करेंट अफेयर्स और संग्रह
होम / करेंट अफेयर्स और संग्रह
सांविधानिक विधि
समानता-आधारित अनुतोष
04-Feb-2026
|
डामोर नानाभाई मनभाई और अन्य बनाम गुजरात राज्य और अन्य "जो लोग दूसरों की सफलता देखकर लंबे समय बाद लाभ का दावा करना चाहते हैं, वे स्वाभाविक रूप से समान अनुतोष की मांग नहीं कर सकते। अधिवक्ताओं से अपेक्षा की जाती है कि वे मुवक्किलों को बार-बार ऐसी कार्यवाही करने से रोकें, जो मूल रूप से समाप्त हो चुके विवाद्यकों को पुन: खोलने का प्रयास करती हैं।" न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और संदीप मेहता |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
डामोर नानाभाई मनभाई और अन्य बनाम गुजरात राज्य और अन्य (2026) के मामले में न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने यह निर्णय दिया कि समान परिस्थितियों वाले कर्मचारियों के सफल होने मात्र से लंबे समय के बाद समता-आधारित अनुतोष का दावा नहीं किया जा सकता है, क्योंकि ऐसे दावे पहले से तय विवाद्यकों को पुन: खोल देंगे और मुकदमेबाजी में अंतिम निर्णय के सिद्धांत को कमजोर करेंगे।
डामोर नानाभाई मनभाई और अन्य बनाम गुजरात राज्य और अन्य (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- इससे पहले अधिकरण ने याचिकाकर्त्ताओं को बहाल करने का निदेश दिया था।
- इस अधिकरण के निर्णय को राज्य सरकार ने बॉम्बे प्राथमिक शिक्षा अधिनियम, 1947 की धारा 24(4) के अधीन अपनी पुनर्विचार शक्ति का प्रयोग करते हुए अपास्त कर दिया था।
- राज्य सरकार के निर्णय को उच्च न्यायालय ने बरकरार रखा।
- 2014 में उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालय के निर्णय को बरकरार रखा, जिससे मामला सुलझ गया।
- 2021 में, गुजरात उच्च न्यायालय ने एक अलग मामले में एक आदेश पारित किया, जिसमें सक्षम प्राधिकारी को सेवा में कार्यरत एक शिक्षक के उच्च श्रेणी के वेतनमान के संबंध में एक अभ्यावेदन पर विचार करने का निदेश दिया गया था।
- वर्तमान मामले में याचिकाकर्त्ता 2021 के मामले में पक्षकार नहीं थे।
- याचिकाकर्त्ताओं ने गुजरात उच्च न्यायालय के 2021 के आदेश पर विश्वास करते हुए यह विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर की है।
- याचिकाकर्त्ताओं ने उच्चतम न्यायालय से इसी तरह के निदेश देने की मांग की, और तर्क दिया कि समानता के आधार पर उन्हें 2021 के आदेश का लाभ दिया जाना चाहिये।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- न्यायालय ने विशेष अनुमति याचिका खारिज कर दी।
- न्यायालय ने कहा कि याचिकाकर्त्ताओं से संबंधित विवाद्यक 2014 में सुलझा लिया गया था, इसलिये लंबे समय के पश्चात् इसे दोबारा उठाना उनके लिये उचित नहीं था।
- न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि जो लोग दूसरों को सफल होते देखकर लंबे समय के बाद लाभ का दावा करना चाहते हैं, वे स्वाभाविक रूप से समान अनुतोष की मांग नहीं कर सकते।
- न्यायालय ने कहा कि मामले के गुण-दोष की परीक्षा किये बिना "विचार" के लिये निदेश जारी करने से पहले, न्यायालयों को पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि दावा किसी जीवित एवं विचाराधीन विवाद्यक से संबंधित है।
- न्यायालय ने अभिधारित किया कि यदि दावा किसी पुराने या समाप्त हो चुके विवाद्यक से संबंधित है, तो न्यायालय को अनावश्यक, बार-बार होने वाले मुकदमेबाजी के दौर को सक्षम बनाने के बजाय मामले को समाप्त कर देना चाहिये।
- न्यायालय ने उत्तर प्रदेश राज्य बनाम अरविंद कुमार श्रीवास्तव (2015) के मामले में स्थापित सिद्धांत का उल्लेख किया, जिसमें कहा गया है कि यद्यपि किसी व्यक्ति के पक्ष में न्यायालय का आदेश समान स्थिति वाले अन्य लोगों तक विस्तारित किया जा सकता है, यह विलंब, लापरवाही और मौन स्वीकृति सहित मान्यता प्राप्त अपवादों के अधीन है।
- न्यायालय ने यह भी कहा कि याचिकाकर्त्ता उन व्यक्तियों के समान स्थिति में नहीं थे जो उच्च न्यायालय के 2021 के आदेश में पक्षकार थे।
- न्यायालय ने पाया कि 2021 के मामले में संबंधित व्यक्ति अभी भी सेवा में था, जबकि याचिकाकर्त्ताओं के सेवा संबंधी मामलों का अंतिम निर्णय 2014 में ही हो चुका था।
अधिवक्ताओं को पुराने दावों पर याचिका दायर करने से हतोत्साहित करना चाहिये:
- पुराने दावों पर आधारित मुकदमे दायर करने पर अंकुश लगाने के लिये, न्यायालय ने अधिवक्ताओं को सलाह दी कि वे अपने मुवक्किलों को बाद के घटनाक्रमों के आधार पर अनुतोष पाने से हतोत्साहित करें।
- न्यायालय ने चेतावनी दी कि ऐसे प्रयास अंतिम निर्णय के सिद्धांत को कमजोर करेंगे और समाप्त हो चुके विवादों को फिर से खोलने के लिये प्रोत्साहित करेंगे।
- न्यायालय ने कहा कि विद्वान अधिवक्ताओं से यह अपेक्षा की जाती है कि वे पूरी प्रक्रियात्मक पृष्ठभूमि को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करके न्यायालय की सहायता करें।
- अधिवक्ता को उन आदेशों की ओर ध्यान दिलाना चाहिये जो अंतिम रूप ले चुके हैं और विलंब, लापरवाही और स्वीकार्यता से संबंधित बाध्यकारी पूर्व निर्णय की ओर भी ध्यान दिलाना चाहिये।
- न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि अधिवक्ता को उचित मामलों में, मुकदमेबाजों को बार-बार ऐसी कार्यवाही करने से बचने की सलाह देनी चाहिये जो सार रूप में, समाप्त हो चुके विवाद्यकों को पुन: खोलने का प्रयास करती हैं।
- न्यायालय ने कहा कि न्यायिक समय को संरक्षित करने और न्याय वितरण प्रणाली के लिये आवश्यक अंतिम निर्णय के अनुशासन को बनाए रखने के लिये यह आवश्यक है।
समानता आधारित अनुतोष (Parity Relief) क्या है?
परिभाषा:
- समानता आधारित अनुतोष संविधान के अनुच्छेद 14 से व्युत्पन्न निष्पक्षता का एक सिद्धांत है, जो किसी अभियुक्त को जमानत मांगने या किसी वादी को समान स्थिति वाले व्यक्ति को पहले दिये गए समान अनुतोष के आधार पर सेवा लाभ प्राप्त करने की अनुमति देता है।
मुख्य सिद्धांत:
- पूर्ण अधिकार नहीं: समानता अनुतोष प्राप्त करने का एक कारक है, प्रत्याभूत आधार नहीं। न्यायालयों को अनुतोष देने से पहले व्यक्तिगत परिस्थितियों का आकलन करना होगा।
- आपराधिक मामले (जमानत के संदर्भ में):
- समानता के आधार पर जमानत स्वतः नहीं मिलती।
- इसके लिये अपराध में सह-अभियुक्तों द्वारा निभाई गई विशिष्ट भूमिकाओं का कठोर एवं तुलनात्मक परीक्षण आवश्यक है।
- आरोपों या संलिप्तता में समानता मात्र ही पर्याप्त नहीं है।
- एक ही मामले में भी, अधिक गंभीर अपराध करने वाला व्यक्ति मामूली भूमिका निभाने वाले व्यक्ति के साथ समानता का दावा नहीं कर सकता।
- सेवा से संबंधित मामलों में:
- यदि वादी लंबे समय तक न्यायालय में याचिका दायर करने में विलंब करते हैं, तो वे पूर्ववर्ती निर्णयों के आधार पर समान अनुतोष का दावा नहीं कर सकते हैं।
- न्यायालय समाप्त हो चुके मामलों को पुन: खोलने से रोकते हैं।
- विलंब, लापरवाही और मौन स्वीकृति सहित अपवादों के अधीन।
विधिक आधार:
- विधि के समक्ष समता के सिद्धांत (अनुच्छेद 14) पर आधारित, यह सुनिश्चित करना कि समान परिस्थितियों के साथ एक जैसा व्यवहार किया जाए, लेकिन मान्यता प्राप्त अपवादों और व्यक्तिगत मूल्यांकन के अधीन।
मुख्य सिद्धांत:
- अनुतोष पाने के लिये समानता एक विचारणीय बिंदु है, परंतु व्यक्तिगत परिस्थितियों और लागू अपवादों की परीक्षा किये बिना यह अनुतोष को प्रत्याभूत नहीं करता है।
भारत के संविधान का अनुच्छेद 14 क्या है?
अनुच्छेद 14 - समता का अधिकार:
- संविधान का अनुच्छेद 14 भारत की भूमि के भीतर सभी व्यक्तियों को विधि के समक्ष समता और विधियों के समान संरक्षण को प्रत्याभूत करता है।
- यह उपबंध मनमाने विभेद को प्रतिबंधित करता है और यह सुनिश्चित करता है कि समान मामलों के साथ समान व्यवहार किया जाए।
- लिंग के आधार पर उत्तराधिकार अधिकारों से वंचित करना अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है क्योंकि इस तरह के विभेद का कोई तर्कसंगत आधार नहीं है।
- न्यायालय ने यह माना कि जब कोई निषेधात्मक प्रथा विद्यमान नहीं है, तो केवल पुरुष उत्तराधिकारियों को ही विरासत देने का कोई औचित्य नहीं है।
पारिवारिक कानून
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की प्रयोज्यता
04-Feb-2026
|
एक्स बनाम एक्स "यदि विवाह के दोनों पक्षकारों में से कोई एक इस अधिनियम के अंतर्गत नहीं आता है, तो हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के अधीन रजिस्ट्रीकृत विवाह विधिक रूप से मान्य नहीं हो सकता है।" न्यायमूर्ति के. लक्ष्मण और न्यायमूर्ति वकिती रामकृष्ण रेड्डी |
स्रोत: तेलंगाना उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
न्यायमूर्ति के. लक्ष्मण और वकिती रामकृष्ण रेड्डी की खंडपीठ ने एक्स बनाम एक्स (2026) के मामले में अनुसूचित जनजाति की महिला और अनुसूचित जाति के पुरुष के बीच विवाह को शून्य घोषित कर दिया, यह मानते हुए कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के अधीन रजिस्ट्रीकृत विवाह विधि में मान्य नहीं हो सकता है यदि पक्षकारों में से एक अधिनियम द्वारा शासित नहीं है।
एक्स बनाम एक्स (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- अपीलकर्त्ता महिला अनुसूचित जनजाति से संबंधित थी, जबकि प्रत्यर्थी अनुसूचित जनजाति (SC माला) श्रेणी से संबंधित था।
- दोनों पक्षकारों के बीच विवाह हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के अधीन रजिस्ट्रीकृत किया गया था और कथित तौर पर हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार एक मंदिर में संपन्न हुआ था।
- अपीलकर्त्ता ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के अधीन विवाह विच्छेद की मांग करते हुए कुटुंब न्यायालय का रुख किया।
- उसने दावा किया कि यह विवाह प्रत्यर्थी के दबाव और धमकी के कारण हुई थी।
- प्रत्यर्थी ने अभिकथनों से इंकार किया और तर्क दिया कि विवाह स्वैच्छिक था और दोनों पक्षकारों ने एक-दूसरे के प्रति प्रेम के कारण विवाह किया था।
- प्रत्यर्थी ने आगे यह भी तर्क दिया कि विवाह संपन्न हो चुका था।
- कुटुंब न्यायालय ने याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि अपीलकर्त्ता क्रूरता या जबरन विवाह साबित करने में असफल रहा है।
- कुटुंब न्यायालय ने विवाह को शून्य घोषित करने से इंकार कर दिया।
- इस निर्णय से असंतुष्ट होकर अपीलकर्त्ता ने अपील में उच्च न्यायालय का रुख किया।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- न्यायालय ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 2(2) अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों को अधिनियम के आवेदन से स्पष्ट रूप से अपवर्जित करती है, जब तक कि केंद्र सरकार अधिसूचना द्वारा अन्यथा निदेश न दे।
- इस बात पर कोई विवाद नहीं था कि अपीलकर्त्ता की जनजाति पर अधिनियम की प्रयोज्यता बढ़ाने वाली कोई अधिसूचना जारी नहीं की गई थी।
- न्यायालय ने यह माना कि व्यक्तिगत विधि के किसी संविधि की प्रयोज्यता विधायी आदेश से उत्पन्न होती है, न कि पक्षकारों की इच्छा या आचरण से।
- यदि कोई हिंदू किसी ऐसे व्यक्ति से विवाह करना चाहता है जो हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के दायरे में नहीं आता है, तो विधिक रूप से अनुमत तरीका विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के अधीन ऐसा विवाह करना है, जो कि ऐसे विवाहों को नियंत्रित करने के लिये बनाया गया एक पंथनिरपेक्ष अधिनियम है।
- न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि सांविधिक अपवर्जन को रजिस्ट्रीकरण, संस्कार या आपसी सहमति से खत्म नहीं किया जा सकता है।
- इस प्रश्न पर कि क्या केवल विवाह संपन्न होना ही अधिनियम के अंतर्गत लागू होने के लिये पर्याप्त है, न्यायालय ने नकारात्मक उत्तर दिया।
- न्यायालय ने माना कि इस बात को साबित करने के लिये न तो कोई सबूत था और न ही कोई अभिवचन था कि अपीलकर्त्ता ने जनजातीय रीति-रिवाजों को त्याग दिया था या वह पूरी तरह से इस अधिनियम द्वारा शासित था।
- न्यायालय ने निर्णय दिया कि ऐसे मामले में केवल विवाह संपन्न करना विधिक रूप से अपर्याप्त है।
- उच्च न्यायालय ने माना कि कुटुंब न्यायालय ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के अधीन वैवाहिक विवाद का निर्णय करते समय, अपीलकर्त्ता पर इसकी सांविधिक प्रयोज्यता का पूर्व अवधारण किये बिना, अधिकारिता संबंधी त्रुटि की थी।
- न्यायालय ने तर्क दिया कि जब अधिकारिता स्वयं ऐसी प्रयोज्यता पर निर्भर करता है, तो उस पर निर्णय न देना संपूर्ण प्रक्रिया को अधिकारिक दृष्टि से कमजोर बना देता है, जिसके लिये अपीलीय हस्तक्षेप आवश्यक है।
- परिणामस्वरूप, यह मानते हुए कि हिंदू विवाह अधिनियम अपीलकर्त्ता पर लागू नहीं होता है, न्यायालय ने अपील को स्वीकार कर लिया और कुटुंब न्यायालय द्वारा पारित डिक्री को अपास्त कर दिया, इस प्रकार विवाह को शून्य घोषित कर दिया।
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 क्या है?
बारे में:
- हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 एक ऐसा विधान है जिसे हिंदुओं में विवाह से संबंधित विधि को संहिताबद्ध और संशोधित करने के लिये अधिनियमित किया गया है।
- यह अधिनियम हिंदुओं, बौद्धों, जैनियों और सिखों पर लागू होता है, किंतु अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों को स्पष्ट रूप से इससे अपवर्जित किया गया है, जब तक कि केंद्र सरकार द्वारा अन्यथा अधिसूचित न किया जाए।
- अधिनियम की धारा 2(2) अनुसूचित जनजातियों को इसकी प्रयोज्यता से सांविधिक रूप से अपवर्जित करने का उपबंध करती है।
- यह अधिनियम वैध हिंदू विवाहों के लिये शर्तें, तलाक के आधार और वैवाहिक उपचारों की प्रक्रियाएँ विहित करता है।
अनुसूचित जनजातियों पर हिंदू विवाह अधिनियम की प्रयोज्यता:
- हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 2(2) अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों को अधिनियम के आवेदन से स्पष्ट रूप से अपवर्जित करती है।
- यह अपवाद तब तक लागू रहेगा जब तक कि केंद्र सरकार आधिकारिक राजपत्र में अधिसूचना के माध्यम से किसी विशेष अनुसूचित जनजाति या जनजातियों के लिये अन्यथा निदेश न दे दे।
- सांविधिक अपवर्जन विधायी जनादेश पर आधारित है और इसे पक्षकारों के आचरण, सम्मति या इच्छा माध्यम से अधिभावी नहीं किया जा सकता।
- हिंदू विवाह अधिनियम के अधीन विवाह का रजिस्ट्रीकरण या हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह का संपन्न होना, उस स्थिति में विवाह को वैधता प्रदान नहीं करता जब एक पक्षकार विधिक रूप से विवाह से वंचित हो।
वैकल्पिक विधिक ढाँचा:
- यदि कोई हिंदू किसी ऐसे व्यक्ति से विवाह करना चाहता है जो हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के दायरे में नहीं आता है, तो विधिक रूप से अनुमत तरीका विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के अधीन ऐसा विवाह करना है।
- विशेष विवाह अधिनियम, 1954 एक पंथनिरपेक्ष अधिनियम है जिसे अंतर-सामुदायिक और अंतर-धार्मिक विवाहों को नियंत्रित करने के लिये बनाया गया है।
- यह अधिनियम धार्मिक या सामुदायिक आधार पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाता है और ऐसे विवाहों के लिये एक व्यापक ढाँचा प्रदान करता है।
- विशेष विवाह अधिनियम विभिन्न समुदायों या धर्मों से संबंधित व्यक्तियों के बीच विवाह को विधिक वैधता और संरक्षण सुनिश्चित करता है।
.jpg)