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आपराधिक कानून
बब्लू पासी बनाम झारखंड राज्य एवं अन्य (2009)
«22-Jan-2026
परिचय
यह ऐतिहासिक निर्णय किशोर न्याय मामलों में आयु अवधारण के महत्त्वपूर्ण विवाद्यक को संबोधित करता है और आवश्यक प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों को स्थापित करता है जिनका पालन पुनरीक्षण अधिकारिता का प्रयोग करने वाले न्यायालयों द्वारा किया जाना चाहिये।
- यह मामला झारखंड उच्च न्यायालय के उस आदेश को चुनौती देने वाली आपराधिक अपील से उत्पन्न हुआ है, जिसमें परिवादकर्त्ता को सुनवाई का अवसर दिये बिना अभियुक्त को अवयस्क घोषित कर दिया गया था।
तथ्य
- राजेश महाथा (अभियुक्त/प्रत्यर्थी संख्या 2) को मृतक के भाई बबलू पासी (अपीलकर्त्ता) के कथन के आधार पर, उसकी पत्नी की मृत्यु के संबंध में भारतीय दण्ड संहिता की धारा 304ख और 306 के अधीन अपराधों के लिये गिरफ्तार किया गया था।
- जब अभियुक्त को देवघर के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया, तो उसने स्वयं को अवयस्क (18 वर्ष से कम आयु का) बताया और उसे दुमका स्थित बाल पुनर्वास केंद्र भेज दिया गया।
- अभियुक्त 8 फरवरी, 2006 को मजिस्ट्रेट द्वारा दिये गए निदेश के होते हुए भी अपने अवयस्क होने के दावे का समर्थन करने वाला कोई भी साक्ष्य/प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने में असफल रहा।
- दुमका स्थित किशोर न्याय बोर्ड ने अभियुक्त को आयु अवधारण के लिये चिकित्सा बोर्ड के पास भेजा। चिकित्सा बोर्ड के अस्थि-निर्माण परीक्षा (ossification test) में उसकी आयु 17-18 वर्ष पाई गई।
- बोर्ड ने देवघर निर्वाचन क्षेत्र की 2005 की मतदाता सूची पर भी विचार किया, जिसमें अभियुक्त की उम्र 20 वर्ष बताई गई थी, साथ ही उसकी शारीरिक बनावट को भी ध्यान में रखते हुए यह निष्कर्ष निकाला कि वह 18 वर्ष से अधिक आयु का था और अवयस्क नहीं था।
- अभियुक्त ने झारखंड उच्च न्यायालय में किशोर न्याय अधिनियम की धारा 53 के अधीन पुनरीक्षण याचिका के माध्यम से बोर्ड के आदेश को चुनौती दी।
- उच्च न्यायालय ने 21 दिसंबर, 2006 को पुनरीक्षण याचिका को मंजूर कर लिया और परिवादकर्त्ता (अपीलकर्त्ता) को नोटिस जारी किये बिना या उसकी सुनवाई किये बिना अभियुक्त को किशोर घोषित कर दिया।
सम्मिलित विवाद्यक
- क्या अपीलकर्त्ता/परिवादकर्त्ता को सुनवाई का अवसर दिये बिना पारित किया गया उच्च न्यायालय का आदेश अमान्य था, जिससे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों और सांविधिक प्रावधानों का उल्लंघन हुआ?
- क्या उच्च न्यायालय ने किशोर न्याय अधिनियम की धारा 53 के अंतर्गत अपनी सीमित पुनरीक्षण अधिकारिता का उल्लंघन करते हुए बोर्ड के सुविचारित तथ्यात्मक निष्कर्ष को पलट दिया?
- क्या किशोर न्याय बोर्ड ने किशोर न्याय अधिनियम की धारा 49 और झारखंड किशोर न्याय नियम, 2003 के नियम 22 के अधीन अभियुक्त की आयु अवधारण हेतु उचित मानदंडों का अनुपालन करते हुए विधिसम्मत प्रक्रिया का पालन किया है?
- आयु अवधारण की कार्यवाही में चिकित्सा बोर्ड की राय, मतदाता सूची में दर्ज जानकारी और अन्य दस्तावेज़ों का साक्ष्य के रूप में क्या महत्त्व है?
- सीमावर्ती मामलों में किशोर अवस्था का अवधारण करते समय क्या अत्यधिक तकनीकी दृष्टिकोण से बचना चाहिये?
न्यायालय की टिप्पणियां
- न्यायालय ने माना कि न्यायधीश अधिनियम की धारा 53 का परंतुक स्पष्ट रूप से यह अनिवार्य करता है कि उच्च न्यायालय किसी भी व्यक्ति को सुनवाई का उचित अवसर प्रदान किये बिना उसके हित में प्रतिकूल आदेश पारित नहीं कर सकता है।
- न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि न्यायधीश अधिनियम की धारा 54(2) के तहत दण्ड प्रक्रिया संहिता का अनुपालन आवश्यक है और दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 401(2) में सुनवाई का अवसर दिये बिना किसी भी पूर्वाग्रही आदेश की परिकल्पना नहीं की गई है।
- न्यायालय ने Audi Alteram Partem के स्थापित सिद्धांत को पुनः दोहराते हुए कहा कि “किसी भी व्यक्ति को सुने बिना दोषी नहीं ठहराया जा सकता” तथा यह कि “कार्यवाही में निष्पक्षता की मांग यह है कि किसी भी प्रतिकूल आदेश से पूर्व पूर्व-निर्णायक सुनवाई प्रदान की जाए।
- न्यायालय ने पाया कि आयु का अवधारण, विशेष रूप से सीमावर्ती मामलों में, एक जटिल प्रक्रिया है और किशोर न्याय अधिनियम आयु अवधारण के लिये निश्चित मानदंड निर्धारित नहीं करता है।
- न्यायालय ने कहा कि किशोर न्याय अधिनियम की धारा 49 में केवल यह उपबंध है कि बोर्ड को उचित जांच करनी होगी, आवश्यक साक्ष्य लेने होंगे और आयु के संबंध में निष्कर्ष दर्ज करना होगा, जिससे यह एक तथ्य-खोज प्रक्रिया बन जाती है।
- न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि यद्यपि नियम 22(5) के अंतर्गत जन्म अथवा विद्यालय प्रमाण-पत्रों के अभाव में चिकित्सा बोर्ड की राय प्राप्त करना अनिवार्य है, तथापि ऐसी राय निश्चायक साक्ष्य नहीं होती, अपितु केवल “एक राय” तथा “उपयोगी मार्गदर्शक कारक” मात्र होती है ।
- न्यायालय ने माना कि आयु अवधारण के लिये एक अमूर्त सूत्र निर्धारित करना न तो व्यावहारिक है और न ही वांछनीय है, जो कि अभिलेख में विद्यमान सभी सामग्रियों के मूल्यांकन पर आधारित होना चाहिये।
- न्यायालय ने माना कि मतदाता सूचियों में प्रविष्टियाँ, यद्यपि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 35 के अंतर्गत लोक दस्तावेज़ हैं, परंतु उस आधार को दर्शाने वाले साक्ष्य के बिना सीमित साक्ष्य मूल्य रखती हैं जिस पर प्रविष्टि की गई थी (बिराद मल सिंहवी बनाम आनंद पुरोहित का हवाला देते हुए)।
- न्यायालय ने पाया कि बोर्ड ने मतदाता सूची में दर्ज प्रविष्टि को उसके प्रमाणिक मूल्य को समझे बिना यांत्रिक रूप से स्वीकार कर लिया था और चिकित्सा बोर्ड के सदस्यों को उनके कथन अभिलिखित करने के लिये समन करने में असफल रहा था।
- न्यायालय ने निर्णय दिया कि केवल शारीरिक बनावट ही आयु अवधारण में निर्णायक कारक नहीं हो सकती।
- न्यायालय ने यह भी पाया कि उच्च न्यायालय का आदेश अस्थिर है, क्योंकि उसमें यह संकेत नहीं दिया गया कि बोर्ड द्वारा नियम 22(5)(iv) की अवहेलना किस प्रकार की गई, तथा चिकित्सा बोर्ड की राय को गलत रूप से निश्चायक मान लिया गया ।
- न्यायालय ने माना कि पुनरीक्षण अधिकारिता सीमित है और इसका प्रयोग संयमपूर्वक और सावधानीपूर्वक किया जाना चाहिये, और उच्च न्यायालय ने महत्त्वपूर्ण अनियमितता की ओर इशारा किये बिना बोर्ड के तथ्यात्मक निष्कर्ष में हस्तक्षेप करके त्रुटी की।
निष्कर्ष
यह एक ऐतिहासिक निर्णय है जो किसी व्यक्ति के किशोर होने का दावा करने पर उसकी उम्र अवधारित करने के लिये सही प्रक्रिया और मापदंड निर्धारित करता है, साथ ही प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के महत्त्व और चिकित्सा राय सहित विभिन्न दस्तावेज़ों के साक्ष्य मूल्य पर बल देता है।
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