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आपराधिक कानून
न्यायालय कार्यवाही में प्रतिभू का प्रतिरूपण
«27-Jan-2026
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शैलेंद्र शर्मा और अन्य बनाम मेसर्स इंडस रेजिडेंसी प्राइवेट लिमिटेड और अन्य "यद्यपि निष्पादन न्यायालय प्रतिरूपण के मामले की अन्वेषण के लिये पुलिस अधिकारियों को निदेश दे सकता है, किंतु प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करने का विवेकाधिकार पुलिस अधिकारियों पर नहीं छोड़ा जाना चाहिये, अपितु अन्वेषण रिपोर्ट प्राप्त होने के बाद यह न्यायालय के पास ही रहना चाहिये।" न्यायमूर्ति विवेक जैन |
स्रोत: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
शैलेंद्र शर्मा और अन्य बनाम मेसर्स इंडस रेजिडेंसी प्राइवेट लिमिटेड और अन्य (2026) के मामले में न्यायमूर्ति विवेक जैन की पीठ ने न्यायालय की कार्यवाही में प्रतिभू के कथित प्रतिरूपण के मामले में अपनाई जाने वाली प्रक्रिया के संबंध में निष्पादन न्यायालय के आदेश को संशोधित किया, और ऐसे मामलों में न्यायिक पर्यवेक्षण के महत्त्व पर बल दिया
शैलेंद्र शर्मा और अन्य बनाम मेसर्स इंडस रेजिडेंसी प्राइवेट लिमिटेड और अन्य (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- याचिकाकर्त्ताओं (डिक्रीदारों) ने एक वाद में प्रत्यर्थियों (निर्णीत ऋणियों) के विरुद्ध धन वसूली की डिक्री प्राप्त की थी।
- विचारण न्यायालय द्वारा पारित निर्णय और डिक्री के विरुद्ध प्रथम अपील संख्या 442/2022 दायर की गई थी और यह मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के समक्ष लंबित थी।
- प्रथम अपील में पारित अंतरिम आदेश के अनुसार, निर्णीत ऋणियों ने निष्पादन न्यायालय के समक्ष 35.25 लाख रुपए की डिक्री राशि का एक भाग जमा किया।
- निष्पादन न्यायालय ने आदेश दिया कि जुगल किशोर द्वारा सक्षम प्रतिभू प्रस्तुत करने पर राशि डिक्रीदारों को वितरित की जाए।
- बाद में यह पता चला कि जिस कृषि भूमि को प्रतिभूति के रूप में दर्शाया गया था, उस पर एक ही व्यक्ति द्वारा कुल 9 प्रतिभूति दी गई थीं।
- तत्पश्चात, जुगल किशोर स्वयं निष्पादन न्यायालय के समक्ष उपस्थित हुआ और कहा कि उसने कभी भी ऐसी कोई प्रतिभूति नहीं दी थी और किसी अन्य व्यक्ति ने 35.25 लाख रुपए की प्रतिभूति देते समय उनका रूप धारण किया था।
- तत्पश्चात निर्णीत ऋणियों ने धारा 379 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (धारा 340 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अनुरूप) के अधीन एक आवेदन दायर कर भारतीय दण्ड संहिता की विभिन्न धाराओं के अधीन डिक्रीदारों और प्रतिरूपण प्रतिभू के विरुद्ध अभियोजन की मांग की।
- 18.11.2025 को निष्पादन न्यायालय ने आदेश पारित करते हुए निदेश दिया कि प्रतिरूपण के मामले की पुलिस द्वारा जांच की जाए, और यदि पुलिस को पता चलता है कि प्रतिभूति बंधपत्र कपटपूर्ण प्रस्तुत किया गया है, तो उन्हें प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करनी चाहिये और आगे की कार्यवाही करनी चाहिये।
- डिक्रीदारों ने इस याचिका के माध्यम से इस आदेश को चुनौती दी, यह तर्क देते हुए कि निष्पादन न्यायालय को प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करने का विवेकाधिकार पुलिस अधिकारियों को नहीं देना चाहिये था।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- न्यायालय ने कहा कि कथित अपराध, ₹ 35.25 लाख की आंशिक डिक्री राशि के वितरण हेतु निष्पादन न्यायालय के समक्ष प्रतिभू के प्रतिरूपण के माध्यम से किया गया था।
- न्यायालय ने टिप्पणी की कि एक पुलिस अधिकारी न्यायालय में या न्यायालय की कार्यवाही के संबंध में अपराध किये जाने के बाद भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 215 के अधीन अपराधों के लिये सीधे अपराध दर्ज नहीं कर सकता है ।
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 379 के अनुसार, न्यायालय को प्रारंभिक जांच करानी होगी और उसके बाद वह लिखित में परिवाद दर्ज करा सकता है।
- न्यायालय ने पाया कि वर्तमान मामले में, निष्पादन न्यायालय ने कोई पूछताछ नहीं की थी, न ही कोई प्रथम दृष्टया संतुष्टि दर्ज की थी, और उसने केवल पुलिस अधिकारियों को अन्वेषण करने और एक रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निदेश दिया था।
- तथापि न्यायालय अपने विवेक से पुलिस अधिकारियों को मामले का अन्वेषण करने और रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निदेश दे सकता है, न्यायालय ने कहा कि प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करने का विवेक पुलिस अधिकारियों के विवेक पर नहीं छोड़ा जाना चाहिये था।
- न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि पुलिस अधिकारियों से प्रारंभिक जांच रिपोर्ट प्राप्त होने के पश्चात् न्यायालय को ही इस मामले पर विचार करना होगा।
- न्यायालय ने दिनांक 18.11.2025 के विवादित आदेश में इस हद तक संशोधन किया कि एम.पी. नगर, भोपाल पुलिस थाने का संबंधित पुलिस अधिकारी मामले की अन्वेषण कर सकता है, परंतु कोई भी प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करने से पहले, अन्वेषण रिपोर्ट निष्पादन न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की जाएगी।
- न्यायालय ने निदेश दिया कि प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) केवल निष्पादन न्यायालय के आदेशों के अधीन ही दर्ज की जाएगी, न कि पुलिस अधिकारियों द्वारा स्वतः संज्ञान से।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 215 और 379 क्या हैं?
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 215 (पूर्व में दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 195) के बारे में:
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 215 में "लोक न्याय के विरुद्ध अपराधों के लिये और साक्ष्य में दिये गए दस्तावेज़ों से संबंधित अपराधों के लिये लोक सेवकों के विधिपूर्ण प्राधिकार के अवमान के लिये अभियोजन" का उपबंध है।
मुख्य उपबंध:
उचित परिवाद के बिना कोई भी न्यायालय निम्नलिखित मामलों में संज्ञान नहीं लेगा:
- भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 206 से 223 तक (धारा 209 के सिवाय) के अंतर्गत दण्डनीय अपराध, जो कि लोक सेवकों के विधिपूर्ण प्राधिकार की अवमान से संबंधित हैं।
- उक्त अपराधों के लिये दुष्प्रेरण, प्रयत्न अथवा आपराधिक षड्यंत्र।
- इस प्रकार के संज्ञान के लिये संबंधित लोक सेवक या उनके प्रशासनिक वरिष्ठ अधिकारी या अधिकृत लोक सेवक से लिखित परिवाद की आवश्यकता होती है।
न्यायालय की कार्यवाही में या उससे संबंधित किये गए अपराधों के लिये:
- भारतीय न्याय संहिता की धारा 229 से 233, 236, 237, 242 से 248 और 267 के अधीन अपराध, जब किसी न्यायालय की कार्यवाही में या उसके संबंध में किये जाते हैं।
- भारतीय न्याय संहिता की धारा 336(1), धारा 340(2), या धारा 342 के अधीन अपराध, जब न्यायालय में साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत या दिये गए दस्तावेज़ों के संबंध में किये जाते हैं।
- उपर्युक्त अपराधों के लिये आपराधिक षड्यंत्र, प्रयत्न या दुष्प्रेरण करना।
- संज्ञान लेने के लिये उस न्यायालय, या उस न्यायालय द्वारा अधिकृत अधिकारी, या उच्चतर न्यायालय से लिखित परिवाद आवश्यक है।
परिवाद वापस लेना:
- जहाँ किसी लोक सेवक द्वारा खण्ड (क) के अंतर्गत परिवाद किया जाता है, वहाँ कोई उच्च अधिकारी परिवाद वापस लेने का आदेश दे सकता है।
- वापसी आदेश की प्रति न्यायालय को भेजी जानी चाहिये।
- वापसी आदेश प्राप्त होने के बाद आगे कोई कार्यवाही नहीं की जाएगी।
- प्रथम दृष्टया विचारण समाप्त हो जाने के पश्चात् वापसी का आदेश नहीं दिया जा सकता।
"न्यायालय" की परिभाषा:
- इसमें सिविल, राजस्व या आपराधिक न्यायालय सम्मिलित हैं।
- इसमें वे अधिकरण भी सम्मिलित होंगे, जो केंद्रीय अथवा राज्य अधिनियमों के अंतर्गत गठित किये गए हों, बशर्ते उन्हें इस धारा के प्रयोजनों के लिये न्यायालय घोषित किया गया हो।
न्यायालयों की अधीनता:
- कोई न्यायालय उस न्यायालय के अधीनस्थ माना जाएगा, जिसमें उसके डिक्री या दण्डादेश के विरुद्ध सामान्यतः अपील प्रस्तुत की जाती है।
- ऐसे सिविल न्यायालय, जिनके आदेशों के विरुद्ध अपील का प्रावधान नहीं है, उन्हें उस क्षेत्र के प्रधान सिविल मूल अधिकारिता न्यायालय के अधीनस्थ माना जाएगा।
- जहाँ एक से अधिक अपीलीय न्यायालय हों, वहाँ निम्नतर अधिकारिता वाला अपीलीय न्यायालय, उच्चतर न्यायालय माना जाएगा।
- जहाँ सिविल और राजस्व दोनों न्यायालयों में अपील की जा सकती है, वहाँ अधीनता मामले की प्रकृति पर निर्भर करती है।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 379 (पूर्व में दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 340) के बारे में:
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 379 में "धारा 215 में उल्लिखित मामलों में प्रक्रिया" का उल्लेख किया गया है।
मुख्य उपबंध:
न्यायालय कब जांच प्रारंभ कर सकता है:
- न्यायालय उसके समक्ष प्रस्तुत आवेदन पर अथवा स्वतः संज्ञान से कार्यवाही प्रारंभ कर सकता है।
- न्यायालय को यह मत बनाना आवश्यक है कि न्याय के हित में जांच करना समीचीन है।
- धारा 215(1)(ख) के अंतर्गत आने वाले अपराधों पर लागू होता है - न्यायालय की कार्यवाही में या उससे संबंधित अपराध।
- अपराध उस न्यायालय में हुई कार्यवाही में या उससे संबंधित कार्यवाही में, या उस न्यायालय में साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत या दिये गए किसी दस्तावेज़ के संबंध में किया गया प्रतीत होना चाहिये।
प्रारंभिक जांच के पश्चात् की प्रक्रिया:
न्यायालय द्वारा आवश्यक समझी जाने वाली प्रारंभिक जांच करने के पश्चात्, न्यायालय निम्नलिखित कार्य कर सकता है:
- यह अभिलिखित करना कि अपराध किया गया है।
- उसके संबंध में लिखित परिवाद प्रस्तुत करना ।
- परिवाद को अधिकारिता रखने वाले प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट के पास प्रेषित करना।
- अभियुक्त की मजिस्ट्रेट के समक्ष पेशी के लिये पर्याप्त प्रतिभूति की व्यवस्था करना।
- यदि कथित अपराध अजमानतीय है और न्यायालय आवश्यक समझे, तो अभियुक्त को अभिरक्षा में लेकर ऐसे मजिस्ट्रेट के पास भेजना।
- किसी भी व्यक्ति को ऐसे मजिस्ट्रेट के समक्ष उपस्थित होने और साक्ष्य देने के लिये बाध्य करना।
उच्चतर न्यायालय की शक्ति:
- यदि न्यायालय ने न तो कोई परिवाद दर्ज किया है और न ही ऐसा परिवाद दर्ज करने के लिये आवेदन को नामंजूर किया है।
- उच्चतर न्यायालय (धारा 215(4) के अर्थ में) उपधारा (1) के अधीन प्रदत्त शक्ति का प्रयोग कर सकता है।
- यह प्रावधान अनुक्रमिक न्यायिक पर्यवेक्षण सुनिश्चित करता है।
परिवाद पर हस्ताक्षर:
- यदि परिवादकर्त्ता न्यायालय उच्च न्यायालय है: तो परिवाद पर न्यायालय द्वारा नियुक्त अधिकारी के हस्ताक्षर होंगे।
- अन्य किसी भी मामले में: न्यायालय के पीठासीन अधिकारी या न्यायालय द्वारा लिखित रूप से अधिकृत अधिकारी द्वारा हस्ताक्षर होने चाहिये।
परिभाषा:
- "न्यायालय" का वही अर्थ है जो धारा 215 में है (इसमें सिविल, राजस्व, आपराधिक न्यायालय और निर्दिष्ट अधिकरण सम्मिलित हैं) ।
सामान्य आपराधिक प्रक्रिया से मुख्य अंतर:
- पुलिस इन अपराधों के लिये सीधे प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज नहीं कर सकती।
- न्यायालय को प्रारंभिक जांच करनी चाहिये और अपने न्यायिक विवेक का प्रयोग करना चाहिये।
- लिखित परिवाद दर्ज करने से पहले न्यायालय को प्रथम दृष्टया संतुष्टि दर्ज करनी होगी।
- यह संपूर्ण व्यवस्था न्यायिक पर्यवेक्षण सुनिश्चित करती है तथा तुच्छ, दुर्भावनापूर्ण अथवा प्रेरित अभियोजनों को रोकने हेतु अभिप्रेत है।