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सिविल कानून

घोषणात्मक डिक्री

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 14-Sep-2023

परिचय

घोषणात्मक डिक्री किसी ऐसे व्यक्ति को अनुतोष प्रदान करने का एक साधन है जिसे ऐसे अधिकार या स्वामित्व से वंचित किया जा रहा है जिसका वह हकदार है। विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 (एसआरए) Specific Relief Act, 1963 (SRA)  धारा 34 और 35 के अन्तर्गत ऐसा अनुतोष प्रदान करता है।

धारा 34 - प्रस्थिति या अधिकार की घोषणा के संबंध में न्यायालय का विवेकाधिकार

कोई व्यक्ति, जो किसी विधिक हैसियत का या किसी संपत्ति के बारे में किसी अधिकार का हकदार हो, ऐसे किसी व्यक्ति के विरूद्ध, जो ऐसी हैसियत का या ऐसे अधिकार के हक का प्रत्याख्यान करता हो या प्रत्याख्यान करने में हितबद्ध हो, वाद संस्थित कर सकेगा और न्यायालय स्वविवेक में उस वाद में यह घोषणा कर सकेगा कि वह ऐसा हकदार है और वादी के लिए यह आवश्यक नहीं है कि वह उस वाद में किसी अतिरिक्त अनुतोष की मांग करे:

परन्तु कोई भी न्यायालय वहां ऐसी घोषणा नहीं करेगा जहां कि वादी हक की घोषणा मात्र के अतिरिक्त कोई अनुतोष मांगने योग्य होते हुए भी ऐसा करने में लोप करे।

स्पष्टीकरण - संपत्ति का न्यासी ऐसे हक का प्रत्याख्यान करने में "हितबद्ध व्यक्ति" है जो ऐसे व्यक्ति के हक के प्रतिकूल हो जो अस्तित्व में नहीं है, और जिसके लिए, वह न्यासी होता यदि वह व्यक्ति अस्तित्व में आता।

विचारार्थ बिंदु:

  • यह एक बाध्यकारी घोषणा है जिसके अन्तर्गत न्यायालय वादी के पक्ष में कुछ मौजूदा अधिकारों की घोषणा करता है और घोषणात्मक डिक्री तभी मौजूद होती है जब वादी को उसके उस अधिकार से वंचित कर दिया जाता है जिसका वह हकदार है।
  • यह प्रावधान वादी को उन अधिकारों के लिए आगे आने हेतु प्रोत्साहित करता है जिसका वह हकदार है और यदि कोई प्रतिवादी कोई भी विधिक हैसियत प्रदान करने से इनकार करता है जिसके लिए वादी हकदार है, तो यह उन्हें वाद दायर करने और विनिर्दिष्ट अनुतोष प्राप्त करने की शक्ति देता है।

घोषणात्मक डिक्री के लिए आवश्यक अनुतोष

  • वादी को यह साबित करना होगा कि प्रतिवादी ने वादी को ऐसा हक या स्वामित्व प्रदान करने से इनकार किया है या इनकार करने में रुचि रखता है और वादी को यह सिद्ध करना होगा कि उसके हक के लिए कुछ खतरा उपलब्ध है।
  • मध्यप्रदेश राज्य बनाम खान बहादुर भिवंडीवाला एंड कंपनी (1971) में न्यायालय ने कहा कि घोषणात्मक अनुतोष प्राप्त करने के लिए वादी को यह साबित करना होगा कि -
    • वाद दायर करते समय वह किसी भी विधिक हैसियत या किसी भी संपत्ति के स्वामित्व का हकदार है।
    • प्रतिवादी ने वादी को उसका हक या स्वामित्व प्रदान करने से इनकार कर दिया था या वह इनकार करने में रुचि रखता था।
    • वांछित घोषणा एक ऐसी घोषणा थी जिसके अन्तर्गत वादी विधिक हैसियत या संपत्ति के स्वामित्व का हकदार था।
    • वादी अपने स्वामित्व की घोषणा के अलावा और अधिक अनुतोष का दावा करने की स्थिति में नहीं था । चूँकि घोषणा एक न्यायसंगत उपाय है, फिर भी न्यायालय के पास प्रत्येक मामले की परिस्थितियों के आधार पर अनुतोष प्रदान करने या अस्वीकार करने का विवेक है।

घोषणात्मक डिक्री के अंतर्गत विधिक हैसियत

  • विधिक हैसियत विधि द्वारा मान्यता प्राप्त हैसियत को दर्शाता है।
  • यह किसी व्यक्ति की विधिक स्थिति से जुड़ी होती है जो स्वामित्व या हैसियत के लिए उसकी क्षमता को दर्शाता है।
  • हीरालाल बनाम गुलाब (1953) के मामले में , यह देखा गया कि स्वाभाविक व्यक्तियों के बीच विभिन्न प्रकार की प्रस्थिति को घोषणा के अन्तर्गत संदर्भित किया जा सकता है, उदाहरणार्थ, लिंग, अल्पवयस्कता, पद, जाति, जनजाति, पेशा, आदि।

किसी भी संपत्ति के अधिकार हेतु हकदार व्यक्ति

  • न्यायालयों ने "संपत्ति का अधिकार" और "संपत्ति में अधिकार" के बीच अंतर किया है।
  • यह माना गया है कि घोषणा का दावा करने के लिए वादी को संपत्ति में अधिकार साबित करने की आवश्यकता नहीं है।
  • तारक चंद्र दास बनाम अनुकूल चंद्र मुखर्जी (1946) मामले में, न्यायालय ने माना कि आकस्मिक अधिकार के संबंध में एक घोषणा का दावा  किया जा सकता है, आगे यह भी कहा गया कि अगर न्यायालय को यह लगता है  कि दावा बिल्कुल असंबद्ध है या यह अप्रभावी होगा तो उसके पास इसके लिए इनकार करने का पूर्ण विवेकाधिकार होगा।

वादपत्र का प्रारूप

  • विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 (SRA) की धारा 34 के अन्तर्गत दायर वाद में निम्नलिखित जानकारी दी जानी चाहिये:
    • वादी द्वारा दावा किया गया स्वामित्व या अधिकार।
    • जिन परिस्थितियों में दावा किये गये अधिकार पर संदेह उत्पन्न हुआ।
    • अनुरोध (शिकायत या याचिका के समापन पर निर्णय, राहत और/या क्षतिपूर्ति के लिए एक विशिष्ट अनुरोध)
  • विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 (SRA)की धारा 34 के अन्तर्गत उल्लिखित किसी भी संपत्ति का अधिकार एक ऐसा अधिकार होना चाहिए जो वाद दायर करने की तारीख पर मौजूद हो, भले ही ऐसे अधिकार का पालन स्थगित कर दिया गया हो, उदाहरण के लिए एक प्रत्यावर्तक का अधिकार।

जब घोषणा के लिए वाद लागू नहीं होता

  • घोषणा के लिए वाद सभी मामलों में लागू नहीं होगा, जिनमें से कुछ इस नीचे दिये गये हैं:
    • एक नकारात्मक घोषणा की अनुमति नहीं दी जा सकती (उदाहरण के लिए, एक घोषणा कि वादी ने प्रतिवादी के ट्रेडमार्क का उल्लंघन नहीं किया है)।
    • वसीयतकर्ता के जीवनकाल में इस घोषणा के लिए वाद कि वसीयत अमान्य है
    • 1860 के अधिनियम XXVII के अन्तर्गत दिए गए उत्तराधिकार प्रमाणपत्र को रद्द करने की घोषणा के ‍लिए कोई वाद लागू नहीं होता है (यह अधिनियम वर्तमान कानून- भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 (Indian Succession Act,1925) द्वारा प्रतिस्थापित किया गया है)।
    • उत्तराधिकार के मामले में कोई भी ऐसे अधिकार की घोषणा की मांग नहीं कर सकता जो अस्तित्व में ही नहीं है।

परिसीमा काल (Limitation Period)

  • विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 (SRA) की धारा 34 के अन्तर्गत दायर वाद के लिए परिसीमा काल को परिसीमा अधिनियम, 1963 (Limitation Act, 1963). के अनुच्छेद 56, 57, 58 के अन्तर्गत शासित किया जाता है।
    • अनुच्छेद56:निकालीगई या रजिस्ट्रीकृत लिखत की कूटरचना को घोषित   करने के लिए  - तीन वर्ष
    • अनुच्छेद 57: यहघोषणा अभिप्राप्त करने के लिए कि अभिकथित दत्तक-ग्रहण अविधिमान्य है या वास्तव में कभी हुआ ही नहीं  - तीन वर्ष
    • अनुच्छेद 58: कोईअन्य घोषणा अभिप्राप्त करने के लिए- तीन वर्ष

धारा 35 - घोषणा का प्रभाव

  • इस अध्याय के अधीन की गई घोषणा केवल वाद के पक्षकारों, उनके माध्यम से दावा करने वाले व्यक्तियों क्रमशः पर और जहाँ पक्षकारों में से कोई न्यासी हों, उन व्यक्तियों पर जिनके लिये, यदि घोषणा की दिनांक को अस्तित्व में होते तो ऐसे पक्षकार न्यासी होते, आबद्धकर है।
  • वर्तमान प्रावधान यह बताता है कि धारा 34 के अन्तर्गत की गई घोषणा निम्नलिखित पर आबद्धकर है :
    • वाद के पक्षकार।
    • उनके माध्यम से दावा करने वाले व्यक्ति।
    • न्यासी, जहाँ पक्षकारों में से कोई न्यासी हों, उन व्यक्तियों पर जिनके लिये, यदि घोषणा की दिनांक को अस्तित्व में होते तो ऐसे पक्षकार न्यासी होते।

निष्कर्ष

  • घोषणात्मक डिक्री एक डिक्री है जो उस अधिकार की घोषणा करती है जो संदिग्ध है, या जिसे स्पष्टीकरण की आवश्यकता है। इस तरह के डिक्री का उद्देश्य विवाद के मौजूदा कारणों को हटाकर भविष्य में किसी वाद को रोकना है।