आज ही एडमिशन लें बिहार APO (प्रिलिम्स + मेन्स) कोर्स में और अपने सपनों को दे नई दिशा | ऑफलाइन एवं ऑनलाइन मोड में उपलब्ध | 12 जनवरी 2026  से कक्षाएँ आरंभ   |   इस रिपब्लिक डे, पाएँ सभी ऑनलाइन कोर्सेज़ और टेस्ट सीरीज़ पर 50% तक की भारी छूट। ऑफर केवल 24 से 27 जनवरी तक वैध।   |   एडमिशन ओपन: UP APO प्रिलिम्स + मेंस कोर्स 2025, बैच 6th October से   |   ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स (प्रयागराज)   |   अपनी सीट आज ही कन्फर्म करें - UP APO प्रिलिम्स कोर्स 2025, बैच 6th October से










होम / करेंट अफेयर्स

सिविल कानून

कृत्रिम बुद्धिमत्ता द्वारा उत्पन्न नकली उद्धरणों का प्रयोग

    «
 23-Jan-2026

गुम्मदी उषा रानी बनाम श्योर मल्लिकार्जुन राव 

"केवल इस कारण से कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) उपकरण के उपयोग के परिणामस्वरूपसमुचित सत्यापन के अभाव मेंअस्तित्वहीन उद्धरणों का संदर्भ लिया गयाआदेश दूषित नहीं माना जाएगायदि आदेश में प्रतिपादित विधि तथा तथ्यों पर उसका अनुप्रयोग सही हो।" 

न्यायमूर्ति रवि नाथ तिलहारी 

स्रोत: आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति रवि नाथ तिलहारी ने गुम्माडी उषा रानी बनाम सुरे मल्लिकार्जुन राव (2025)के मामले मेंयह निर्णय दिया कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) द्वारा उत्पन्न अस्तित्वहीन उद्धरणों का मात्र उल्लेखकिसी आदेश को दूषित नहीं करतायदि आदेश में विचारित विधि सही हो तथा वाद के तथ्यों पर विधि के अनुप्रयोग में कोई त्रुटि न हो।  

गुम्माडी उषा रानी बनाम श्योर मल्लिकार्जुन राव (2025) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • विचारण न्यायालय ने एक वाद में अधिवक्ता आयुक्त की रिपोर्ट को स्वीकार किया था 
  • आदेश पारित करते समयन्यायिक अधिकारी ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) द्वारा उत्पन्न उद्धरणों परपश्चातवर्ती सत्यापन किये बिनाविश्वास किया।  
  • इसके परिणामस्वरूप आदेश में उन अधिकारियों को सम्मिलित कर लिया गया जिनका कोई अस्तित्व ही नहीं था। 
  • न्यायिक अधिकारी ने फिर भी रिपोर्ट को बरकरार रखते हुए कारण बताए थे। 
  • विचारण न्यायालय ने कहा कि अधिवक्ता आयुक्त की रिपोर्ट एक महत्त्वपूर्ण साक्ष्य है। 
  • इस रिपोर्ट की जांच अन्य साक्ष्यों के आलोक में की जा सकती है और विचारण के प्रक्रम पर इस पर विचार किया जाएगा। 
  • रिपोर्ट को केवल तभी नामंजूर किया जाएगा जब उसमें पूर्वाग्रह या अवचार के लक्षण पाए जाएंगे। 
  • याचिकाकर्त्ताओं ने विचारण न्यायालय के आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती दी। 
  • यह चुनौती इस आधार पर दी गई कि विचारण न्यायालय द्वारा जिन उद्धरणों पर विश्वास किया गयावे अस्तित्व में नहीं थे 
  • याचिकाकर्त्ताओं ने तर्क दिया कि यह आदेश अस्तित्वहीन उद्धरणों पर निर्भर होने के कारण अपास्त किये जाने योग्य है। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • न्यायालय ने यह टिप्पणी की कि यद्यपि उद्धरण अस्तित्वहीन हो सकते हैंकिंतु यदि विचारण न्यायालय ने विधि के सही सिद्धांतों पर विचार किया है तथा तथ्यों पर विधि का अनुप्रयोग भी सही हैतो आदेश में गलत या अस्तित्वहीन निर्णयों अथवा उद्धरणों का मात्र उल्लेख आदेश को अपास्त करने का आधार नहीं बन सकता।  
  • न्यायालय ने माना कि हस्तक्षेप तभी उचित होगा जब लागू किया गया विधि का सिद्धांत देश की विधि न हो या किसी दिये गए मामले में उसका अनुप्रयोग कृत्रिम बुद्धिमत्ता द्वारा उत्पन्न अस्तित्वहीन निर्णयों पर निर्भर होने के कारण त्रुटिपूर्ण हो। 
  • न्यायालय ने कहा कि न्यायिक अधिकारी ने विधि द्वारा समर्थित तर्कसंगत आदेश दिया था।  
  • आदेश में अभिलिखित कारण तथा विचारण न्यायालय द्वारा अपनाया गया दृष्टिकोण पूर्णतः औचित्यपूर्ण था और उसे विधि का समर्थन प्राप्त था 
  • न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि अधिवक्ता आयुक्त की रिपोर्ट साक्ष्य का एक अंग हैजिस पर अंतिम सुनवाई के समयउठाई गई आपत्तियों एवं अभिलेख पर उपलब्ध साक्ष्यों के अधीनविचार किया जाना है 
  • याचिकाकर्त्ता प्रतिपरीक्षा के माध्यम से रिपोर्ट के विरुद्ध आपत्तियाँ उठा सकते हैं 
  • वर्तमान प्रक्रम में उक्तआदेश से याचिकाकर्त्ताओं को को कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं होगा। 
  • न्यायालय ने विवादित आदेश में कोई अवैधता नहीं पाई। 
  • न्यायालय ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि केवल इसलिये कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरण के उपयोग के कारण उचित सत्यापन के बिना अस्तित्वहीन उद्धरणों का उल्लेख किया गया थाआदेश को अमान्य नहीं किया जा सकता हैजब आदेश में उल्लिखित विधि और उसका अनुप्रयोग सही है।  

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) उपकरणों के अनियंत्रित प्रयोग के विरुद्ध न्यायालय की चेतावनी: 

  • न्यायालय ने विधिक अनुसंधान और न्यायिक लेखन में AI उपकरणों के अनियंत्रित प्रयोग के विरुद्ध चेतावनी दी। 
  • तथापि AI उपकरणों का उद्देश्य दक्षता बढ़ाना हैपरंतु न्यायिक शब्दावली में उनके अनियंत्रित उपयोग से गंभीर चिंताएँ उत्पन्न होती हैं। 
  • न्यायालय ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) उपकरणों पर बिना किसी सार्थक मानवीय निगरानी के अंधाधुंध विश्वास करने की प्रथा की निंदा कीजिससे उनके द्वारा उत्पन्न दावों की सटीकता को सत्यापित किया जा सके। 
  • इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि AI उपकरण ऐसे प्राधिकारियों को गढ़ सकते हैं या विद्यमान मामलों का हवाला दे सकते हैं जो विचाराधीन विवाद्यकों से विसंगत हैं। 
  • न्यायमूर्ति तिलहारी ने टिप्पणी की कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता की तुलना में वास्तविक बुद्धिमत्ता के अनुप्रयोग को प्राथमिकता दी जानी चाहिये 
  • AI उपकरणों का उपयोग सावधानी और बुद्धिमत्ता के साथ किया जाना चाहिये 
  • विचारण न्यायालयों को सलाह दी गई कि वे सतर्क रहें और न्यायिक निर्णय लेने की प्रक्रिया में AI का उपयोग करते समय न्यायिक विवेक का प्रयोग करें। 
  • इससे यह सुनिश्चित होता है कि निर्णय सही विधिक सिद्धांतों पर आधारित हों। 

विधिक क्षेत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) उपकरणों के उपयोग से जुड़ी चिंताएँ क्या हैं? 

बारे में: 

  • विधिक अनुसंधान और न्यायिक लेखन में दक्षता बढ़ाने के लिये एआई AI का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। 
  • तथापिउनका अनियंत्रित प्रयोग शुद्धता एवं विश्वसनीयता के संबंध में गंभीर प्रश्न उत्पन्न करता है।  
  • AI उपकरणों के पास सुसंगत विधि के संपूर्ण निकाय तक पहुँच की कमी हो सकती है। 
  • वे प्रस्तुत विधिक प्रश्न को पूर्णतः समझने में असमर्थ हो सकते हैं अथवा महत्त्वपूर्ण प्राधिकारों की उपेक्षा कर सकते हैं 
  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणालियाँ ऐसे उत्तर उत्पन्न कर सकती हैं जो देखने में तो विश्वसनीय प्रतीत होते हैंलेकिन तथ्यात्मक या विधिक रूप से गलत होते हैं। 
  • AI उपकरण ऐसे प्राधिकारियों को गढ़ सकते हैं या विद्यमान मामलों का हवाला दे सकते हैं जो विचाराधीन मुद्दे से अप्रासंगिक हों। 

गोपनीयता संबंधी चिंताएँ: 

  • न्यायिक निर्णय लेने में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उपकरणों के उपयोग से निजता के उल्लंघन संबंधी चिंताएँ उत्पन्न होती हैं। 
  • अनियमित उपयोग न्यायिक निर्णय लेने की प्रक्रिया जनविश्वास एवं भरोसे को क्षति पहुँचा सकता है।  

मानवीय पर्यवेक्षण की आवश्यकता:  

  • सार्थक मानवीय निगरानी के बिना AI उपकरणों पर अंधाधुंध विश्वास करना समस्याग्रस्त है। 
  • जो लोग विधिक शोध के लिये AI का उपयोग करते हैंउन्हें इसके परिणामों की गहन जांच करनी चाहिये 
  • AI उपकरणों द्वारा उद्धृत सभी स्रोतों की सटीकता और प्रासंगिकता की पुष्टि की जानी चाहिये 
  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता की तुलना में वास्तविक बुद्धिमत्ता के अनुप्रयोग को प्राथमिकता दी जानी चाहिये 
  • AI उपकरणों का उपयोग सावधानी और बुद्धिमत्ता के साथ किया जाना चाहिये 

न्यायिक सतर्कता आवश्यक: 

  • न्यायिक निर्णय लेने की प्रक्रिया में AI का प्रयोग करते समय विचारण न्यायालयों को सतर्क रहना चाहिये 
  • न्यायालयों को न्यायिक विवेक का प्रयोग करते हुए यह सुनिश्चित करना चाहिये कि निर्णय सही विधिक सिद्धांतों पर आधारित हों। 
  • न्यायिक आदेशों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) द्वारा उत्पन्न उद्धरणों पर विश्वास करने से पहले उनका सत्यापन करना आवश्यक है। 

आदेश क्या है? 

बारे में: 

  • सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 2(14) आदेश को परिभाषित करती है। 
  • आदेश” से तात्पर्य किसी सिविल न्यायालय के किसी निर्णय की औपचारिक अभिव्यक्ति से है जो कोई डिक्री नहीं है। 
  • इसलियेजो निर्णय डिक्री नहीं हैवह आदेश है। 

डिक्री और आदेश में अंतर: 

  • डिक्री और आदेश में अंतर इस प्रकार है: 
    • डिक्री केवल उस वाद में पारित की जा सकती हैजो वादपत्र की प्रस्तुति से आरंभ होता है। इसके विपरीतआदेश वाद से भी उत्पन्न हो सकता है अथवा आवेदन/याचिका की प्रस्तुति से प्रारंभ हुई कार्यवाही से भी पारित किया जा सकता है 
    • डिक्री प्रारंभिकअंतिम अथवा आंशिक रूप से प्रारंभिक एवं आंशिक रूप से अंतिम हो सकती हैजबकि आदेश प्रारंभिक नहीं हो सकता। 
    • सामान्यतः एक वाद में एक ही डिक्री पारित होती हैकिंतु उसी वाद अथवा कार्यवाही में अनेक आदेश पारित किए जा सकते हैं। 
    • डिक्री के विरुद्ध प्रथम अपील सामान्यतः उपलब्ध होती हैजब तक कि विधि द्वारा स्पष्ट रूप से अपील वर्जित न की गई हो (उदाहरणार्थधारा 96(3) के अंतर्गत पक्षकारों की सहमति से पारित डिक्री के विरुद्ध अपील नहीं होती)। इसके विपरीतकेवल वही आदेश अपीलयोग्य होते हैंजिनका उल्लेख संहिता में स्पष्ट रूप से किया गया है (धारा 104 तथा आदेश 43 नियम 1)।  
    • डिक्री के मामले में कुछ आधारों पर उच्च न्यायालय में द्वितीय अपील का प्रावधान हैजबकि अपीलयोग्य आदेशों के विरुद्ध द्वितीय अपील का कोई प्रावधान नहीं है 

डिक्रीआदेश और निर्णय में अंतर:  

  • निर्णय सुनाए जाने के पश्चात् आदेश या डिक्री जारी की जाएगी। 
  • निर्णय के पश्चात् डिक्री जारी की जाती है। 
  • डिक्री अथवा आदेश में न्यायाधीश द्वारा कारणों का विवरण देना आवश्यक नहीं होताजबकि निर्णय में कारणों का उल्लेख अनिवार्य होता है