँ सुरक्षा संकटों की स्थिति में स्वतंत्रता और संरक्षण के मध्य संतुलन का पुनः समायोजन किस प्रकार करती हैं। घृणा-भाषण विरोधी तथा आग्नेयास्त्र नियंत्रण संबंधी उपायों का त्वरित विधायी अधिनियमन इस राजनीतिक सहमति को प्रतिबिंबित करता है कि सामूहिक सुरक्षा को सुदृढ़ करने हेतु व्यक्तिगत स्वतंत्रताओं पर कुछ युक्तिसंगत निर्बंधन अधिरोपित किया जाना औचित्यपूर्ण है।
भारत का विधिक ढाँचा, यद्यपि एक दीर्घ ऐतिहासिक विकास-क्रम के माध्यम से निर्मित हुआ है, तथापि वह भी हिंसा की रोकथाम के साथ-साथ सांविधानिक अधिकारों की रक्षा के प्रति ऑस्ट्रेलिया के समान मूलभूत प्रतिबद्धता साझा करता है। दोनों ही राष्ट्रों में यह चुनौती निरंतर बनी रहती है कि लोकतंत्र के मूल्यों की रक्षा करते हुए उन स्वतंत्रताओं को अक्षुण्ण रखा जाए, जो स्वयं लोकतांत्रिक व्यवस्था की पहचान हैं।
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