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आपराधिक कानून

विधिविरुद्ध सभा

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 12-Jun-2024

परिचय:

विधिविरुद्ध सभा का अर्थ है पाँच या उससे अधिक लोगों की सभा जिसका उद्देश्य कोई विधिविरुद्ध कार्य करना अथवा विधिविरुद्ध तरीकों से कोई वैध काम करना हो। भारतीय दण्ड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 141 विधिविरुद्ध सभा से संबंधित है।

IPC की धारा 141:

  • भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 141 में 'विधिविरुद्ध सभा' शब्द को पाँच या इस से अधिक व्यक्तियों की सभा के रूप में परिभाषित किया गया है, जिसका समान उद्देश्य किसी विधिविरुद्ध कार्य करना अथवा विधिविरुद्ध तरीकों से कोई वैध कार्य करना होता है।
  • भारतीय दण्ड संहिता की धारा 141 के अनुसार, जो सभा एकत्रित होते समय विधिविरुद्ध नहीं थी, वह बाद में विधिविरुद्ध सभा बन सकती है।
  • धारा 141 का उद्देश्य सार्वजनिक शांति एवं व्यवस्था बनाए रखना है।

आवश्यक तत्त्व:

  • पाँच या इस से अधिक व्यक्ति:
    • सभा में पाँच या उससे अधिक व्यक्ति शामिल होने चाहिये।
  • समान उद्देश्य:
    • सभी सदस्यों का एक समान उद्देश्य होना चाहिये जो निम्नलिखित श्रेणियों में से किसी एक के अंतर्गत आता हो:
    • केंद्र या किसी राज्य सरकार या संसद या किसी राज्य के विधानमंडल या किसी लोक सेवक को, जो वैध शक्ति का प्रयोग कर रहा हो, आपराधिक बल या आपराधिक बल के प्रदर्शन से भयभीत करना।
    • किसी भी विधि या किसी भी विधिक प्रक्रिया के क्रियान्वयन का विरोध करना
    • कोई कुचेष्टा (रिष्टि) या आपराधिक अतिचार या अन्य अपराध करना।
    • किसी व्यक्ति पर आपराधिक बल या आपराधिक बल के प्रदर्शन के माध्यम से उसकी किसी संपत्ति को लेना या उस पर कब्ज़ा प्राप्त करना, या किसी व्यक्ति को रास्ते के अधिकार या पानी के उपयोग या अन्य अमूर्त अधिकार से वंचित करना, जिसका वह कब्ज़ा या उपभोग करता है, या किसी अधिकार या कथित अधिकार को लागू करना।
    • आपराधिक बल या आपराधिक बल के प्रदर्शन के माध्यम से किसी व्यक्ति को ऐसा करने के लिये बाध्य करना जिसे करने के लिये वह विधिक रूप से बाध्य नहीं है, या ऐसा करने से रोकना जिसे करने का वह विधिक रूप से अधिकारी है।
  • विधिविरुद्ध सभा का सदस्य होना:
    • भारतीय दण्ड संहिता की धारा 142 के अनुसार, जो कोई भी व्यक्ति, ऐसे तथ्यों से अवगत होते हुए जो तथ्य किसी सभा को विधिविरुद्ध सभा बनाते हैं, जानबूझ कर उस सभा में शामिल होता है, या उसमें बना रहता है, वह विधिविरुद्ध सभा का सदस्य कहा जाता है।
  • दण्ड एवं अर्थदण्ड:
    • धारा 143: जो कोई भी विधिविरुद्ध सभा का सदस्य होगा, उसे किसी एक अवधि के लिये कारावास से, जो छह माह तक की हो सकेगी, या अर्थदण्ड से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।
    • धारा 144: जो कोई किसी ऐसे घातक हथियार से लैस होकर, जिससे मृत्यु होने की संभावना हो, विधिविरुद्ध सभा में शामिल होगा, उसे दो वर्ष तक के कारावास या अर्थदण्ड या दोनों से दण्डित किया जाएगा।
    • धारा 145: जो कोई व्यक्ति किसी विधिविरुद्ध सभा में यह जानते हुए भी शामिल होगा या उसमें बना रहेगा कि ऐसी सभा को भंग हो जाने का आदेश दिया गया है, उसे दो वर्ष तक के कारावास या अर्थदण्ड या दोनों से दण्डित किया जाएगा।
    • धारा 149: जहाँ कोई अपराध विधिविरुद्ध सभा के किसी सदस्य द्वारा किया जाता है और उस सभा के सदस्यों को इस बात का पता था कि ऐसा अपराध किया जाना संभाव्य है, वहाँ ऐसा प्रत्येक व्यक्ति, जो उस अपराध के किये जाने के समय उसी सभा का सदस्य है, उस अपराध का दोषी है।

निर्णयज विधियाँ:

  • मोती दास बनाम बिहार राज्य (1954) मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि जो सभा प्रारंभ में वैध थी, वह अपने सदस्यों के बाद के कार्यों के कारण अवैध हो सकती है।
  • मसाल्टी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1964) में, उच्चतम न्यायालय ने "समान आशय" और "समान उद्देश्य" के बीच के अंतर को विस्तार से समझाया तथा स्पष्ट किया कि समान उद्देश्य में सभा के सदस्यों के बीच एक साझा उद्देश्य शामिल होता है, जिसके लिये पूर्व सहमति या आम सहमति की आवश्यकता नहीं होती है।
  • अलाउद्दीन मियाँ एवं अन्य शरीफ मियाँ एवं अन्य बनाम बिहार राज्य (1989):
    • उच्चतम न्यायालय ने कहा कि धारा 149 को लागू करने के लिये यह दर्शाया जाना चाहिये कि अपराध करने वाला कृत्य विधिविरुद्ध सभा के समान उद्देश्य को पूरा करने के लिये किया गया था।
    • यहाँ तक ​​कि यदि समान उद्देश्य से संबंधित कोई कार्य विधिविरुद्ध सभा के समान उद्देश्य को पूरा करने के लिये किया जाता है, तो यह अन्य सदस्यों के ज्ञान में होना चाहिये, क्योंकि यह समान उद्देश्य की पूर्ति के लिये किया गया कार्य है।
  • राज नाथ बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2009) में, उच्चतम न्यायालय ने माना कि जहाँ विधिविरुद्ध सभा का समान उद्देश्य सिद्ध नहीं होता है, वहाँ आरोपी व्यक्तियों को IPC की धारा 149 की मदद से दोषी नहीं ठहराया जा सकता है।
  • उत्तर प्रदेश राज्य बनाम नियामत एवं अन्य (1987) में उच्चतम न्यायालय ने माना कि किसी निर्दोष व्यक्ति को अविधिक पुलिस अभिरक्षा से बचाने के समान उद्देश्य से लोगों का एकत्र होना भारतीय दण्ड संहिता की धारा 141 के अंतर्गत विधिविरुद्ध सभा नहीं माना जा सकता।

निष्कर्ष:

IPC के अंतर्गत विधिविरुद्ध सभा एक व्यापक प्रावधान है जिसका उद्देश्य सार्वजनिक शांति और व्यवस्था को खतरा पहुँचाने वाली सामूहिक कार्रवाइयों पर अंकुश लगाना है। ऐसी सभाओं की स्थितियों और परिणामों को रेखांकित करके, IPC यह सुनिश्चित करता है कि विधि सामाजिक सद्भाव बनाए रखने के निवारक और दण्डात्मक दोनों आयामों को संबोधित करता है। इन प्रावधानों की बारीकियों को समझना विधिक प्रवर्तन, न्यायपालिका और जनता के लिये न्याय तथा व्यवस्था के सिद्धांतों को बनाए रखने के लिये महत्त्वपूर्ण है।