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पारिवारिक कानून
विवाह रजिस्ट्रीकरण
« »29-Aug-2025
सुनील दुबे बनाम मिनाक्षी (2025) "रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र ही विवाह को साबित करने का एकमात्र साक्ष्य है और विवाह के रजिस्ट्रीकरण का अभाव हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 8 की उपधारा 5 के अधीन विवाह को अमान्य नहीं करेगा।" न्यायमूर्ति मनीष कुमार निगम |
स्रोत: इलाहाबाद उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
न्यायमूर्ति मनीष कुमार निगम की पीठ ने सुनील दुबे बनाम मीनाक्षी (2025) मामले में, में उस याचिका को स्वीकार किया जिसमें परिवार न्यायालय द्वारा विवाह-विच्छेद की कार्यवाही में विवाह-रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र प्रस्तुत करने की अनिवार्यता से छूट देने से इंकार करने के आदेश को चुनौती दी गई थी। न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि हिन्दू विवाह केवल इस आधार पर अमान्य नहीं हो जाता कि उसका रजिस्ट्रीकरण नहीं हुआ है और इसलिये, कुटुंब न्यायालय परस्पर सहमति से तलाक के मामले में विवाह- रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र प्रस्तुत करने पर बल नहीं दे सकता।
सुनील दुबे बनाम मीनाक्षी (2025) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- पति-याचिकाकर्त्ता और प्रतिवादी-पत्नी ने 23अक्टूबर 2024 को आपसी सहमति से तलाक के लिये हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (HMA) की धारा 13 (ख) के अधीन आवेदन दायर किया ।
- कुटुंब न्यायालय के न्यायाधीश ने याचिका लंबित रहने के दौरान 29 जुलाई 2025 तक विवाह प्रमाणपत्र दाखिल करने का आदेश दिया।
- याचिकाकर्त्ता ने रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र दाखिल करने से छूट की मांग करते हुए आवेदन दायर किया था, जिसमें कहा गया था कि यह उपलब्ध नहीं है और हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के अधीन विवाह रजिस्ट्रीकरण के लिये कोई अनिवार्य आवश्यकता नहीं है।
- आवेदन का समर्थन प्रतिपक्ष (पत्नी) द्वारा किया गया, जो आपसी सहमति दर्शाता है।
- पारिवारिक न्यायालय ने 31 जुलाई 2025 को हिंदू विवाह और तलाक नियम, 1956 के नियम 3(क) का हवाला देते हुए आवेदन को खारिज कर दिया, जिसके अनुसार हिंदू विवाह अधिनियम के अधीन प्रत्येक कार्यवाही में विवाह प्रमाण पत्र संलग्न करना आवश्यक है।
- यह विवाह उत्तर प्रदेश विवाह रजिस्ट्रीकरण नियम, 2017 के लागू होने से पूर्व 27 जून 2010 को को संपन्न हुआ था।
न्यायालय की टिप्पणियाँ क्या थीं?
- धारा 8 के अधीन विवाह रजिस्ट्रीकरण पर: न्यायालय ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 8 में विवाह के रजिस्ट्रीकरण का उपबंध है, किंतु रजिस्ट्रीकरण के अभाव में विवाह अमान्य नहीं हो जाता। रजिस्ट्रीकरण का उद्देश्य केवल "हिंदू विवाहों के सबूत को सुगम बनाना" है और यह एक सुविधाजनक साक्ष्य के रूप में कार्य करता है, न कि वैधता की पूर्वशर्त।
- प्रक्रियात्मक बनाम मौलिक अधिकार: न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि प्रक्रियात्मक नियमों से न्याय में सुविधा होनी चाहिये, न कि तकनीकी बाधाएँ उत्पन्न होनी चाहिये, तथा उन्होंने उच्चतम न्यायालय की इस टिप्पणी का हवाला दिया कि "प्रक्रिया मौलिक अधिकारों की दासी है।"
- हिंदू विवाह और तलाक नियम, 1956 के नियम 3(क) पर: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि नियम 3(क) के अधीन विवाह प्रमाण पत्र की आवश्यकता केवल तभी होती है "जब विवाह इस अधिनियम के तहत रजिस्ट्रीकृत किया गया हो।"
- उत्तर प्रदेश विवाह रजिस्ट्रीकरण नियम, 2017 पर: न्यायालय ने कहा कि ये नियम विवाह के प्रारंभ होने के बाद उसके रजिस्ट्रीकरण को अनिवार्य बनाते हैं, किंतु इससे पहले हुए विवाह इससे अप्रभावित रहते हैं।
उद्धृत विधिक पूर्व निर्णय:
- डॉली रानी बनाम मनीष कुमार चंचल (2024): रजिस्ट्रीकरण केवल धारा 7 के अधीन वैध विवाह के लिये संस्कार की पुष्टि करता है; अमान्य विवाह को वैध नहीं बना सकता।
- संग्राम सिंह बनाम चुनाव अधिकरण (1955): प्रक्रियात्मक विधियों को न्याय को सुगम बनाना चाहिये, न कि तकनीकी जाल बिछाना चाहिये।
न्यायालय के निदेश:
इलाहाबाद उच्च न्यायालय:
- याचिका को स्वीकार कर लिया गया तथा कुटुंब न्यायालय के 31 जुलाई 2025 के आदेश को अपास्त कर दिया गया।
- कुटुंब न्यायालय को विवाह रजिस्ट्रीकरण प्रमाण पत्र की आवश्यकता के बिना आपसी तलाक के मामले को आगे बढ़ाने का निदेश दिया।
- 2024 से लंबित तलाक की कार्यवाही को सुनवाई का उचित अवसर प्रदान करते हुए शीघ्र निपटाने का आदेश दिया गया।
- सांविधिक समयसीमा के संबंध में हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 21-ख के अनुपालन पर बल दिया गया।
विवाह रजिस्ट्रीकरण के संबंध में क्या प्रावधान हैं?
हिंदू विधि:
- हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 8(1) राज्य सरकारों को विवाह रजिस्ट्रीकरण के प्रयोजनार्थ नियम बनाने का अधिकार देती है।
- धारा 8(2) में उल्लेख है कि उपधारा (1) में जो कुछ भी कहा गया है, उसके होते हुए भी, राज्य सरकार, यदि वह आवश्यक या उचित समझे, तो संपूर्ण राज्य या विशिष्ट क्षेत्रों में, सार्वभौमिक रूप से या विशिष्ट मामलों के लिये उपधारा (1) में उल्लिखित विवरण प्रस्तुत करने का आदेश दे सकती है।
- ऐसे मामलों में जहाँ ऐसे निदेश जारी किये जाते हैं, इस संबंध में स्थापित किसी भी विनियमन का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति को पच्चीस रुपए तक का जुर्माना भरना पड़ सकता है।
मुस्लिम विधि:
- मुस्लिमों में विवाह का रजिस्ट्रीकरण आवश्यक एवं अनिवार्य है, क्योंकि मुस्लिम विवाह को एक सिविल संविदा माना जाता है।
- इस अधिनियम के लागू होने के बाद मुस्लिमों के बीच हुआ प्रत्येक विवाह, निकाह समारोह के समापन से तीस दिनों के भीतर, इसके बाद प्रदान की गई व्यवस्था के अनुसार रजिस्ट्रीकृत किया जाएगा।
- निकाहनामा मुस्लिम विवाह में एक प्रकार का विधिक दस्तावेज़ है जिसमें विवाह की आवश्यक शर्तें/विवरण सम्मिलित होते हैं।
क्रिश्चियन विधि:
- धारा 27-37 भारतीय क्रिश्चियन विवाह अधिनियम, 1872 के भाग 4 का निर्माण करती हैं, जो विशेष रूप से भारतीय क्रिश्चियन के बीच इस अधिनियम के अधीन किये गए विवाहों के रजिस्ट्रीकरण की प्रक्रिया की बात करती हैं।
- विवाहों को निर्धारित नियमों का पालन करना चाहिये, और इन्हें सामान्यत: चर्च ऑफ इंग्लैंड से संबद्ध पादरी द्वारा संपन्न कराया जाता है ।
विवाह का रजिस्ट्रीकरण न कराने का क्या परिणाम होता है?
- भारत में विवाह रजिस्ट्रीकरण न कराने के परिणाम संदर्भ और विधिक आवश्यकताओं के आधार पर अलग-अलग हो सकते हैं। यहाँ कुछ सामान्य निहितार्थ दिये गए हैं:
- विधिक मान्यता : यद्यपि अधिकतर मामलों में विवाह का रजिस्ट्रीकरण उसकी वैधता के लिये अनिवार्य नहीं है, फिर भी यह विवाह के होने का निश्चायक साक्ष्य होता है। रजिस्ट्रीकृत विवाह प्रमाणपत्र के बिना, विवाह के अस्तित्व को साबित करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है, विशेष रूप से विधिक कार्यवाही में।
- अधिकार और लाभ : सरकार द्वारा प्रदान किये जाने वाले विभिन्न अधिकारों और लाभों, जैसे उत्तराधिकार अधिकार, पति/पत्नी लाभ और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं, का लाभ उठाने के लिये प्राय: रजिस्ट्रीकृत विवाह प्रमाणपत्र की आवश्यकता होती है। इसलिये, रजिस्ट्रीकरण न कराने पर इन अधिकारों से वंचित किया जा सकता है।
- विधिक कार्यवाही : वैवाहिक स्थिति, संपत्ति के अधिकार या तलाक से संबंधित विवादों के मामले में, रजिस्ट्रीकृत विवाह प्रमाणपत्र विवाह का स्पष्ट दस्तावेज़ीकरण प्रदान करके विधिक कार्यवाही को सरल बना सकता है। रजिस्ट्रीकरण न होने पर ऐसे मामले जटिल हो सकते हैं और विधिक प्रक्रिया लंबी हो सकती है।
- वीज़ा और आप्रवास: कुछ मामलों में, वीज़ा आवेदनों और आप्रवास उद्देश्यों के लिये, विशेष रूप से उन पति-पत्नी के लिये जो किसी अन्य देश में अपने साथी के साथ रहने का आशय रखते हैं, रजिस्ट्रीकृत विवाह प्रमाणपत्र की आवश्यकता हो सकती है। इसलिये, रजिस्ट्रीकरण न होने से ऐसी प्रक्रियाओं में बाधा आ सकती है।
विवाह रजिस्ट्रीकरण के लिये महत्त्वपूर्ण मामले कौन से हैं?
- सीमा बनाम अश्वनी कुमार (2007) :
- इस मामले में, उच्चतम न्यायालय ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के अधीन विवाह का रजिस्ट्रीकरण पक्षकारों के विवेक पर छोड़ दिया गया है, वे या तो उप-रजिस्ट्रार के समक्ष विवाह संपन्न करा सकते हैं या प्रथागत मान्यताओं के अनुसार विवाह संस्कार संपन्न करने के बाद इसे रजिस्ट्रीकृत करा सकते हैं।
- अब्दुल कादिर बनाम सलीमा और अन्य (1886):
- न्यायमूर्ति महमूद ने मुस्लिम विवाह की प्रकृति को एक संस्कार के बजाय विशुद्ध रूप से एक सिविल संविदा के रूप में देखा।