जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों से मुक्त होने के अधिकार पर निर्णय
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सांविधानिक विधि

जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों से मुक्त होने के अधिकार पर निर्णय

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 12-Apr-2024

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

परिचय:

एम.के. रणजीतसिंह बनाम भारत संघ (2021) के एक ऐतिहासिक निर्णय में भारत के उच्चतम न्यायालय ने नागरिकों के जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों से मुक्त होने के अधिकार की फिर से पुष्टि की है, जिससे संविधान के अनुच्छेद 14 एवं 21 के महत्त्व पर बल दिया गया है। मुख्य न्यायमूर्ति डी. वाई. चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला एवं न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की तीन-न्यायाधीशों वाली पीठ द्वारा दिया गया यह महत्त्वपूर्ण निर्णय गंभीर रूप से लुप्तप्राय एकल प्रजाति ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (GIB) के संरक्षण से संबंधित एक मामले से सामने आया है, जिसके निहितार्थ, संरक्षण से कहीं आगे तक विस्तृत हैं।

मामले का संदर्भ क्या है?

  • उपरोक्त निर्णय एक सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारी एवं संरक्षणवादी एम.के. रंजीतसिंह द्वारा दायर एक रिट याचिका में निहित है, जिसमें विलुप्त होने के कगार पर GIB एवं लेसर फ्लोरिकन दोनों के लिये संरक्षण की मांग की गई है।
  • याचिका में आपातकालीन प्रतिक्रिया योजना तैयार करने एवं लागू करने जैसे त्वरित उपायों का आग्रह किया गया है, जिसमें बर्ड डायवर्टर की स्थापना एवं संकटग्रस्त आवासों पर अतिक्रमण करने वाले बुनियादी ढाँचे को नष्ट करना सम्मिलित है।
  • इस मामले के केंद्र में संरक्षण प्रयासों एवं विकासात्मक गतिविधियों, विशेष रूप से ओवरहेड ट्रांसमिशन केबल लाइनों की स्थापना के बीच द्वन्द था, जिसे शीर्ष न्यायालय के अप्रैल 2021 के आदेश में उजागर किया गया था।

न्यायालय का निर्णय क्या था?

  • अपने हालिया निर्णय में, उच्चतम न्यायालय ने मामले की जटिलता को स्वीकार करते हुए, बिजली केबल लाइनों को भूमिगत करने पर अपने पूर्व आदेश को संशोधित किया।
  • ऐसे उपायों की व्यवहार्यता पर विशेषज्ञों द्वारा मूल्यांकन की आवश्यकता पर बल देते हुए, न्यायालय ने पर्यावरणीय ह्रास के विषय में वैश्विक चिंताओं को प्रतिध्वनित करते हुए, जलवायु परिवर्तन एवं मानवाधिकारों के अंतरसंबंध को भी रेखांकित किया।
  • महत्त्वपूर्ण बात यह है कि यह निर्णय, जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न चुनौतियों से निपटने के दौरान संरक्षण प्रयासों के प्रति संघ की प्रतिबद्धता को स्थापित करता है।

इस मामले में क्या विधिक प्रावधान सम्मिलित हैं?

  • न्यायालय द्वारा अनुच्छेद 14 एवं 21 की व्याख्या मौलिक अधिकारों की व्यापक समझ को दर्शाती है, जिसमें स्वच्छ पर्यावरण एवं सम्मानजनक अस्तित्त्व का अधिकार शामिल है।
  • मानवाधिकारों के ढाँचे के भीतर पर्यावरणीय चिंताओं को प्रासंगिक बनाकर, न्यायालय प्रत्येक नागरिक के लिये एक सार्थक जीवन सुनिश्चित करने के लिये अनुच्छेद 21 के दायरे को इसके अस्तित्त्व से परे विस्तारित करने पर अपने ऐतिहासिक रुख के अनुरूप है।
  • यह निर्णय पर्यावरणीय न्याय को कायम रखने में न्यायपालिका की भूमिका की पुष्टि करता है एवं विधायी कार्यवाही की अनिवार्यता को रेखांकित करता है।

पर्यावरणीय न्यायशास्त्र के निहितार्थ क्या हैं?

  • पर्यावरण विशेषज्ञों विधिज्ञों ने इस निर्णय को भारत के पर्यावरण न्यायशास्त्र में एक महत्त्वपूर्ण मील का पत्थर बताया है।
  • जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों के विरुद्ध “अधिकार" को मान्यता देकर, उच्चतम न्यायालय न केवल पर्यावरणीय चिंताओं को संबोधित करता है, बल्कि भविष्य की मुकदमेबाज़ी एवं नीतिगत हस्तक्षेप का मार्ग भी प्रशस्त करता है।
    • यह निर्णय न केवल भारत की अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं को मजबूत करता है बल्कि पर्यावरणीय चुनौतियों के सामने नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा में न्यायपालिका की भूमिका पर भी ज़ोर देता है।

निष्कर्ष:

सारांशतः उच्चतम न्यायालय के निर्णय ने पर्यावरणीय चेतना एवं विधिक सक्रियता के एक नए युग की शुरुआत की है। संवैधानिक सिद्धांतों को पर्यावरणीय अनिवार्यताओं के साथ जोड़कर, न्यायालय विकास संबंधी आकांक्षाओं के साथ संरक्षण प्रयासों को संतुलित करने के लिये एक मिसाल कायम करता है।