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करेंट अफेयर्स और संग्रह

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आपराधिक कानून

वसूली और गिरफ्तारी वारण्ट का एक साथ जारी किया जाना अवैध है

 02-Feb-2026

मोहम्मद शहजाद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य 

"भरण–पोषण आदेशों के प्रवर्तन के प्रति न्यायालयों के अत्यधिक उत्साह के कारण किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत गरिमा एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अतिक्रमण नहीं किया जा सकताभले ही न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुँच जाए कि न्यायालय के आदेश के अनुसरण में भरण–पोषण की बकाया राशि का जानबूझकर भुगतान नहीं किया गया है।"  

न्यायमूर्ति राजीव लोचन शुक्ला 

स्रोत: इलाहाबाद उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति राजीव लोचन शुक्ला ने मोहम्मद शहजाद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (2026)के मामले मेंअलीगढ़ कुटुंब न्यायालय के अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश के उस आदेश को अपास्त कर दियाजिसमें भरण-पोषण बकाया की वसूली के लिये याचिकाकर्त्ता के विरुद्ध एक साथ वसूली और गिरफ्तारी वारण्ट जारी किये गए थेऔर इस नियमित प्रथा को अवैध और अमानवीय घोषित किया।  

मोहम्मद शहजाद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • मोहम्मद शहजाद ने कुटुंब न्यायालय के आदेश को चुनौती देते हुए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 528 के अधीन याचिका दायर की थी। 
  • अलीगढ़ स्थित कुटुंब न्यायालय के अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश नेभरण-पोषण की बकाया राशि की वसूली के लिये याचिकाकर्त्ता के विरुद्ध एक साथवसूली और गिरफ्तारी वारण्ट जारी किये थे।     
  • याचिकाकर्त्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि भरण-पोषण आदेशों को लागू किया जाना चाहियेलेकिन प्रक्रिया राजनेश बनाम नेहा और अन्य (2021) में उच्चतम न्यायालय के निर्णय के अनुसार विशिष्ट सांविधिक प्रावधानों का उल्लंघन नहीं कर सकती है।  
  • राज्य की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सरकारी अधिवक्ता (AGA) ने स्वीकार किया कि धारा 125(3) और 128 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन विहित प्रक्रिया का पालन किये बिना भरण-पोषण के बकाया की वसूली के लिये कोई गिरफ्तारी वारण्ट जारी नहीं किया जा सकता है।     
  • तथापिअतिरिक्त सरकारी अधिवक्ता ने यह तर्क दिया कि आवेदक ने पहले भी उच्च न्यायालय द्वारा निदेशित संदाय किश्तों का संदाय करने में व्यतिक्रम किया था 
  • न्यायालय ने कहा कि उसके सामने ऐसे अनेक मामले आए हैं जहाँ कुटुंब न्यायालयों ने वसूली वारण्ट के साथ-साथ गिरफ्तारी वारण्ट भी जारी किये हैंऔर कुछ मामलों में तो अजमानतीय वारण्ट भी जारी किये हैंजिनमें व्यतिकारियों को अभियुक्त व्यक्तियों के रूप में माना गया है। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • पीठ ने टिप्पणी की कि भरण-पोषण का संदाय करने के लिये उत्तरदायी व्यक्ति को अपराध करने वाले व्यक्ति के रूप में नहीं माना जाना चाहियेऔर भरण-पोषण आदेश को लागू करने के लिये न्यायालयों द्वारा ऐसे व्यक्ति की गरिमा और स्वतंत्रता को कुचला नहीं जा सकता है। 
  • न्यायमूर्ति शुक्ला ने दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 125(3) और धारा 421 का हवाला देते हुए कहा कि भरण-पोषण के बकाया की वसूली जुर्माना उद्गृहीत करने से किया जा सकता है। 
  • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि धारा 421 दण्ड प्रक्रिया संहिता की अधीनजुर्माना उद्गृहीत के लिये वारण्ट को चल संपत्ति की कुर्की और विक्रय द्वारा या कलेक्टर को भू-राजस्व के बकाया के रूप में राशि वसूल करने के लिये अधिकृत करके निष्पादित किया जाता है। 
  • न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि धारा 421 का परंतुक उपबंधित करता है कि "अपराधी की गिरफ्तारी या कारावास द्वारा ऐसा कोई वारण्ट निष्पादित नहीं किया जाएगा।" 
  • पीठ ने कहा कि वारण्ट के निष्पादन के बाद शेष राशि या बकाया जमा करने में असफल रहने पर ही कारावास का दण्ड दिया जा सकता है। 
  • न्यायालय ने कहा कि धारा 125(3) दण्ड प्रक्रिया संहिता स्पष्ट रूप से इंगित करती है कि जुर्माना उद्गृहीत करने के लिये निर्धारित तरीके सेभरण-पोषण के बकाया की वसूली के लिये पहले प्रयास किये जाने चाहियेऔर केवल तभी जब वारण्ट निष्पादित नहीं किया जाता है या भागत: रूप से निष्पादित किया जाता है तो न्यायालय व्यक्ति को कारावास का दण्ड दे सकता है। 
  • न्यायालय ने टिप्पणी की कि "वसूली और गिरफ्तारी का वारण्ट एक साथ जारी करना दण्ड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत परिकल्पित नहीं है। यहाँ तक ​​कि उच्चतम न्यायालय द्वारा दिये गए निदेशों में भी ऐसी किसी प्रथा का उल्लेख नहीं है।" 
  • न्यायालय ने इस तर्क पर भी विचार किया कि भरण-पोषण आदेशों को सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन कठोरता से धन संबंधी आदेशों के रूप में निष्पादित किया जाना चाहियेविशेष रूप से धारा 51, 55, 58 और 60 को आदेश 21 के साथ पढ़ा जाना चाहिये 
  • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जबकि कुटुंब न्यायालय अधिनियम, 1984, कुटुंब न्यायालयों को अपनी प्रक्रिया विहित करने की अनुमति देता हैअधिनियम की धारा 18(2) स्पष्ट रूप से उपबंधित करती है कि दण्ड प्रक्रिया संहिता के अध्याय 9 (जिसमें धारा 125 सम्मिलित है) के अधीन पारित आदेश को दण्ड प्रक्रिया संहिता द्वारा विहित रीति से निष्पादित किया जाएगा। 
  • न्यायालय ने यह माना कि सिविल प्रक्रिया संहिता के उपबंध केवल वेतन पर लागू होते हैं और डिक्री के निष्पादन से संबंधित संपूर्ण अध्याय को लागू नहीं किया जा सकता हैक्योंकि भरण-पोषण आदेशों के प्रवर्तन में दण्ड प्रक्रिया संहिता व्यापक है। 
  • न्यायालय ने निदेश दिया किगिरफ्तारी वारण्ट के साथ वसूली वारण्ट जारी करने की प्रथा को बंद किया जाना चाहिये 
  • परिणामस्वरूपआवेदन मंजूर कर लिया गयाविवादित आदेश अपास्त कर दिया गया और मामले को अपर प्रधान न्यायाधीशकुटुंब न्यायालयन्यायालय संख्या 2, अलीगढ़ को वापस भेज दिया गया जिससे वे सांविधिक प्रावधानों के अनुसार ही आवेदन पर निर्णय लें। 

वारण्ट क्या है और इसके प्रकार क्या हैं? 

बारे में: 

वारण्ट एकलिखित दस्तावेज़ होताहै जो न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट द्वारा राज्य की ओर से जारी किया जाता है और जो किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी और निरोध या किसी व्यक्ति की संपत्ति की तलाशी और अधिग्रहण को अधिकृत करता है।   

वारण्ट के प्रकार: 

गिरफ्तारी वारण्ट: 

विवरण 

दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 

निष्पादन की प्रक्रिया 

गिरफ्तारी वारण्ट  

70 

72 

  • पुलिस या अधिकृत व्यक्तियों को निर्देश दिया गया। 
  • अधिकारी वारण्ट की जानकारी देता हैमांगने पर दिखाता हैऔर 24 घंटे के भीतर (यात्रा के समय के सिवायअभियुक्त को न्यायालय के सामने पेश करता है।     
  • उचित बल के प्रयोग की अनुमति।   

साक्षी को पेश करने के लिये वारण्ट 

81 

83 

  • समन की अवहेलना करने वाले साक्षी के विरुद्ध जारी।  
  • इसका निष्पादन गिरफ्तारी वारण्ट की भाँति किया जाएगा।   

 तलाशी वारण्ट: 

विवरण 

दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 

निष्पादन की प्रक्रिया 

विशिष्ट अपराध की सूचना पर तलाशी हेतु वारण्ट 

93 

94 

  • तलाशी दो सम्मानित साक्षियों की उपस्थिति में की जाएगी तथा जब्ती की सूची तैयार की जाएगी।  
  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अंतर्गत वीडियोग्राफी अपेक्षित/अनिवार्य हो सकती है।  

संदिग्ध जमा-स्थान की तलाशी हेतु वारण्ट 

94 

95 

  • ऐसे स्थलों के लिये जारी जहाँ चोरी की संपत्ति या अपराध से संबंधित साक्ष्य होने का संदेह हो। 

 कुर्की वारण्ट: 

विवरण 

दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 

निष्पादन की प्रक्रिया 

साक्षियों की उपस्थिति को बाध्य करने के लिये कुर्की का आदेश 

83 

85 

  • उद्घोषणा के पश्चात् जारीउपस्थिति सुनिश्चित करने हेतु संपत्ति की कुर्की 

अभियुक्त की उपस्थिति सुनिश्चित करने हेतु कुर्की आदेश 

83 

85 

  • सार्वजनिक उद्घोषणा के पश्चात् संपत्ति कुर्क की जाती है। 

जिला मजिस्ट्रेट/कलेक्टर द्वारा कुर्की का प्राधिकार 

83 

85 

  • जिला मजिस्ट्रेट/कलेक्टर को कुर्की निष्पादित करने का अधिकार। 

भूमि विवादों में कुर्की वारण्ट 

146 

148 

  • कब्जे से संबंधित भूमि विवादों में प्रयुक्त।  

कुर्की एवं विक्रय द्वारा जुर्माना वसूलने का वारण्ट 

421 

458 

  • जुर्माना वसूलने के लिये संपत्ति जब्त कर बेची गई।  

जुर्माने की वसूली हेतु वारण्ट 

421() 

458() 

  • निर्दिष्ट संपत्ति से जुर्माने की वसूली। 

भरण–पोषण के प्रवर्तन हेतु कुर्की एवं विक्रय का वारण्ट 

125 

144 

  • भरण–पोषण आदेश के प्रवर्तन हेतु संपत्ति की कुर्की। 

 प्रतिबद्धता वारण्ट: 

विवरण 

दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा  

निष्पादन की प्रक्रिया 

शांति बनाए रखने हेतु जमानत न देने पर प्रतिबद्धता 

122 

141 

  • जमानत प्रस्तुत न करने पर निरोध। 

सदाचार हेतु जमानत न देने पर प्रतिबद्धता 

122 

141 

  • उपर्युक्त के समान। 

जमानत न देने पर कारावास से उन्मोचन 

122, 123 

141, 142 

  • कारावास से छोड़ देने का आदेश। 

अंतरिम अभिरक्षा हेतु प्रतिबद्धता 

 

 

  • कार्यवाही के दौरान अस्थायी निरोध। 

कारावास या जुर्माने के दण्डादेश पर प्रतिबद्धता 

248, 255 

267, 274 

  • दोषसिद्धि के पश्चात् प्रतिबद्धता।  

सभी प्रतिबद्धता वारण्ट से संलग्न प्रपत्र 

248, 255 

267, 274 

  • पूरक प्रतिबद्धता प्रपत्र। 

अंतरिम अभिरक्षा हेतु वारण्ट 

309 

344 

  • स्थगनों के दौरान अभिरक्षा। 

मृत्युदण्डादेश के अधीन प्रतिबद्धता 

366 

405 

  • निष्पादन तक निरोध। 

मृत्युदण्ड का निष्पादन 

414 

453 

  • निष्पादन का प्राधिकार। 

दण्ड परिवर्तन के पश्चात् वारण्ट 

386 

425 

  • परिवर्तित दण्ड के अनुसार आदेश। 

जुर्माने सहित अवमानना में प्रतिबद्धता 

404 

443 

  • अवमानना हेतु निरोध। 

उत्तर देने/दस्तावेज़ प्रस्तुत करने से इंकार करने वाले साक्षी की प्रतिबद्धता 

349 

389 

  • व्यतिक्रम करने वाले साक्षी का निरोध। 

 भरण–पोषण वारण्ट: 

विवरण 

दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 

निष्पादन की प्रक्रिया 

 भरण–पोषण का संदाय न करने पर कारावास 

125 

144 

व्यतिक्रम की स्थिति में एक माह तक का निरोध। 

 रिहाई/अपीलीय वारण्ट: 

विवरण 

दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 

अपील पर छोड़ देना  

386 

425 

अपील में दण्ड में संशोधन 

386 

425 

सेशन न्यायाधीश द्वारा जमानत पर छोड़ देना  

389, 397 

428, 437 

जुर्माना/प्रतिकर वसूली वारण्ट: 

विवरण 

दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 

प्रतिकर का संदाय न करने पर कारावास 

250 

269 


पारिवारिक कानून

दांपत्य अधिकारों का प्रत्यास्थापन

 02-Feb-2026

जितेंद्र आजाद बनाम मीना गुप्ता 

"पत्नी की रूढ़िवादी अवधारणा तथा उससे यह अपेक्षा कि वह अपने पति की इच्छाओं के अधीन स्वयं को समर्पित करेमहिलाओं में शिक्षा एवं उच्च साक्षरता के प्रसार तथा संविधान द्वारा महिलाओं को समान अधिकारों की मान्यता के परिणामस्वरूप एक क्रांतिकारी परिवर्तन से गुजर चुकी है।" 

न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद और अरुण कुमार राय 

स्रोत: झारखंड उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद और अरुण कुमार राय की खंडपीठ नेजितेंद्र आजाद बनाम मीना गुप्ता (2026)के मामले मेंहिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा के अधीन दांपत्य अधिकारों का प्रत्यास्थापन के लिये अपनी याचिका की अस्वीकृति के विरुद्ध पति द्वारा दायर कुटंब न्यायालय अधिनियम की धारा 19 के अधीन पहली अपील को खारिज कर दियायह मानते हुए कि पत्नी का दूसरे शहर में नियोजन के उद्देश्य से पत्नी का पृथक् निवास युक्तियुक्त कारण है। 

जितेंद्र आजाद बनाम मीना गुप्ता (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • अपीलकर्त्ता-पति और प्रत्यर्थी-पत्नी का विवाह 12 मार्च 2018 को संपन्न हुआ था। 
  • विवाह के समय पत्नी एक निजी स्कूल में शिक्षिका के रूप में कार्यरत थीजबकि पति एक अस्पताल में दैनिक वेतनभोगी चिकित्सा कर्मचारी के रूप में कार्यरत था। 
  • विवाह के पश्चात् दोनों पक्षकार केवल दो से तीन दिन ही साथ रहे और उसके बाद पृथक् रहने लगे क्योंकि उनके कार्यस्थल अलग-अलग शहरों में थे। 
  • तत्पश्चात् दोनों पक्षकारों के बीच मतभेद उत्पन्न हो गए। 
  • पति ने अभिकथित किया कि पत्नी नेउसे बिना बताए वैवाहिक घर छोड़ दिया, अपने गहने और सामान ले गईइस बात पर बल दिया कि उसे "घर जमाई" बनकर रहना चाहिये और उससे तलाक के कागजात तैयार करने को कहा। 
  • पति ने दांपत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन की मांग करते हुए हिंदू विवाह अधिनियम की धारा के अधीन एक याचिका दायर की। 
  • पत्नी ने कहा कि तथापि वह वैवाहिक जीवन जारी रखने को तैयार हैपरंतु वह अपनी नौकरी छोड़ने को तैयार नहीं है। 
  • पत्नी ने अभिकथित किया कि उसके पति और उसके परिवार ने एक अतिरिक्त व्यवसाय के लिये स्कॉर्पियो गाड़ी खरीदने के लिये 10 लाख रुपये की मांग कीऔर उसके इंकार करने पर विवाद उत्पन्न हो गया। 
  • कार्यवाही के दौरान यह बात सामने आई कि पति संविदा के आधार पर प्रति माह 10,000 रुपए कमा रहा थाजबकि पत्नी सरकारी शिक्षिका के रूप में प्रति माह लगभग 60,000 रुपए कमा रही थी।  
  • कुटुंब न्यायालय ने पति की दांपत्य अधिकारों का प्रत्यास्थापन की याचिका खारिज कर दीजिसके बाद पति ने उच्च न्यायालय में अपील दायर की। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

दांपत्य अधिकारों का प्रत्यास्थापन के लिये शर्तें: 

  • न्यायालय ने दोहराया कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा के अधीन दांपत्य अधिकारों का प्रत्यास्थापन का आदेश केवल तभी दिया जा सकता है जब: 

(i) प्रत्यर्थी याचिकाकर्त्ता के साहचर्य से अपने आप को पृथक् कर लिया है । 

(ii) ऐसा पृथक्करण किसी भी युक्तियुक्त प्रतिहेतु अथवा विधिसंगत बहाने के बिना किया गया है । 

(iii) उक्त अनुतोष प्रदान किये जाने से इंकार करने हेतु कोई अन्य विधिक आधार विद्यमान नहीं है । 

(iv) न्यायालय याचिका में दिये गए कथनों की सत्यता से संतुष्ट है। 

हिंदू पत्नी की अवधारणा में क्रांतिकारी परिवर्तन: 

  • न्यायालय ने माना कि हिंदू पत्नी की धर्मपत्नीअर्धांगिनीभार्या या अनुगामिनी के रूप में रूढ़िवादी अवधारणा - जिससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह सदैव अपने पति के साथ उसके शरीर के एक अंग के रूप में रहे - शिक्षामहिलाओं की साक्षरतासमान अधिकारों की सांविधानिक मान्यता और लिंग भेद के उन्मूलन के साथ एक "क्रांतिकारी परिवर्तन" से गुज़री है। 
  • अब पत्नी वैवाहिक जीवन में पति के समान दर्जा और समान अधिकारों वाली भागीदार है। 

वैवाहिक दंपत्तियों के समान अधिकार: 

  • न्यायालय ने यह माना कि कोई भी पति या पत्नी दूसरे पर श्रेष्ठ या बेहतर अधिकार का दावा नहीं कर सकता। जहाँ दोनों पति-पत्नी कार्यरत हैं या अपनी पसंद के पेशे में लगे हुए हैंवहाँ उनके वैवाहिक जीवन का स्वरूप उनके संबंधित नियोजनों की आवश्यकताओं के अनुसार निर्धारित होना चाहिये 
  • न्यायालय ने इस धारणा को खारिज कर दिया कि पति को यह पूर्ण अधिकार है कि वह पत्नी पर यह दबाव डाले कि वह अपनी नौकरी छोड़ दे और केवल वैवाहिक दायित्त्व को पूरा करने के लिये उसके साथ आश्रित के रूप में रहे। 

तर्कसंगतता की कसौटी: 

  • न्यायालय ने यह अवधारित करने के लिये "तर्कसंगतता" की कसौटी लागू की कि किस पक्षकार ने संयुक्त जीवन के प्रति अनुचित दृष्टिकोण अपनाया। 
  • चूँकि पति-पत्नी दोनों अलग-अलग शहरों में कार्यरत थे और उनमें से कोई भी अपनी नौकरी नहीं छोड़ सकता थाइसलिये पत्नी द्वारा अपने वैवाहिक जीवन को समायोजित करते हुए अपनी नौकरी जारी रखने पर बल देना पूरी तरह से अनुचित नहीं माना गया। 

पत्नी का आर्थिक स्वतंत्रता का अधिकार और पृथक्करण के वैध कारण: 

  • न्यायालय ने पत्नी के आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होनेपेशेवर लक्ष्यों को प्राप्त करने और एक कामकाजी पेशेवर के रूप में समाज में योगदान देने के अधिकार को मान्यता दी। 
  • इसमें इस बात पर बल दिया गया कि दांपत्य अधिकारों का प्रत्यास्थापन दोनों पति-पत्नी का संयुक्त उत्तरदायित्त्व है कि वे अपने रिश्ते को बनाए रखने के लिये एक व्यावहारिक रास्ता खोजेंन कि केवल पत्नी चुपचाप पति का अनुसरण करे। 
  • धन और वाहन की मांग के साक्ष्य और इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि दोनों पक्ष अलग-अलग शहरों में काम करते थेन्यायालय ने माना कि पत्नी के पास पृथक् निवास के वैध और पर्याप्त कारण थे और पति की अपील को खारिज कर दिया। 

दांपत्य अधिकारों का प्रत्यास्थापन क्या है? 

बारे में: 

  • दांपत्य अधिकारों का प्रत्यास्थापन अभिव्यक्ति का अर्थ है उन दांपत्य अधिकारों का प्रत्यास्थापन जिनका आनंद पक्षकारों ने पहले उठाया था।  
  • हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (HMA) की धारा 9के अधीन दांपत्य अधिकारों का प्रत्यास्थापन को उपबंधित किया गया है 
  • धारा का उद्देश्य विवाह संस्था की पवित्रता और वैधता की रक्षा करना है। 
  • जब कि पति या पत्नी ने अपने को दूसरे के साहचर्य से किसी युक्तियुक्त प्रतिहेतु के बिना प्रत्याहृत कर लिया हो तब व्यचित पक्षकार दांपत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन के लिये जिला न्यायालय में अर्जी द्वारा आवेदन कर सकेगा 
  • सबूत का भार उस व्यक्ति पर होता है जिसने दूसरे व्यक्ति के साहचर्य से स्वयं को प्रत्याहृत किया हैयह साबित करने के लिये कि प्रत्याहृत होने का कोई युक्तियुक्त प्रतिहेतु था। 

धारा के अधीन अनुतोष प्राप्त करने के लिये आवश्यक शर्तें: 

  • दोनों पक्षकारों का विधिक रूप से एक दूसरे से विवाहित होना आवश्यक है। 
  • किसी एक पक्षकार द्वारा दूसरे पक्षकार के साहचर्य से स्वयं को प्रत्याहृत कर लिया गया हो 
  • ऐसा पृथक्करण वैध एवं युक्तियुक्त प्रतिहेतु के अभाव में किया गया हो । 
  • इस बात को साबित करना होगा कि डिक्री को खारिज करने का कोई विधिक औचित्य नहीं हैजिससे न्यायालय संतुष्ट हो सके। 

दांपत्य अधिकारों का प्रत्यास्थापन के लिये आवेदन कहाँ दाखिल करें: 

हिंदू विवाह अधिनियम के अधीन दायर की गई प्रत्येक याचिका मूल सिविल अधिकारिता के कुटुंब न्यायालय में दायर की जानी चाहिये जहाँ: 

  • विवाह का संस्कार संपन्न हुआ हो । 
  • प्रत्यर्थी निवास करता है। 
  • विवाह के पश्चात् पक्षकारों ने अंतिम बार साथ निवास किया हो 
  • यदि याचिकाकर्त्ता पत्नी हैतो उस स्थान पर जहाँ वह याचिका दायर किये जाने की तिथि को निवासरत हो 

दांपत्य अधिकारों का प्रत्यास्थापन का प्रभाव: 

  • यदि दांपत्य अधिकारों का प्रत्यास्थापन का आदेश पारित हो जाता हैतो प्रत्यर्थी के लिये वादी के साथ पुनः सहवास प्रारंभ करना अनिवार्य हो जाता है । 
  • यदि डिक्री की तिथि से एक वर्ष के भीतर इसका पालन नहीं किया जाता हैतो किसी भी पक्षकार को विवाह विच्छेद की मांग करने का अधिकार प्राप्त हो जाता है । 

विधिक निर्णय 

  • सरोज रानी बनाम सुदर्शन कुमार चड्ढा (1984)के मामले में, उच्चतम न्यायालय ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा की सांविधानिक वैधता को बरकरार रखा क्योंकि यह धारा किसी भी मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं करती है।