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सांविधानिक विधि
विदेश यात्रा के अधिकार का समावेशन
09-Feb-2026
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मधु सिंह बनाम झारखंड राज्य (केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो के माध्यम से) "विदेश यात्रा का अधिकार एक महत्त्वपूर्ण बुनियादी मानवाधिकार है और संविधान के अनुच्छेद 21 के अधीन मौलिक अधिकार का भाग है ।" न्यायमूर्ति संजय कुमार द्विवेदी |
स्रोत: झारखंड उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
झारखंड उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति संजय कुमार द्विवेदी ने मधु सिंह बनाम झारखंड राज्य (केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो के माध्यम से) (2025) के मामले में झारखंड के पूर्व विधायक कमलेश कुमार सिंह की पत्नी पर लगाई गई जमानत की शर्तों में संशोधन किया, जिससे उन्हें विचारण की आवश्यकताओं को संतुलित करते हुए लिवर की गंभीर बीमारी के उपचार के लिये विदेश यात्रा करने की अनुमति मिली।
मधु सिंह बनाम झारखंड राज्य (केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो के माध्यम से) (2025) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- याचिकाकर्त्ता अपने पति, झारखंड के पूर्व विधायक और मंत्री कमलेश कुमार सिंह के विरुद्ध लगे आरोपों से संबंधित आय से अधिक संपत्ति के मामले में अभियुक्त थी।
- उन्हें 13 मई 2014 को B.A. No. 3581/2014 में नियमित जमानत दी गई थी, जिसमें पासपोर्ट जमा करने और विदेश यात्रा पर प्रतिबंध लगाने की शर्तें सम्मिलित थीं।
- याचिकाकर्त्ता, जिनकी आयु लगभग 58 वर्ष है, एक गंभीर और जानलेवा यकृत रोग (लिवर की बीमारी) से पीड़ित थी।
- नई दिल्ली के इंस्टीट्यूट ऑफ लिवर एंड बिलियरी साइंसेज में 25 जून 2025 को किये गए लिवर बायोप्सी से लैनेक सिरोसिस सबस्टेज-4B का पता चला, जो कि क्रोनिक लिवर रोग का एक उन्नत चरण है।
- चिकित्सा रिपोर्टों ने पुष्टि की कि सबस्टेज-4B सिरोसिस चिकित्सकीय रूप से मान्यता प्राप्त पूर्व-कैंसर स्टेज है।
- याचिकाकर्त्ता के करीबी नातेदार अमेरिका और ब्रिटेन में रह रहे थे, और वह बेहतर उपचार के लिये इनमें से किसी भी देश की यात्रा करना चाहती थी।
- याचिकाकर्त्ता 2014 से ही विचारण में सहयोग कर रही थी और उसने जमानत की किसी भी शर्त का उल्लंघन नहीं किया था।
- जमानत आदेश के अधीन उनका पासपोर्ट 2014 में जमा कर दिया गया था।
- इस मामले में 100 से अधिक साक्षियों में से अब तक केवल 46 की ही परीक्षा की जा सकी है, जो विचारण की धीमी प्रगति को दर्शाता है।
- CBI ने याचिका का विरोध करते हुए तर्क दिया कि याचिकाकर्त्ता पर आय से अधिक संपत्ति के मामले में आरोप लगाया गया था और जमानत देते समय समन्वय पीठ द्वारा यात्रा प्रतिबंध लगाया गया था।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- न्यायालय ने नई दिल्ली स्थित प्रतिष्ठित संस्थान, इंस्टीट्यूट ऑफ लिवर एंड बिलियरी साइंसेज की चिकित्सा रिपोर्टों पर ध्यान दिया, जिसमें याचिकाकर्त्ता की गंभीर चिकित्सा स्थिति की पुष्टि की गई थी।
- चिकित्सा रिपोर्टों से यह स्थापित हुआ कि याचिकाकर्त्ता सिरोसिस (cirrhosis) से पीड़ित थी, जिसमें संभवतः अंतर्निहित ऑटोइम्यून हेपेटाइटिस और प्राथमिक पित्तवाहिनीशोथ का मिश्रण और लैनेक सिरोसिस सबस्टेज-4B शामिल था।
- न्यायालय ने अभिलिखित किया कि ऐसा कोई आरोप नहीं था कि याचिकाकर्त्ता ने विचारण में सहयोग नहीं किया या किसी साक्षी को प्रभावित करने का प्रयत्न किया।
- न्यायालय ने विदेश यात्रा के अधिकार की मौलिक प्रकृति के संबंध में मेनका गांधी बनाम भारत संघ और सतीश चंद्र वर्मा बनाम भारत संघ के मामलों में उच्चतम न्यायालय के निर्णयों पर विश्वास किया।
- न्यायालय ने कहा कि विदेश यात्रा का अधिकार एक महत्त्वपूर्ण बुनियादी मानवाधिकार है और संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत मौलिक अधिकार का भाग है।
- न्यायालय ने माना कि याचिकाकर्त्ता की उन्नत चरण 4B सिरोसिस और उच्चतम न्यायालय द्वारा स्थापित विदेश यात्रा के मौलिक अधिकार को ध्यान में रखते हुए, दिनांक 13.05.2014 के जमानत आदेश में संशोधन किया जा सकता है।
- न्यायालय ने याचिकाकर्त्ता के पक्ष में उसका पासपोर्ट जारी करने का निदेश दिया।
- न्यायालय ने याचिकाकर्त्ता पर शर्तें अधिरोपित की, जिसके अधीन उसे प्रत्येक प्रस्तावित विदेश यात्रा के लिये संबंधित न्यायालय के समक्ष एक वचन पत्र दाखिल करना होगा, जिसमें यात्रा की अवधि और भारत लौटने की तिथि निर्दिष्ट हो।
- याचिकाकर्त्ता को प्रत्येक यात्रा से लौटने पर न्यायालय को सूचित करने का निदेश दिया गया था।
- न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पासपोर्ट इस शर्त के अधीन जारी किया जाएगा कि याचिकाकर्त्ता को विदेश यात्रा के प्रत्येक मामले के लिये संबंधित न्यायालय की पूर्व अनुमति लेनी होगी।
विदेश यात्रा का अधिकार क्या है?
बारे में:
- भारत के संविधान में विदेश यात्रा के अधिकार का स्पष्ट रूप से उल्लेख नहीं है।
- तथापि, इसको संविधान के अनुच्छेद 21 के अधीन प्रत्याभूत प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार के एक भाग के रूप में निर्वचन किया गया है।
संबंधित उपबंध:
- अनुच्छेद 21: किसी भी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जाएगा, सिवाय विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार।
- अनुच्छेद 19(1)(घ): यह अनुच्छेद आवागमन की स्वतंत्रता को प्रत्याभूत करता है, जिसका निर्वचन देश के भीतर यात्रा करने के अधिकार को सम्मिलित करने के रूप में किया जाता है।
- अनुच्छेद 19(1)(क): यह अनुच्छेद वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रत्याभूत करता है, जिसका शैक्षिक, सांस्कृतिक या व्यावसायिक उद्देश्यों के लिये विदेश यात्रा के अधिकार को शामिल करने के रूप में निर्वचन किया जा सकता है।
विधिक निर्णय:
- सतवंत सिंह साहनी बनाम डी. रामारत्नम, सहायक पासपोर्ट अधिकारी, भारत सरकार, नई दिल्ली (1967):
- उच्चतम न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि विदेश यात्रा का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के अधीन एक मौलिक अधिकार है, और सरकार विधि द्वारा स्थापित वैध प्रक्रिया के बिना पासपोर्ट जारी करने से इंकार नहीं कर सकती या उसे जब्त नहीं कर सकती।
- न्यायालय ने याचिकाकर्त्ताओं के पासपोर्ट और पासपोर्ट संबंधी सुविधाओं को बहाल करने के लिये सरकार को निदेश देते हुए एक परमादेश याचिका जारी की।
- मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978):
- इस मामले में, उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 21 के दायरे का विस्तार किया और यह निर्णय दिया कि प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार में विदेश यात्रा का अधिकार भी सम्मिलित है।
- न्यायालय ने यह भी निर्णय दिया कि किसी व्यक्ति को उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित करने के लिये विधि द्वारा विहित कोई भी प्रक्रिया निष्पक्ष, न्यायसंगत और युक्तियुक्त होनी चाहिये।
सांविधानिक विधि
अर्ध-न्यायिक प्राधिकरणों के पास पुनर्विलोकन शक्ति का अभाव है
09-Feb-2026
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पश्चिम बंगाल राज्य और अन्य बनाम जय हिंद प्राइवेट लिमिटेड "अर्ध-न्यायिक प्राधिकरणों को पुनर्विलोकन अधिकारिता का प्रयोग करने का अधिकार तब तक नहीं है जब तक कि उन्हें सांविधिक रूप से ऐसा करने के लिये सशक्त न किया गया हो।" न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और एन. कोटिस्वर सिंह |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
पश्चिम बंगाल राज्य और अन्य बनाम जय हिंद प्राइवेट लिमिटेड (2025) के मामले में न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने निर्णय दिया कि अर्ध-न्यायिक प्राधिकरणों को पुनर्विलोकन अधिकारिता का प्रयोग करने का अधिकार तब तक नहीं है जब तक कि उन्हें सांविधिक रूप से ऐसा करने के लिये सशक्त न किया गया हो। न्यायालय ने कलकत्ता उच्च न्यायालय के निर्णय को पलटते हुए कहा कि राजस्व अधिकारी का पुनर्विलोकन आदेश अधिकारिता से बाहर और प्रारंभ से ही शून्य था।
पश्चिम बंगाल राज्य और अन्य बनाम जय हिंद प्राइवेट लिमिटेड (2025) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- यह विवाद पश्चिम बंगाल संपदा अधिग्रहण अधिनियम, 1953 (WBEA Act) के अंतर्गत उत्पन्न हुआ।
- इससे पहले एक राजस्व अधिकारी ने राज्य में भूमि के निहित होने का अवधारण करने वाला आदेश पारित किया था।
- कई वर्षों पश्चात्, उसी प्राधिकरण ने प्रत्यर्थी-जय हिंद प्राइवेट लिमिटेड के पक्ष में दिये गए अपने पूर्व के निर्णय का पुनर्विलोकन करने और उसे पुन: खोलने का प्रयास किया।
- यह पुनर्विलोकन राज्य सरकार द्वारा जारी एक कार्यपालिका निदेश के अधीन किया गया।
- कार्यपालिका निदेश में आर्थिक पहलुओं का हवाला दिया गया और भूमि के औद्योगिक उपयोग का प्रस्ताव रखा गया।
- दिनांक 07.05.2008 के नए आदेश के अनुसार विवादित भूमि प्रत्यर्थी के पक्ष में निहित हो गई।
- यह अधिकार तब दिया गया जब यह भूमि पहले राज्य सरकार के पास निहित थी।
- इसी के चलते राज्य ने पुनर्विलोकन प्रक्रिया की वैधता को चुनौती दी।
मुख्य विवाद्यक:
- न्यायालय के समक्ष मुख्य विवाद्यक यह था कि क्या कोई राजस्व अधिकारी, अर्ध-न्यायिक कार्यों का प्रयोग करते हुए, स्पष्ट सांविधिक शक्ति के अभाव में अपने ही पूर्व के आदेश का पुनर्विलोकन कर सकता है।
- विशेष रूप से, क्या ऐसा पुनर्विलोकन तब किया जा सकता है जब यह किसी कार्यपालिका निदेश द्वारा शुरू किया गया हो।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
समीक्षा शक्ति अंतर्निहित नहीं है:
- न्यायमूर्ति कोतिश्वर सिंह द्वारा लिखित निर्णय में इस बात पर बल दिया गया कि पुनर्विलोकन की शक्ति अंतर्निहित नहीं है और इसे संविधि द्वारा या तो स्पष्ट रूप से या आवश्यक निहितार्थ द्वारा प्रदान किया जाना चाहिये।
- न्यायालय ने कहा: "...हमारा मानना है कि राजस्व अधिकारी द्वारा किया गया पुनर्विलोकन, जिसके परिणामस्वरूप 07.05.2008 का नया आदेश जारी हुआ, पूर्णतः अधिकारिता से बाहर और प्रारंभ से ही शून्य था। पश्चिम बंगाल संपदा अधिग्रहण अधिनियम, 1953, राजस्व अधिकारी को किसी भी प्रकार के वास्तविक पुनर्विलोकन की शक्ति प्रदान नहीं करता है, न तो स्पष्ट रूप से और न ही आवश्यक निहितार्थ द्वारा।"
पुनर्विलोकन के लिये कोई सांविधिक प्रावधान नहीं:
- न्यायालय ने कहा कि पश्चिम बंगाल संपदा अधिग्रहण अधिनियम के अंतर्गत कोई भी प्रावधान राजस्व अधिकारी को पुनर्विलोकन अधिकारिता का प्रयोग करने का अधिकार नहीं देता है।
- इसके अतरिक्त, धारा 57ख(3) का परंतुक स्पष्ट रूप से बताता है कि राजस्व अधिकारी किसी भी ऐसे मामले को पुन: नहीं खोलेगा जिसकी पहले ही राज्य सरकार या किसी प्राधिकरण द्वारा इस अधिनियम के किसी भी प्रावधान के अधीन जांच, अन्वेषण, अवधारण या विनिश्चय किया जा चुका है।
उच्च न्यायालय की त्रुटि:
- न्यायालय ने माना कि उच्च न्यायालय ने इस आधार पर गलत कार्यवाही की कि पश्चिम बंगाल संपदा अधिग्रहण अधिनियम, 1953 की धारा 57क के अधीन जारी सरकारी आदेश, भारसाधक मंत्री द्वारा अनुमोदित होने के कारण, राजस्व अधिकारी को पुनर्विलोकन अधिकारिता प्रदान करने के लिये पर्याप्त अधिकार का गठन करता है।
- न्यायालय ने कहा: "इस दृष्टिकोण ने कार्यपालक निदेश को वास्तविक शक्ति के सांविधिक प्रदत्त के साथ मिला दिया और पुनर्विलोकन को सिविल न्यायालय की शक्तियों की एक मात्र प्रक्रियात्मक घटना के रूप में माना।"
- उच्च न्यायालय ने कार्यपालिका अधिकारियों को पुनर्विलोकन शक्ति का न्यायिक कार्य सौंपने की सीमाओं को भी नजरअंदाज कर दिया।
अग्राह्य निहिति:
- न्यायालय ने निर्णय दिया कि विवादित भूमि का प्रत्यर्थी के पक्ष में निहित होना अग्राह्य था, विशेषत: तब जब भूमि पहले से ही राज्य सरकार के पास निहित थी।
अपील मंजूर की गई:
- तदनुसार, अपील मंजूर कर ली गई।
अर्ध-न्यायिक निकाय क्या है?
बारे में:
- अर्ध-न्यायिक निकाय गैर-न्यायिक संस्थाएँ हैं जिनके पास विधि का निर्वचन करने का अधिकार होता है, जैसे कि माध्यस्थम् पैनल या अधिकरण बोर्ड, जिन्हें विधि के न्यायालय या न्यायाधीश के समान शक्तियां और प्रक्रियाएँ दी गई हैं।
- ये निकाय वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्र के रूप में कार्य करते हैं, जो राज्य के कार्यपालिका और न्यायिक कार्यों के बीच की खाई को पाटते हैं।
- उदाहरण के लिये, भारत का निर्वाचन आयोग एक अर्ध-न्यायिक निकाय है, किंतु इसके मूल किसी विधि न्यायालय के समान नहीं होते।
अर्ध-न्यायिक निकायों की विशेषताएँ:
भारत में अर्ध-न्यायिक निकायों की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं:
- विवाद समाधान: अर्ध-न्यायिक निकायों को मामलों में मध्यस्थता करने और शास्ति अधिरोपित का अधिकार है। पक्षकार इन निकायों से न्याय मांग सकते हैं, जिससे औपचारिक न्यायिक प्रणाली की जटिलताओं से बचा जा सकता है।
- सीमित निर्णयन शक्तियां: इनकी अधिकारिता सामान्यतः विशिष्ट विषय क्षेत्रों तक सीमित होती है, जैसे—वित्तीय बाजार, श्रम एवं सेवा विधि, सार्वजनिक मानक अथवा विनियामक मामले। उदाहरणस्वरूप, कंपनी विधि अपीलीय अधिकरण निगमों के प्रशासन एवं कार्यप्रणाली से संबंधित विवादों का निस्तारण करता है।
- पूर्वनिर्धारित नियम: अर्ध-न्यायिक निकायों के निर्णय और पंचाट अक्सर स्थापित नियमों द्वारा निदेशित होते हैं और विद्यमान विधिक ढाँचों पर आधारित होते हैं।
- दण्डात्मक प्राधिकारी: इन निकायों के पास अपनी अधिकारिता के अंतर्गत उल्लंघनों के लिये शास्ति अधिरोपित करने की शक्ति होती है। उदाहरणार्थ, भारत में उपभोक्ता न्यायालय उपभोक्ता विवादों का निस्तारण करते हैं तथा अवैध क्रियाकलापों में संलग्न कंपनियों पर शास्ति अधिरोपित करते हैं।
- न्यायिक पुनर्विलोकन: अर्ध-न्यायिक निकायों के निर्णयों के विरुद्ध न्यायालय में अपील की जा सकती है, जिसमें न्यायपालिका का निर्णय सर्वोपरि होता है।
- विशेषज्ञ नेतृत्व: न्यायपालिका के विपरीत, जिसकी अध्यक्षता न्यायाधीश करते हैं, अर्ध-न्यायिक निकायों का नेतृत्व सामान्यत: वित्त, अर्थशास्त्र और विधि जैसे संबंधित क्षेत्रों के विशेषज्ञों द्वारा किया जाता है।
अर्ध-न्यायिक निकायों की शक्तियां:
अर्ध-न्यायिक निकाय निम्नलिखित शक्तियों का प्रयोग करते हैं:
- सुनवाई आयोजित करना: वे साक्ष्य एकत्र और साक्षियों से परिसाक्ष्य के लिये सुनवाई कर सकते हैं।
- तथ्यात्मक अवधारण: अर्ध-न्यायिक प्राधिकरण सुनवाई में प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर सुसंगत तथ्यात्मक अवधारण कर सकते हैं।
- विधि का अनुप्रयोग: वे अपने द्वारा अवधारित तथ्यों पर विधि लागू कर सकते हैं और संबंधित पक्षकारों के विधिक अधिकारों, कर्त्तव्यों या विशेषाधिकारों के संबंध में निर्णय ले सकते हैं।
- आदेश या निर्णय जारी करना: वे ऐसे आदेश या निर्णय जारी कर सकते हैं जिनका विधिक बल होता है, जैसे कि किसी पक्षकार को क्षतिपूर्ति देने या कुछ शर्तों का पालन करने के लिये कहना।
- निर्णयों को लागू करना: वे अपने निर्णयों को लागू करने के लिये कदम उठा सकते हैं, जैसे कि अनुपालन न करने पर जुर्माना या अन्य शास्ति अधिरोपित करना।
भारत में प्रमुख अर्ध-न्यायिक निकाय:
भारत में कार्यरत कुछ प्रमुख अर्ध-न्यायिक निकाय निम्नलिखित हैं:
- आयकर अपीलीय अधिकरण (ITAT)
- दूरसंचार विवाद निपटान एवं अपीलीय अधिकरण (TDSAT)
- केंद्रीय सूचना आयोग (CIC)
- लोक अदालत
- वित्त आयोग
- राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग
- राष्ट्रीय हरित अधिकरण
- रेलवे दावा अधिकरण
न्यायिक और अर्ध-न्यायिक निकायों के बीच प्रमुख अंतर:
निम्नलिखित तालिका न्यायिक और अर्ध-न्यायिक निकायों के बीच प्रमुख अंतरों को दर्शाती है:
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आधार |
न्यायिक निकाय |
अर्ध-न्यायिक निकाय |
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प्राधिकरण |
न्यायालय विधि का निर्वचन एवं अनुप्रयोग करने, मामलों की सुनवाई एवं निर्णय करने तथा निर्णयों को प्रवर्तित करने का अधिकार रखने वाला विधि-न्यायालय होता है। |
अर्ध-न्यायिक निकाय वह प्राधिकरण/अधिकरण होता है जो न्यायालय की भाँति विवादों का निस्तारण करता है तथा अपने आदेशों को प्रवर्तित करता है। |
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स्वतंत्रता |
यह कार्यपालिका एवं विधायिका से स्वतंत्र होता है तथा विधि के शासन को बनाए रखने हेतु उत्तरदायी होता है। |
यह पूर्ण न्यायालय नहीं होता तथा इसकी स्वतंत्रता अपेक्षाकृत कम होती है; इस पर कार्यपालिका एवं विधायिका का नियंत्रण अधिक होता है। |
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अधिकारिता |
इन्हें सिविल एवं आपराधिक सहित व्यापक श्रेणी के मामलों की सुनवाई की अधिकारिता प्राप्त होती है। |
इनकी अधिकारिता सीमित होती है तथा ये केवल अपने विशिष्ट विषय-क्षेत्र अथवा विशेषज्ञता से संबंधित मामलों की ही सुनवाई कर सकते हैं। |
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निर्णय-निर्माण का आधार |
इन्हें ऐसे नवीन विधिक पूर्व निर्णयों को स्थापित करने की शक्ति होती है, जिनका भविष्य के मामलों में अनुप्रयोग किया जा सकता है। |
इनके निर्णय सामान्यतः विद्यमान विधियों को किसी विशिष्ट मामले के तथ्यों पर लागू करने तक सीमित होते हैं। |
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न्यायाधीश |
इसमें सरकार द्वारा नियुक्त न्यायाधीश अथवा न्यायिक मजिस्ट्रेट होते हैं। |
इनमें सरकार अथवा किसी विशेषीकृत अभिकरण द्वारा नियुक्त न्यायाधीशों एवं विषय-विशेषज्ञों का संयोजन हो सकता है। |
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कठोरता |
ये सामान्यतः अधिक औपचारिक होते हैं तथा कठोर प्रक्रिया संबंधी नियमों का पालन करते हैं। |
ये अपेक्षाकृत कम औपचारिक होते हैं, तथापि निर्धारित प्रक्रिया एवं साक्ष्य संबंधी नियमों का पालन करते हैं। |